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कुछ यूं मिला मां-बाप का प्यार, कि फूट फूट कर रोए बरसों के बिछुड़े मासूम

भागलपुर से अपने बेटे नंदन को लेने आई मां कुंती देवी तो बच्चे को देखते ही बेहोश हो गईं। होश में आने पर बेटे के गले लग कर मां खूब रोई और बेटे से कहा- बेटा अब मुझे छोड़ कर मत जाना। बेटा भी मां के गले लग कर फूट-फूट कर रोया।

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zafarBy zafar

Published on 14 Nov 2016 2:22 PM GMT

कुछ यूं मिला मां-बाप का प्यार, कि फूट फूट कर रोए बरसों के बिछुड़े मासूम
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कुछ यूं मिला मां का आंचल, कि फूट फूट कर रोए बरसों के बिछुड़े मासूम

कानपुर: आंसू सिर्फ किसी के बिछुड़ जाने पर ही नहीं छलकते, बल्कि मिलने पर भी बह निकलते हैं। एक संस्था ने जब ऐसे ही कुछ बच्चों को उनके परिजनों से मिलवाया, तो हर किसी की आंखों के बांध टूट गए। बच्चे और माता-पिता एक दूसरे के गले लग कर फूट फूट कर खूब रोए। संस्था ने चिल्ड्रेन्स डे के मौके पर घर से बिछड़े ऐसे 20 बच्चों को उनके माता-पिता के साथ घर भेज दिया।

छलक उठीं आंखें

-कानपुर की संस्था 'साथी' ने बाल दिवस पर 20 बच्चों को मां के आंचल और पिता के दामन का तोहफा दिया।

-बिछुड़े बच्चों और मां-बाप का यह मिलन कुछ ऐसा था कि हर कोई फफक फफक कर रो पड़ा।

-बिहार के भागलपुर से अपने बेटे नंदन को लेने आई मां कुंती देवी तो बच्चे को देखते ही बेहोश हो गईं।

-होश में आने पर बेटे के गले लग कर मां खूब रोई और बेटे से कहा- बेटा अब मुझे छोड़ कर मत जाना। बेटा भी मां के गले लग कर फूट-फूट कर रोया।

-कानपुर का सुनील पढाई के लिए पिता की डांट के बाद घर छोड़ गया था। अब पिता से मिला तो आंखों से आंसू छलक पड़े।

-परिवार से मिलने वालों में कानपुर के वीरू, रायपुर के दीपक, भागलपुर के नंदन और पृथ्वी, बिहार के दिनिया के रविशंकर, जालौन के दीप चंद, खलीलाबाद के अभिषेक, सिद्धार्थनगर के अभिषेक, रामदेव और अनिल, इटावा के करन, बहराइच के आजाद, मथुरा के अमित, कोलकाता के सलमान, वंशीपुर के संतेंद्र, चित्रकूट के राम्मुरात, फतेहपुर के जुनैद, झांसी के रामजी शामिल हैं।

गरीबी का अभिशाप

-सुशील साहू और जुनैद के पिता बढ़ई हैं, तो दीपक, दीप, सुनील के पिता मजदूर।

-नंदन, रवि, प्रमोद,करन, सतेंद्र, राम्मुरात, अनिल , रामदेव और रामजी के पिता गरीब किसान।

-वीरू और अभिषेक के पिता निजी कंपनियों के कर्मचारी हैं, पृथ्वी और गिरिराज के पिता ड्राइवर हैं और सलमान के पिता टेलर।

-इस मौके पर मौजूद एसएसपी आकाश कुलहरी ने शोध के हवालों से कहा कि ये बच्चे गरीब घरों से होते हैं, जिन्हें खेलने के लिए समय नहीं मिलता, स्कूल का डर होता है या घरेलू हिंसा के कारण घर छोड़ कर भाग जाते है।

-उन्होंने कहा कि समाज में यह भ्रान्ति है कि प्लेटफॉर्म पर रहने वाले बच्चे माता-पिता द्वारा ठुकराए हुए होते हैं।

आगे स्लाइड्स में देखिए कुछ और फोटोज...

कुछ यूं मिला मां का आंचल, कि फूट फूट कर रोए बरसों के बिछुड़े मासूम

कुछ यूं मिला मां का आंचल, कि फूट फूट कर रोए बरसों के बिछुड़े मासूम

कुछ यूं मिला मां का आंचल, कि फूट फूट कर रोए बरसों के बिछुड़े मासूम

कुछ यूं मिला मां का आंचल, कि फूट फूट कर रोए बरसों के बिछुड़े मासूम

कुछ यूं मिला मां का आंचल, कि फूट फूट कर रोए बरसों के बिछुड़े मासूम

कुछ यूं मिला मां का आंचल, कि फूट फूट कर रोए बरसों के बिछुड़े मासूम

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कुछ यूं मिला मां का आंचल, कि फूट फूट कर रोए बरसों के बिछुड़े मासूम

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