Top

आंखों में आज भी ताजा है वह मंजर,जब पति-देवर को बस से उतारा था पुलिस ने

Admin

AdminBy Admin

Published on 4 April 2016 4:49 PM GMT

आंखों में आज भी ताजा है वह मंजर,जब पति-देवर को बस से उतारा था पुलिस ने
X
  • Facebook
  • Twitter
  • Whatsapp
  • Telegram
  • Linkedin
  • Print
  • Facebook
  • Twitter
  • Whatsapp
  • Telegram
  • Linkedin
  • Print
  • Facebook
  • Twitter
  • Whatsapp
  • Telegram
  • Linkedin
  • Print

ved prakash singh ved prakash singh

लखनऊ: 25 साल पहले तीर्थयात्रा से वापस लौट रहे 11 सिखों को उग्रवादी बताकर फेक एनकाउंटर में मारने के मामले में फैसला आने के बाद पीड़ितों का दर्द छलक कर बाहर आया। ऐसी ही एक पीड़ित हैं बलविंदर जीत सिंह कौर। जिनकी आंखों में आज भी वो मंजर ताजा है। परमिंदर जीत उसी बस में सवार थीं जिससे उनके पति और देवर को उतारा गया था। जानिए बलविंदर जीत सिंह कौर की जुबानी, उस दिन की कहानी।

12 जुलाई 1991 की सुबह का वह मंजर आज भी आंखों में ताजा है, जब पीलीभीत के बॉर्डर के पास कुछ पुलिसवालों ने हमारी बस को रुकवाया था। उसमें बैठे सभी 11 युवकों को उतारकर अपनी मेटाडोर में बैठा लिया था।

इसके बाद कुछ सिपाहियों ने हमारी बस पर कब्जा कर लिया और हमें जंगल-जंगल 14 घंटे तक टहलाते रहे। जिन 11 लोगों को बस से उतारा था उसमें मेरे देवर और पति भी थे। उस दिन के बाद से हमने उनकी सूरत तो नहीं देखी लेकिन आज भी आंखों में उनके खौफजदा चेहरे और मंजर ताजा हैं।

ये भी पढ़ें...’25 साल बाद मिला मेरे बेटे को इंसाफ, अब मैं सुकून से मर सकूंगा’

उस वक्त पुलिस ने कहा था कि इनकी जांच-पड़ताल करनी है। इन्हें बाद में घर भेजा जाएगा। इसके बाद हम सब को उस बस में कुछ पुलिसकर्मियों के साथ रवाना कर दिया गया। इतना बताते-बताते बलविंदर की आंखें आंसुओं से भर जाती है।

फफकते हुए कुछ बोलने की कोशिश करती बलविंदर जीत सिंह कौर ने बताया, 'हमारी शादी को सिर्फ सात महीने हुए थे। हम अपने अपने देवर जसवंत और पति बलजीत सिंह के साथ यात्रा पर निकले थे। उस समय मैं प्रेग्नेंट थी। उनकी मौत के दो महीने बाद मैंने करमवीर को जन्म दिया। जो आज 24 साल का हो गया है। वह भी फैसले के वक्त कोर्ट में रहना चाहता था, लेकिन खर्च की वजह से नहीं आ सका।'

ये भी पढ़ें...25 साल बाद मिला इंसाफ, विक्टिम फैमिली बोली- मौत की सजा मिलनी चाहिए थी

पुलिसवाले करते रहे बदतमीजी

बलविंदर जीत सिंह कौर ने बताया कि सुबह आठ बजे के बाद से वह बस जंगलों में पता नहीं कहां-कहां घूमती रही। हमारे साथ बैठे कुछ पुलिस वाले ड्राईवर को रास्ते के बारे में बताते रहे। वह उन्हीं राहों पर चलता रहा। इस दौरान पुलिस वालों ने हमसे बदतमीजी भी की।

बुजुर्गों के बांध दिए थे हाथ

बलविंदर जीत सिंह कौर ने बताया कि हम सब बस रोकने के लिए गिड़गिड़ाते रहे। इस दौरान उन्होंने कुछ खाने-पीने को भी नहीं दिया। मेरे प्रेग्नेंट होने और बच्चे का वास्ता देने के बाद भी उन्होंने गाड़ी नहीं रोकी। बस में सवार जितने भी बुजुर्ग थे पुलिसवालों ने उन सभी के हाथ पीछे कर सीट से बांध दिए थे।

लाशें तक जला दीं, अस्थियां भी नहीं दीं

बलविंदर ने बताया कि उनके जुल्म की कहानी यहीं नहीं रुकी। हम अपनों की तलाश करते रहे लेकिन किसी का कुछ पता नहीं मिला। 13 जुलाई को पता चला कि जिन्हें पुलिस ने हमारी आंखों के सामने बस से उतारा था उसे आतंकी बताकर मार दिया गया। उनकी लाशों को लावारिस बताकर जला दिया गया।

इतना बताते-बताते बलविंदर की आंखें डबडबा गई। उन्होंने कहा कि हमें उनकी अस्थियों के फूल तक नहीं दिए गए। उनके अंतिम संस्कार नहीं कर पाने का मलाल आज भी है।

Admin

Admin

Next Story