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एक ऐसा मंदिर, जहां देवी को खुश करने के लिए शरीर के 9 जगहों से खून निकालकर चढ़ाते हैं

Gorakhpur : गोरखपुर के बांसगांव तहसील में श्रीनेत वंश के लोगों द्वारा नवरात्र में नवमी के दिन मां दुर्गा के चरणों में रक्‍त चढ़ाने की अनोखी परंपरा आज भी जारी है।

Purnima Srivastava

Purnima SrivastavaReport Purnima SrivastavaVidushi MishraPublished By Vidushi Mishra

Published on 14 Oct 2021 12:55 PM GMT

Durga Temple in Bansgaon
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बांसगांव के दुर्गा मंदिर पर खून चढ़ाते श्रीनेत राजपूत

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Gorakhpur : देश में परम्परा के नाम पर कई काम ऐसे होते हैं, जिन पर बिना आंखों से देखे यकीन करना मुश्किल होता है। ऐसा ही पिछले तीन दशक से गोरखपुर के बांसगांव तहसील के श्रीनेत राजपूत कर रहे हैं। मां दुर्गा को खुश करने के लिए नवजात से लेकर बुजुर्ग तक शरीर के 9 स्थानों से तेज उस्तरा से खून निकालते हैं और देवी मां को चढ़ाते हैं। गुरुवार को इस परम्परा के 300 साल पूरे हो गए। जहां दर्जनों लोगों ने खून(maa durga ke mandir mein khoon chadhta hai) निकालकर देवी मां को चढ़ाया।

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के बांसगांव तहसील कस्बा में एक ऐसा दुर्गा मंदिर (maa durga ke mandir mein khoon chadhta hai) है, जहां पिछले 300 साल से शरीर के अंगों से मां दुर्गा को रक्‍त चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है। इसमें 12 दिन के नवजात से लेकर 100 साल के बुजुर्ग तक का रक्‍त चढ़ाया जाता है। मान्‍यता है कि जिन नवजातों के ललाट (लिलार) से रक्त निकाला जाता है, वह भी इसी मां की कृपा से प्राप्त हुए होते हैं।

मां दुर्गा के चरणों में रक्त चढ़ाने का सिलसिला जारी

गोरखपुर के बांसगांव तहसील में श्रीनेत वंश के लोगों द्वारा नवरात्र में नवमी के दिन मां दुर्गा के चरणों में रक्‍त चढ़ाने की अनोखी परंपरा आज भी जारी है। गुरुवार को सुबह से ही इस मंदिर पर मां दुर्गा के चरणों में रक्त चढ़ाने (maa durga ke mandir mein khoon chadhta hai) का सिलसिला जारी है।


बुजुर्ग बताते हैं कि उपनयन संस्कार के पूर्व तक एक जगह ललाट (लिलार) और (जनेऊ धारण करना-14 वर्ष की उम्र) हो जाने के बाद युवकों-अधेड़ों और बुजुर्गों के शरीर से नौ जगहों से रक्‍त निकाला जाता है। उसे बेलपत्र में लेकर मां के चरणों में अर्पित किया जाता है।

खास बात यह है कि एक ही उस्‍तरे से विवाहितों के शरीर के नौ जगहों पर और बच्‍चों को माथे पर एक जगह चीरा लगाया जाता है। बेलपत्र पर रक्‍त को लेकर मां के चरणों में अर्पित कर दिया जाता है। इसके बाद धूप, अगरबत्‍ती और हवनकुंड से निकलने वाली राख को कटी हुई जगह पर लगा लिया जाता है। पहले यहां पर जानवरों की बलि दी जाती थी । पर अब मंदिर परिसर में पशु बलि को रोककर रक्‍त (maa durga ke mandir mein khoon chadhta hai) चढ़ाया जाता है।

300 साल से चली आ रही परंपरा, नहीं होती है कोई बीमारी

यह परम्परा पिछले 300 साल से चली आ रही है। देश-विदेश में रहने वाले लोग यहां नवमी के दिन मां दुर्गा को अपना रक्त अर्पित करते हैं। खास बात यह है कि यहां नवजात के जन्म लेने के 12 दिन (बरही का कार्यक्रम समाप्त होने के बाद) बाद से ही उनका रक्त मां के चरणों(maa durga ke mandir mein khoon chadhta hai) में अर्पित किया जाता है। इन नवजातों को मां के दरबार में लेकर श्रद्धालु पहुंचते हैं।

उस नवजात के पिता या मां, जवान और बुजुर्ग भी इस परंपरा का निर्वहन करते हैं। मंदिर के पुजारी श्रवण पाण्डेय ने बताया कि लोगों का मानना है कि यह मां का आशीर्वाद ही है कि आज तक इतने सालों में न तो किसी को टिटनेस ही हुआ , न ही घाव भरने के बाद कहीं कटे का निशान ही पड़ा।

यहां के लोग मानते हैं कि रक्‍त चढ़ाने(maa durga ke mandir mein khoon chadhta hai) से मां खुश होती है। श्रद्धालु का परिवार निरोग और खुशहाल रहता है। पिछले कई सौ साल से बांसगांव में इस परंपरा का निर्वाह ठीक उसी तरह किया जा रहा है, जैसा उनके पुरखे किया करते थे। सभी का मानना है कि क्षत्रियों द्वारा लहू चढ़ाने पर मां का आशीर्वाद उन पर बना रहता है।

Vidushi Mishra

Vidushi Mishra

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