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नरेन्द्र मोदी-योगी आदित्यनाथ के गढ़ में प्रियंका गांधी के सामने कई चुनौतियां

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seemaBy seema

Published on 25 Jan 2019 7:59 AM GMT

नरेन्द्र मोदी-योगी आदित्यनाथ के गढ़ में प्रियंका गांधी के सामने कई चुनौतियां
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पूर्णिमा श्रीवास्तव

गोरखपुर: कांग्रेस ने अपने मास्टर स्ट्रोक में प्रियंका गांधी को पार्टी के लिए सियासी रेगिस्तान बन चुके पूर्वांचल का प्रभारी बनाकर योगी और मोदी के गढ़में तूफान ला दिया है। यह राजनीतिक दांव सीटों में कितना तब्दील हो पाएगा, इसे लेकर सिर्फ कयासबाजी ही हो सकती है। हालांकि प्रियंका के चुनावी समर में उतरने से इतना तो साफ हो गया है कि कांग्रेस बसपा-सपा गठबंधन से लेकर भाजपा को यूपी में वाकओवर नहीं देने वाली है।

प्रियंका में इंदिरा गांधी का अक्स देखने वाले कार्यकर्ताओं को उम्मीद है कि उनके सक्रिय राजनीति में आने से पार्टी का परम्परागत वोट बैंक दुबारा वापस मिलेगा। दरअसल, पूर्वांचल न सिर्फ कांग्रेस का पुराना गढ़ रहा है बल्कि अब भाजपा की राजनीति के दो मजबूत चेहरे पीएम नरेन्द्र मोदी और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ का कर्मक्षेत्र भी है। बीते लोकसभा चुनावों में इस क्षेत्र के आंकड़े तस्दीक करते हैं कि राम मंदिर आंदोलन से पहले कांग्रेस को यहां शिकस्त देना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आसान नहीं रहा, लेकिन राम मंदिर आंदोलन के बाद धीरे-धीरे कांग्रेस नेपथ्य में चली गई। कांग्रेस के वोटबैंक माने जाने वाले पिछड़े और दलित वोटों पर सपा-बसपा का कब्जा हो गया तो अगड़ों का वोट भाजपा के पक्ष में खिसक गया।

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पूर्वांचल में गोरखपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, भदोही, प्रतापगढ़, मिर्जापुर, जौनपुर, चंदौली, गाजीपुर, कुशीनगर, देवरिया, आजमगढ़, मऊ, महराजगंज, बस्ती, संत कबीरनगर, सिद्धार्थनगर, बलिया और सोनभद्र यानी 19 जिले आते हैं। 2014 की मोदी लहर में आजमगढ़में मुलायम सिंह यादव की सीट को छोडय़हां की सभी 33 सीटें भाजपा के खाते में चली गईं। पूरे यूपी में 66 सीटों पर लडऩे वाली कांग्रेस सिर्फ रायबरेली और अमेठी तक सिमट गई थी। 2009 के लोकसभा चुनाव में कर्ज माफी की बैसाखी पर चुनाव में उतर कर कांग्रेस ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया था। उसे पूर्वांचल की 13 सीटों पर जीत मिली थी। योगी के गढ़ माने जाने वाले गोरखपुर-बस्ती मंडल की 9 में से 3 सीटों पर कांग्रेस जीतने में सफल हुई थी। डुमरियागंज से जगदम्बिका पाल, महराजगंज से हर्षवर्धन और कुशीनगर से कुंवर आरपीएन सिंह जीते थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में कुंवर आरपीएन सिंह को छोड़ कोई कांग्रेसी प्रत्याशी जमानत तक नहीं बचा सका था।

संगठन को मजबूती से खड़ा करना होगा

गोरखपुर-बस्ती मंडल की नौ सीटों में कुशीनगर, डुमरियागंज और महराजगंज को छोड़दें तो अन्य पर कांग्रेस पिछले तीन दशक से एक जीत के लिए तरस रही है। गोरखपुर में कांग्रेस तीन दशक में अपनी जमानत तक नहीं बचा सकी है। गोरखपुर सदर सीट पर अभी तक हुए 18 लोकसभा चुनावों में सात बार जीत हासिल करने वाली कांग्रेस के पास वर्तमान में मजबूत दावेदार तक नहीं है। गोरखपुर की दूसरी लोकसभा सीट से जीतकर कांग्रेसी दिग्गज महावीर प्रसाद केन्द्रीय मंत्रीमंडल से लेकर राज्यपाल की कुर्सी तक पहुंचे लेकिन उनके निधन के बाद संसदीय सीट पर कांग्रेस जीत का सूखा झेल रही है। महराजगंज में कांग्रेसी दिग्गज जितेन्द्र प्रसाद के बाद वर्ष 2009 में हर्षवर्धन ने अंतिम बार कांग्रेस को जीत दिलाई थी, लेकिन उनके निधन के बाद कांग्रेस कार्यकर्ता अपने में ही जूझ रहे हैं। बस्ती मंडल की तीन लोकसभा सीटों पर शुरुआती वर्षों को छोड़दें तो कांग्रेस के समक्ष जमानत बचाने की चुनौती रही है। बस्ती लोकसभा सीट पर कांग्रेस तीन दशक से जीत नहीं पाई है। अंतिम बार वर्ष 1984 में राम अवध प्रसाद ने कांग्रेस के सिंबल पर जीत हासिल की थी। संतकबीर नगर सीट पर भी कांग्रेस को 1989 से जीत का इंतजार है। वर्तमान में सिर्फ कुशीनगर ऐसी सीट है जहां पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरपीएन सिंह अपना मजबूत दखल बनाए हुए हैं। 2009 में आरपीएन सिंह को जीत मिली थी, लेकिन 2014 में वह भाजपा प्रत्याशी राजेश पांडेय से हार गए थे।

जातीय समीकरण साधना भी चुनौती

कांग्रेसी रणनीतिकारों की कोशिश जातीय समीकरण को दुरुस्त करना भी है। पूर्वांचल ब्राह्मणों का मजबूत गढ़माना जाता है। योगी आदित्यनाथ के राजपूत प्रेम से ब्राह्मणों में गुस्सा तो है लेकिन उनके पास भाजपा के सिवा दूसरा विकल्प भी नहीं है। प्रिंयंका की राजनीति में दखल के बाद ब्राह्मण वोटों पर असर पडऩा तय माना जा रहा है। कांग्रेस उन सीटों पर दलितों का वोट भी अपनी तरफ खींचने की कोशिश करेगी जहां से गठबंधन का सपा उम्मीदवार खड़ा होगा।

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आसान नहीं डगर

बहरहाल लोगों का मानना है कि गोरखपुर उपचुनाव में भले ही योगी को पटखनी मिली हो लेकिन अबकी बार विपक्ष को यहां से जीत हासिल करना आसान नहीं होगा।

पूर्वांचल में कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जोश भरना और जनता के बीच पार्टी के लिए जगह बनाना प्रियंका के लिए आसान नहीं तो मुश्किल भरा भी नहीं है। प्रियंका में पार्टी को दोबारा खड़ा कर पाने की क्षमता भी है। उनके आने से कांग्रेस त्रिकोणीय मुकाबले में साफ दिखने लगी है।

- डा. घनश्याम पांडेय, महराजगंज पीजी कॉलेज के पूर्व प्राचार्य

कांग्रेस हमेशा से परिवारवाद को बढ़ावा देती रही है। उसमें एक ही परिवार के लोग सारे शीर्ष पदों पर हैं। जबकि भाजपा में कोई सामान्य कार्यकर्ता भी देश का प्रधानमंत्री तक बन सकता है। प्रियंका को महासचिव बनाना कांग्रेस की परिवारवादी सियासत है। इससे भाजपा पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

- अजय कुमार श्रीवास्तव, भाजपा

बहन जी की बातों में सच्चाई है कि पूर्वांचल ही नहीं पूरे यूपी में कांग्रेस का कोई जनाधार नहीं बचा है। वह चाहे जितनी कोशिश कर लें, उन्हें एक भी सीट नहीं मिलने वाली है। पूर्वी ही नहीं पूरे यूपी में बसपा सपा गठबंधन सबसे मजबूत है।

- श्रवण कुमार निराजा, बसपा

प्रियंका भले ही किसी पद पर नहीं रही हों लेकिन वह कांग्रेस का चेहरा रही हैं। उनका कोई जादू चलेगा, ऐसी उम्मीद नहीं दिख रही है।

- जियाउल इस्लाम, सपा

मुस्लिम आज भी कांग्रेस का वोटर है। कांग्रेस की कमजोरी से ही यह वोटबैंक छिटका था। कांग्रेस मजबूत होती है तो वह मुस्लिमों की पहली पसंद होगी।

- डा.अजीज अहमद, वरिष्ठï चिकित्सक

प्रियंका में इंदिरा गांधी की छवि भी नजर आती है। उनका सहज अंदाज हर किसी को आकर्षित करता है। वो अपनी सौम्य मुस्कुराहट से जनता को कायल करना जानती हैं।

- तलत अजीज, कांग्रेस

प्रियंका गांधी युवाओं से लेकर बुजुर्ग मतदाताओं में लोकप्रिय हैं। उनके सक्रिय राजनीति में आने से पूर्वांचल ही नहीं पूरे देश की राजनीति में असर दिखेगा। उन्हें पूर्वांचल की पूरी समझ है।

- हरिकेश बहादुर, कांग्रेस के पूर्व सांसद

युवा, महिला और मुस्लिम वोटों पर पड़ेगा असर

शारिब जाफरी

लखनऊ: पूर्वी यूपी की सीटों पर कांग्रेस का खास प्रभाव है। फूलपुर से जवाहर लाल नेहरू सांसद रहे। वाराणसी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है। पार्टी ने प्रियंका गांधी को पूर्वी यूपी की कमान देकर मोदी को बतौर प्रत्याशी भी चुनौती देने की कोशिश है। 2014 में कांग्रेस की हालत प्रदेश में सबसे ज्यादा खस्ता थी। 59 सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी। 6 सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशी दूसरे नम्बर पर रहे पर जीत हार का अंतर बहुत ज्यादा था। वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर को गाजियाबाद में जनरल वीके सिंह से 567676 वोटों से हार मिली थी। सहारनपुर में इमरान मसूद 65 हजार वोटों से हारे थे। फूलपुर के उपचुनाव में कांग्रेस को 2.46 फीसदी वोट मिले थे जबकि निर्दलीय चुनाव लड़े अतीक अहमद ने इससे दोगुने वोट हासिल किए थे। अब कांग्रेसियों को प्रियंका के सक्रिय राजनीति में आने बाद माहौल बदलने की उम्मीद जगी है।

'प्रियंका गांधी को राष्ट्रीय महासचिव बनाने के लिये जो दिन चुना है वह नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का जन्मदिन है। देश की जनता प्रियंका गांधी में इन्दिरा गांधी की छवि देखती है। राहुल गांधी के नेतृत्व में, प्रियंका गांधी के मार्ग निर्देशन में और सोनिया गांधी के आशीर्वाद से पार्टी को ''इन्दिरा युग की वापसी'' करने में सफलता मिलेगी।

- प्रमोद तिवारी, वरिष्ठ कांग्रेस नेता

'प्रियंका गांधी के सक्रिय राजनीति में आने से पार्टी को नई ऊर्जा मिली है। जनता से सीधा कनेक्ट करने की खूबी के अलावा पदाधिकारियों की बात अब उनके जरिए सीधे आलाकमान तक पहुंच सकेगी। प्रियंका गांधी जैसी करिश्माई नेतृत्व का एलान होते ही सत्ताधारी दल के नेताओं के होश उड़ गए हैं। कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ा है।'

- इमरान मसूद, कांग्रेस प्रदेश उपाध्यक्ष

'प्रियंका गांधी के सक्रिय राजनीति में आने से युवाओं में नई उम्मीद जगी है। अभी तक लोगों में कांग्रेस को वोट देने का मतलब मत बेकार जाने जैसी फीलिंग रहती थी लेकिन वह अब दूर हो गई है। वैसे, अब विपक्षी राहुल गांधी को कमजोर साबित करने की कोशिश भी कर सकते हैं।'

- प्रियंका त्रिवेदी शर्मा

'प्रियंका गांधी के सक्रिय राजनीति में आने से भले ही युवा वोटर भले ही कांग्रेस की तरफ आकर्षित हों लेकिन आम मतदाता कांग्रेस तरफ जाएगा ऐसा नहीं लगता है। कांग्रेस यदि प्रियंका गांधी को पीएम कैंडिडेट घोषित कर के मैदान में उतारे तो निश्चित ही कांग्रेस बम्पर जीत की राह पर चल पड़ेगी। वह अच्छी पॉलिटिशियन हैं और काम भी किया है।'

- श्वेता भार्गवा

'अब न सिर्फ युवा बल्कि महिलाएं भी कांग्रेस की तरफ आकर्षित होंगी। प्रियंका के काम करने का तरीका, बात करने अन्दाज़ और उनमें इन्दिरा गांधी का अक्स आम मतदाताओं को भी कांग्रेस की तरफ आने के लिए मजबूर करेगा।'

- सना नावेद

'इस बदलाव से हो सकता है कि कांग्रेस के संगठन को फायदा हो लेकिन यूपी की राजनीति में कोई फर्क नहीं पडऩे वाला क्योंकि गठबंधन में एकतरफ विकास के माडल के तौर पर पहचान रखने वाले अखिलेश यादव हैं तो दूसरी तरफ दलितों शोषितों और गरीबों की मसीहा मायावती हैं।'

- पूजा शुक्ला, लखनऊ विश्विद्यालय की छात्र नेता

'सिर्फ चेहरे के दम पर कायाकल्प नहीं होने वाला है। प्रियंका गांधी को मजबूती से जन भावना से जुड़े मुद्दे उठाने होंगे। बेरोजगारी, हेल्थ और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों पर अपनी स्पष्ट राय रखनी होगी। जनता को भरोसा दिलाना होगा की वो उनके लिए मजबूती से लड़ेंगी तभी कांग्रेस को फायदा मिलेगा।

- आराधना सिंह, समाज सेविका

'प्रियंका गाँधी का सीधा जनता से कनेक्ट करने का अंदाज दूसरे नेताओं के मुकाबले उन्हें अलग कैटेगरी का नेता बना देता है। जनता के बीच खेत खलिहान में बैठ जाना, साथ में खाना खा लेना जैसी उन की अदाएं अपनेपन का एहसास दिलाती हैं। उम्मीद है कि कांग्रेस को फायदा होने होगा।'

- अर्शी इकबाल, मुरादाबाद

रायबरेली में मिलीजुली प्रतिक्रिया

रायबरेली से नरेन्द्र सिंह

2004 के लोकसभा चुनाव में प्रियंका ने रायबरेली में चुनाव प्रबंधन की कमान संभाली थी और सोनिया गांधी रिकॉर्ड मतों से जीती थीं

सपा नेता पारुल बाजपेयी का कहना है कि बसपा-सपा गठबंधन के कारण प्रियंका गांधी को राजनीति में उतारना पड़ा है। प्रियंका गांधी के राजनीति में आने से चुनाव पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उनको महासचिव बनाना कांग्रेस की बौखलाहट दर्शाती है।

एडवोकेट किरण प्रताप सिंह का कहना है कि प्रियंका के आने से कांग्रेस को मजबूती मिलेगी। प्रियंका में इंदिरा की छवि रायबरेली की जनता देखती है। लोग बहुत पहले से प्रियंका की राजनीती में एंट्री चाह रहे थे।

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दवा व्यवसायी नजीब आलम का कहना है कि कांग्रेस को ये कदम बहुत पहले ही उठा लेना चाहिए था, लेकिन देर आए दुरुस्त आए। रायबरेली के लिए ये बहुत ही सौभाग्य की बात है।

भाजपा एमएलसी दिनेश प्रताप सिंह ने कहा कि प्रियंका गांधी का कद बहुत ही बड़ा है। मैंने यूपीए प्रथम और यूपीए द्वितीय दोनों देखा है। लोग उनसे मिलने के लिए लाइन लगाते थे। मुझे लगता है कि प्रियंका गांधी का डिमोशन हुआ है। रायबरेली की जनता में प्रियंका गांधी का कोई ग्लैमर नहीं है। मेरी समझ में प्रियंका गांधी जैसा झूठा नेता पूरे देश में नहीं है।

रायबरेली में सोनिया गांधी के सांसद प्रतिनिधि केएल शर्मा ने इसे कांग्रेस का एक बेहतर कदम बताया। इससे कार्यकर्ताओं में जोश आएगा और कांग्रेस मजबूत होगी। पूरे उत्तर प्रदेश में इसका असर देखने को मिलेगा।

डा.आशा शंकर वर्मा ने कहा कि सोनिया लगातार बीमार चल रही थी, ऐसे में प्रियंका को जिम्मेदारी देकर कांग्रेस ने सही कदम उठाया है। रायबरेली की जनता चाहती है कि वो रायबरेली से चुनाव लड़ें।

अमेठी में सभी ने किया स्वागत

अमेठी से असगर नकी

अमेठी कांग्रेस के प्रवक्ता अनिल सिंह कहते हैं कि अमेठी में बीजेपी की नकली दीदी के मुकाबले हमारी असली दीदी हर दिल में बसती हैं। प्रियंका गांधी के कांग्रेस में आने के बाद निश्चित तौर पर हम यूपी में सशक्त होंगे। इस बार स्मृति ईरानी को जमानत बचा पाना मुश्किल होगा।

कांग्रेस के प्रदेश सचिव एवं सुल्तानपुर-अमेठी के पूर्व जिलाध्यक्ष हाजी मकसूद आलम कहते हैं कि प्रियंका गांधी पार्टी में प्रत्यक्ष रूप से न होते हुए भी पहले से सक्रिय थीं। अब यूपी में कोई कांग्रेस का बाल भी बांका नहीं कर सकता। उत्तर प्रदेश में हमारी पार्टी का ग्राफ में तेजी से बढ़ेगा।

फिल्म सेंसर बोर्ड के पूर्व सदस्य एवं कांग्रेस नेता विजय श्रीवास्तव कहते हैं कि प्रियंका गांधी को कमान मिलने से अमेठी-रायबरेली लोकसभा सीटों से सटी अन्य लोकसभा सीटों पर अब सीधा असर पड़ेगा। पार्टी कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा आएगी और गुटबाजी पर भी नकेल कसेगी।

युवक कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता राजेश तिवारी कहते हैं कि यह क्रांतिकारी कदम है जिससे नए उत्साह का संचार हुआ है। इसका असर पूरे देश की राजनीति में होगा, प्रियंका में इन्दिराजी की छवि दिखती है।

अमेठी के भाजपा जिलाध्यक्ष दुर्गेश त्रिपाठी का कहना है कि कांग्रेस पार्टी वंशवाद और परिवारवाद में हमेशा से घिरी रही है। अब कोई नया अध्याय कांग्रेस में नहीं जुड़ा है। स्मृति ईरानी ने जिस तरह हार के बाद भी अमेठी में विकास की गंगा बहाई उसे प्रियंका गांधी सपने में भी नहीं सोच सकती थीं। प्रियंका के आने से कोई खास असर नहीं पडऩे वाला। 2019 में भाजपा पूरे दम खम के साथ दिल्ली की सत्ता में आ रही है।

सपा के जगदीशपुर विधानसभा के मीडिया प्रभारी सुरजीत यादव का कहना है कि यह अमेठी, यूपी और देश के लिए एक बेहतर कदम है। पार्टी से हटकर अगर एक अमेठी के नागरिक की हैसियत से हम कहें तो बेहद खुशी का मौका है। जिस तरह हाल के दिनों में राहुल गांधी अकेले पार्टी के खेवनहार बने थे अब प्रियंका के आने से उन्हें बेहतर सारथी मिला है।

अधिवक्ता विवेक विक्रम सिंह कहते हैं कि निश्चित तौर पर देश की राजनीति में असर पडऩे वाला है। प्रियंका आम कार्यकर्ताओं से सीधे जुड़ती हैं और मठाधीशों के भरोसे नहीं रहती हैं। कांग्रेस के दांव का रायबरेली, अमेठी, सुल्तानपुर, फतेहपुर, प्रतापगढ़ सीटों पर सीधा असर पड़ेगा।

हुसैनी मंच यूपी के संरक्षक एवं जेएनयू के रिसर्च स्कालर मौलाना अदीब का कहना है कि अगर प्रियंका मुस्लिम-दलित को साथ लेकर काम करती हैं तो बीजेपी के बुरे दिन आ सकते हैं। अगर मुस्लिम और दलित कांग्रेस में शोषित हुए तो फिर कांग्रेस धरातल पर दिखने से रही। पीएल पुनिया को यूपी में तरजीह दी जानी चाहिए।

रिटायर्ड प्रोफेसर डा.अंगद सिंह का कहना है कि प्रियंका गांधी एक शालीन नेता हैं। उन पर परिवारवाद का आरोप लग रहा है लेकिन जो यह आरोप लगा रहे हैं उनके भी बेटे और परिवार वाले ही विरासत संभाल रहे हैं।

सोनिया गांधी अगर रायबरेली सीट छोड़ती हैं तो वहां की विरासत प्रियंका संभाल सकती हैं क्योंकि अमेठी-रायबरेली की जनता बाहरी लोगों को लाइक नहीं करती।

सुल्तानपुर के दिनकर श्रीवास्तव का कहना है कि कांग्रेस का वोट बैंक बढ़ेगा और नुकसान भाजपा के साथ सपा और बसपा को नुकसान होगा। प्रियंका वोट कन्वर्ट करा सकती हैं। अब कांग्रेस में मठाधीशी का दौर समाप्त होगा।

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सीमा शर्मा लगभग ०६ वर्षों से डिजाइनिंग वर्क कर रही हैं। प्रिटिंग प्रेस में २ वर्ष का अनुभव। 'निष्पक्ष प्रतिदिनÓ हिन्दी दैनिक में दो साल पेज मेकिंग का कार्य किया। श्रीटाइम्स में साप्ताहिक मैगजीन में डिजाइन के पद पर दो साल तक कार्य किया। इसके अलावा जॉब वर्क का अनुभव है।

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