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प्रियंका गांधी: कांग्रेस का ब्रह्मास्त्र, सभी के सामने नई रणनीति बनाने की मजबूरी 

raghvendra

raghvendraBy raghvendra

Published on 25 Jan 2019 7:27 AM GMT

प्रियंका गांधी: कांग्रेस का ब्रह्मास्त्र, सभी के सामने नई रणनीति बनाने की मजबूरी 
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योगेश मिश्र योगेश मिश्र

लखनऊ: सपा-बसपा गठबंधन में जगह न मिलने के बाद जब राहुल गांधी उत्तर प्रदेश की सभी सीटों पर चुनाव लडऩे की घोषणा कर रहे थे, तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि राहुल अपने तरकश से पार्टी का ब्रह्मास्त्र निकालने वाले हैं। यूपी को फतह करने का नया फार्मूला देने वाले हैं। अर्से से चल रहे कयासों के बीच प्रियंका की सियासी एंट्री का टॉनिक कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को पिलाने वाले हैं। लंबे समय से प्रियंका को सक्रिय राजनीति में लाने की कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और नेताओं की मांग पूरी करने वाले हैं।

बीते 23 जनवरी को सुबह दस बजे के आसपास राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी, मायावती और अखिलेश यादव की जोड़ी के सामने कांग्रेस की भी राहुल-प्रियंका की जोड़ी पेश कर दी। कांग्रेस महासचिव अशोक गहलोत की ओर से जारी प्रेस रिलीज में यह कहा गया कि राहुल गांधी ने प्रियंका गांधी को कांग्रेस महासचिव के पद पर नियुक्ति दी है। उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभार दिया गया है, जबकि इसी के साथ मध्य प्रदेश के नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी महासचिव बनाते हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश का कामकाज दिया गया है। यह प्रेस विज्ञप्ति जारी किए जाने के समय राहुल गांधी अमेठी में थे और प्रियंका विदेश में। लेकिन इस सूचना के बाद ही सियासी हल्कों में भूचाल सा आ गया। कांग्रेस को गठबंधन में हाशिए पर रखने वाले सपा और बसपा के नेताओं के माथे पर चिंता की लकीरें पढ़ी जाने लगीं। आमने-सामने की लड़ाई में जंग जीतने का सपना संजोए भाजपा नेताओं के लिए भी प्रियंका परेशानी का सबब हैं, यह उनके बयानों में दिखायी देने लगा। प्रियंका की सक्रिय राजनीति में एंट्री की खबरों ने ही कांग्रेस को एक ऐसा किक दिया जिसे राहुल वर्षों से दे नहीं पा रहे थे।

प्रियंका में इंदिरा की छवि

प्रियंका के व्यक्तित्व में एक सम्मोहन है। तमाम लोगों को इंदिरा गांधी की छवि उनमें नजर आती है। वह ज्यादा हाजिर जवाब, ज्यादा वाकपटु हैं। उनकी छवि एक तेज और कड़े फैसले ले सकने में सक्षम स्पष्टवादी नेता की है। वह एक कुशल संगठनकर्ता हैं। इसकी नजीर अमेठी और रायबरेली के चुनाव संचालन के दौर में देखी और पढ़ी गई है। 1999 में जब सोनिया पहली बार चुनाव लडऩे अमेठी आईं तब प्रियंका ने चुनाव की कमान संभाल रखी थी। सोनिया के सामने सुषमा स्वराज जब बेल्लारी में मैदान में थी तो इस गैर हिंदी भाषी राज्य में भी प्रियंका का कनेक्ट देखते बनता था।

काफी दिनों से हो रही थी मांग

राहुल गांधी जब 2004 के चुनाव में अमेठी से मैदान में उतरे तब भी पर्दे के पीछे की राजनीति के सभी तार प्रियंका के हाथ थे। जिस समय राहुल राजनीति में नहीं आए थे उस समय भी उनसे दो वर्ष छोटी प्रियंका को राजनीति में लाने की मांग होती थी, यही नहीं मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ को कांग्रेस ने भले ही तकनीकी तौर पर जीत लिया हो, पर लगता है कि कांग्रेस के थिंक टैंक को मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में वह किक दिखा नहीं, जिसकी जरूरत थी, बल्कि भाजपा अपनी वजहों से भी हारी। ऐसे में दबाव था कि एक ब्रह्मास्त्र जो शस्त्रागार में बहुत दिनों से रखा है, उसे इस अवसर पर चल दिया जाना चाहिए।

अब त्रिकोणात्मक लड़ाई

प्रियंका के जरिए कांग्रेस ने सपा-बसपा को जवाब और धमकी दोनों दी है। आमने-सामने की लड़ाई को फिलहाल चर्चा में सही त्रिकोणात्मक तो बना ही दिया है। कांग्रेस के परंपरागत वोटर-दलित, मुसलमान और ब्राह्मणों के सामने एक नया विकल्प खोलकर रख दिया है। इसमें दलित बसपा के साथ हैं, मुसलमान सपा और ब्राह्मण भाजपा के साथ हैं। भाजपा की जमीनी पकड़ और सपा-बसपा के सामाजिक समीकरण की ताकत में सेंध लगने की चर्चा शुरू हो गई है। प्रियंका के आने के बाद अल्पसंख्यक मतदाता एकजुट होकर सपा-बसपा के सामने खड़ा नहीं मिलेगा। यह हिंदुत्व एकीकरण के समीकरण नहीं बनने देगा।

कांग्रेस को भी मिली जोड़ी

नरेंद्र मोदी, अमित शाह, अखिलेश यादव और मायावती ये सब फ्रंट फुट पर पॉलिटिक्स करने वाले नेता हैं। इनके बरअक्स कांग्रेस को भी एक फ्रंट फुट पालिटिशियन की जरूरत थी। हालांकि मायावती की फ्रंट फुट पॉलिटिक्स सिर्फ प्रेस रिलीज में होती है। राहुल गांधी बैक फुट पालिटिशियन हैं। प्रियंका की एंट्री की खबर ने सभी राजनीतिक दलों की तैयारी को अप्रासंगिक बना दिया है। हालांकि अभी किसी भी दल ने उम्मीदवार घोषित नहीं किए हैं, पर यह तो साफ हो ही गया था कि उत्तर प्रदेश में लड़ाई आमने-सामने की होगी। जाटव और यादव पारंपरिक बैरभाव को भूलकर वोट देंगे। अल्पसंख्यक ध्रुवीकरण सपा-बसपा के पक्ष में होगा। केंद्र और राज्य के सत्ता विरोधी रुझान का फायदा भी इन्हें ही मिलेगा। अल्पसंख्यक ध्रुवीकरण का फायदा उठाकर भाजपा हिंदू पोलराइजेशन का छींका टूटने की आस में लोकसभा में पिछली बार से अधिक सीटें पाने का टारगेट तय कर रही थी।

सूबे में होगी सबसे बड़ी लड़ाई

बीते लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को दो सीटें और सात दशमलव पांच फीसदी वोट मिले थे। जबकि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सात सीटें और छह दशमलव दो फीसदी वोट मिले। यह कांग्रेस का आलटाइम लो प्रदर्शन था। लोकसभा चुनाव की सबसे बड़ी लड़ाई उत्तर प्रदेश में लड़ी जाएगी।

ऐसे में प्रियंका की एंट्री से यह उम्मीद पाल लेना कि वह सीटों के लिहाज से कांग्रेस में कोई बड़ा करिश्मा कर पाएंगी, तार्किक नहीं होगा। लेकिन यह सही है कि उत्तर प्रदेश की तीन चौथाई से अधिक सीटों पर जमानत गंवाने के कांग्रेस के दिन खत्म होने वाले हैं। जिस दमखम से कांग्रेस लोकसभा चुनाव में उतर रही है उसी तरह विधानसभा चुनाव तक वह जुटी रही तो कांग्रेस अपनी अगुवाई में उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने का करिश्मा भी कर सकती है क्योंकि 2009 के चुनाव में कांग्रेस ने 21 सीटें हासिल की थीं इनमें अधिकांश सीटें प्रियंका गांधी को जिस इलाके का प्रभारी बनाया गया है उसी से थीं। इसी में योगी आदित्यनाथ और नरेंद्र मोदी की सीटें भी आती हैं। जिस तरह भाजपा स्मृति ईरानी के मार्फत राहुल गांधी को अमेठी में घेरने की रणनीति पर यह जानकर काम करती रहती है कि राहुल को हराना संभव नहीं है, उसी तरह योगी और मोदी को भी उनके क्षेत्रों में घेरने में प्रियंका कामयाब होती दिख सकती हैं।

वाड्रा की घेरेबंदी से मिलेगी सहानुभूति

ऐसा नहीं कि प्रियंका कांग्रेस पार्टी और राहुल के लिए महज एसेट हैं। सच यह भी है कि वह सक्रिय राजनीति में आने के साथ ही साथ परिवारवाद और अपने पति राबर्ट वाड्रा पर जमीन घोटालों के आरोप का बैगेज लेकर ही सियासत में उतरी हैं।

राजनीतिक विशेषज्ञ मानते है कि प्रियंका के सक्रिय राजनीति में आने के बाद जांच एजेंसियां वाड्रा और उनके परिजनों को तंग करेंगी तो सहानुभूति भी हासिल की जा सकेगी और यह बताना आसान होगा कि सब कुछ राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की वजह से हो रहा है। हालांकि 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय कांग्रेस ने एक प्रोफेशनल एजेंसी की सेवाएं ली थीं जिसने बताया था कि सोनिया अकेले वाजपेयी सरकार से टक्कर नहीं ले सकतीं।

इसी सुझाव के बाद राहुल गांधी ने ब्रिटेन की नौकरी छोड़ी और सक्रिय राजनीति में उपस्थिति दर्ज कराई। इसी कंपनी ने बाद में यह भी सुझाव दिया था कि राहुल और प्रियंका की जोड़ी एक और एक ग्यारह हो सकती है। हालांकि उस राय पर तकरीबन एक दशक बाद कांग्रेस में अमल हुआ है। इतना समय इसलिए लगा क्योंकि प्रियंका की पब्लिक अपील राहुल से ज्यादा है। लेकिन आज राहुल गांधी ने कई राज्यों में अपनी सरकार बनाकर अपनी उपस्थिति का अहसास करा दिया है। वह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर सफलता का परचम लहराते चले आ रहे हैं। ऐसे में प्रियंका राहुल के लिए कवर का काम करेंगी।

कई निराश नेताओं के लिए नया मुकाम

सपा और बसपा के गठबंधन के बाद दोनों के हिस्से में 38-38 सीटें आई हैं। अखिलेश को अपने हिस्से की 38 सीटों में से छोटे दलों को भी देना है। गठबंधन के दोनों दलों के 42-42 नेता टिकट पाने में कामयाब नहीं हो पाएंगे। भाजपा भी अपने 32 से 36 सांसदों का टिकट बदलने के मूड में है। यह भी खाली हो जाएंगे। प्रियंका के कांग्रेस में एंट्री के बाद ये उम्मीदभरी नजरों से कांग्रेस को नए मुकाम के रूप में देख रहे हैं।

भाजपा द्वारा गठबंधन धर्म का पालन नहीं किए जाने को लेकर निराश चल रहे छोटे दलों की भी उम्मीद की किरण है। इनमें भासपा और अपना दल दोनों हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो सांगठनिक रूप से जीर्ण शीर्ण हो चुकी कांग्रेस को चुनाव लडऩे वाले नेता तो मिल ही जाएंगे। कोई भी नेता जो अपने क्षेत्र में दो-तीन बार जीत चुका हो भले ही पिछली बार मोदी लहर में उसका टिकट उखड़ चुका हो तब भी उसके अपने समर्थकों और वोटरों की टीम तो होती ही है। सोनिया गांधी भी पार्टी में तब आई थीं जब कांग्रेस हाशिए पर थी। प्रियंका की भी एंट्री ऐसे ही समय कराई गई है।

अब फ्रंटफुट पर खेलेंगे राहुल

इस ब्रह्मास्त्र के चल दिए जाने के बाद राहुल गांधी का यह कहना कि बैक फुट पर नहीं, फ्रंट फुट पर खेलना चाहते हैं, यह बताता है कि प्रियंका के आने के बाद कांग्रेस अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव कर रही है। यह बदलाव कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और नेताओं के उत्साह में पढ़ा जा सकता है। उनका उत्साह बता रहा है कि चार राज्यों की सरकार ने उन्हें जितनी ऊर्जा नहीं दी है, उससे अधिक ऊर्जा प्रियंका की सक्रियता की खबर ने दी है। प्रियंका ने दिल्ली के माडर्न स्कूल से पढ़ाई की है, दिल्ली विश्वविद्यालय के जीसस एंड मैरी कालेज से मनोविज्ञान में स्नातक की डिग्री पाई। 2010 में बुद्धिस्ट स्टडीज में एमए किया, वह शौकिया रेडियो संचालक हैं। रेडियो जॉकी का काम उन्हें पसंद है। हिन्दी साहित्य में उनकी गहरी रुचि है। हिन्दी कविताएं और कहानियां पढऩा उन्हें बहुत पसंद है। फोटोग्राफी और खाना बनाना उनकी हाबी है। अपने बच्चों के लिए खाना वह खुद बनाती हैं।

प्रियंका की एंट्री के बाद हर राजनीतिक दल के सामने अपने वोटर सहेज कर रखने और नई रणनीति बनाने की मजबूरी आन खड़ी हुई है। अजित सिंह सपा बसपा गठबंधन में दो-तीन सीट पाने के बाद भी कांग्रेस के संपर्क में हैं। अखिलेश यादव की सत्ता को चुनौती देने के लिए चाणक्य की तरह अपनी चुटिया बांध लेने वाले उनके चाचा शिवपाल यादव के लिए भी कांग्रेस में उम्मीद का बड़ा मुकाम दिखने लगा है। प्रियंका के सामने भी उम्मीदों पर खरे उतरने की बड़ी चुनौती है। मोदी और अमित शाह के पास राहुल से निपटने के जो भी अस्त्र शस्त्र थे अब वह काम नहीं आने वाले हैं। इसलिए उन्हें अपने शस्त्रागार फिर से सजाने होंगे। राहुल गांधी सपा-बसपा गठबंधन के बाद भी जिस तरह अखिलेश यादव और मायावती के लिए श्रद्धानत हैं यही स्टैंड मायावती और अखिलेश को भी दिखाना होगा तभी इनका भी भाजपा हराओ अभियान परवान चढ़ सकेगा। कहा जाता है कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है।

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राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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