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सहारनपुर मामला: नए मोड़ पर बहस, उलेमा ने कहा पत्नी को नहीं तलाक देने का अधिकार

तंजीम अब्नाए दारुल उलूम के अध्यक्ष मुफ्ती यादे इलाही कासमी व जमीयत उलेमा-ए-हिंद से वाबस्ता मुफ्ती जाकिर हुसैन कासमी ने भी महिला द्वारा अपने पति को दिये गये तलाक को इस्लाम की नजर में अमान्य बताया। मर्द स्वयं तलाक दे सकता है और औरत को खुला लेने के लिए शरई दारुल कजा यानी अधिकृत इस्लामी संगठन में जाना होगा।

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zafarBy zafar

Published on 8 Aug 2016 2:24 PM GMT

सहारनपुर मामला: नए मोड़ पर बहस, उलेमा ने कहा पत्नी को नहीं तलाक देने का अधिकार
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सहारनपुर: तलाक को लेकर लंबे समय से चल रही है बहस अब एक और मोड़ पर पहुंच गई है। सहारनपुर में एक महिला द्वारा पति को तलाक दिये जाने के बाद बहस छिड़ गई है कि क्या पत्नी को तलाक का अधिकार है? देवबंद के उलेमा ने महिला द्वारा तलाक देने को इस्लाम की नजर में अमान्य बताया है। उलेमा ने कहा कि तलाक केवल मर्दों का अधिकार है, महिला चाहे तो जायज तरीकों से ‘खुला’ का प्रावधान इस्तेमाल कर सकती है।

नए मोड़ पर तलाक

-सहारनपुर के नानौता में साली से छेड़छाड़ करने के आरोप में विवाहिता ने अपने पति को तलाक दे दिया जिसने एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

-इस मामले पर अपनी राय का इजहार करते हुए दारुल उलूम देवबंद के वरिष्ठ मुफ्ती आरिफ कासमी ने कहा कि इस्लाम धर्म में तलाक देने का अधिकार केवल मर्दों को है और किसी भी परिस्थिति में औरत अपने शौहर को तलाक नहीं दे सकती।

-मुफ्ती ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति बदचलन है या फिर उसकी बीवी को उससे और कोई जायज परेशानी है तो ऐसी सूरत में वह महिला शरई दारुल कजा पहुंचकर अपने पति से ‘खुला’ करा सकती है, यानी संबंध विच्छेद कर सकती है।

संगठनों ने बताया अमान्य

-तंजीम अब्नाए दारुल उलूम के अध्यक्ष मुफ्ती यादे इलाही कासमी व जमीयत उलेमा-ए-हिंद से वाबस्ता मुफ्ती जाकिर हुसैन कासमी ने भी महिला द्वारा अपने पति को दिये गये तलाक को इस्लाम की नजर में अमान्य बताया।

-इन संगठनों ने कहा कि इस्लाम में जहां मर्दों को अधिकार दिये हैं वही औरतों के हुकूक का भी पूरी तरह ख्याल रखा गया है।

-इस्लाम के मुताबिक अगर कोई औरत निकाह के बाद अपने पति के साथ खुश नहीं है, तो वह शरई अदालत या फिर इलाके के काजी का दरवाजा खटखटा सकती है। और अपनी जायज परेशानी का सुबूत देते हुए अपने खुला के जरीये अपने पति से अलग हो सकती है।

क्या है खुला

-इस्लाम धर्म में जिस तरह निकाह के बाद मर्द को तलाक देने का अधिकार दिया गया है उसी तरह इस्लाम ने औरत को भी जायज वजहों पर अपने पति से खुला करते हुए अलग हो जाने का पूरा-पूरा अधिकार दिया है।

-फर्क बस इतना है कि मर्द स्वयं तलाक दे सकता है और औरत को खुला लेने के लिए शरई दारुल कजा यानी इस अमल के लिये अधिकृत इस्लामी संगठन में जाना होगा।

-खुला करने के लिए औरत अपने मर्द को खुद भी राजी कर सकती है और अगर मर्द राजी न हो तो दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद काजी-ए-वक्त अपना फैसला सुनाते हुए खुला कर दोनों को निकाह के रिश्ते से अलग कर सकता है।

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