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डीरेका के निगमीकरण की आहट से रेलवे कर्मचारियों की उड़ी नींद

raghvendra

raghvendraBy raghvendra

Published on 19 July 2019 7:07 AM GMT

डीरेका के निगमीकरण की आहट से रेलवे कर्मचारियों की उड़ी नींद
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आशुतोष सिंह

वाराणसी: क्या भारतीय रेलवे भी बीएसएनएल और इंडियन एयरलाइंस की राह पर है? क्या रेलवे के भी निगमीकरण की तैयारी चल रही है? क्या आने वाले दिनों में रेलवे पर सरकार का अधिकार नहीं रह जाएगा? केंद्र की मोदी सरकार से रेलवे कर्मचारी क्यों नाराज हैं? रेलवे के कर्मचारियों के सामने विरोध और प्रदर्शन की नौबत क्यों आ रही है? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो रेलवे कर्मचारियों को परेशान कर रहे हैं।

दरअसल पिछले दिनों रेलवे की ओर से एक पत्र जारी किया गया जिसमें रेलवे से जुड़ी सात प्रोडक्शन यूनिट के निगमीकरण की बात कही गई। इन सात यूनिटों में से वाराणसी स्थित डीजल रेलवे कारखाना भी शामिल है। सरकार की ओर से जारी पत्र मिलने के बाद वाराणसी के डीजल रेलवे कारखाने में कर्मचारी गुस्से में हैं। लगातार धरना-प्रदर्शन और विरोध का सिलसिला चल रहा है। कर्मचारियों को इस बात का डर है कि अगर सरकार डीरेका का निगमीकरण करती है तो आगे निजीकरण का रास्ता खुल जाएगा। लिहाजा अब कर्मचारी डीरेका के निगमीकरण का विरोध कर रहे हैं।

रेलवे बोर्ड के पत्र से हडक़ंप

रेलवे की प्रोडक्शन यूनिट को लेकर सरकार की मंशा साफ नजर नहीं आ रही है। डीरेका के कर्मचारियों के मुताबिक उन्हें पिछले दिनों रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष की ओर से एक पत्र मिला, जिसमें सरकार ने डीरेका के निगमीकरण की बात का जिक्र किया है। कर्मचारी सरकार के इस फैसले के सख्त खिलाफ हैं। कर्मचारियों को केंद्र सरकार की मंशा पर शक है।

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उन्हें इस बात का डर है कि अगर सरकार डीरेका और अन्य प्रोडक्शन यूनिट का निगमीकरण करती है तो आने वाले दिनों में पूरे रेलवे का निजीकरण कर दिया जाएगा, जिसका कीमत कर्मचारियों को चुकानी पड़ेगी। कर्मचारी अब निगमीकरण की वजह पूछ रहे हैं। उनके मुताबिक जब डीरेका पूरी तरह फायदे में चल रहा है तो फिर निगमीकरण की क्या जरुरत है?

कर्मचारी सड़क पर उतरने पर मजबूर

डीरेका में निगमीकरण की सुगबुगाहट से कर्मचारी आक्रोशित हैं। रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष का पत्र जैसे ही डीरेका पहुंचा, कर्मचारियों में उबाल आ गया। कर्मचारी सडक़ों पर हैं। कैंपस में धरना-प्रदर्शन हो रहा है। सिर्फ कर्मचारी ही नहीं बल्कि उनके परिजन भी सरकार के इस फैसले का विरोध कर रहे हैं।

डीरेका कर्मचारी संघ के सचिव वीएन दुबे कहते हैं कि निगमीकरण निजीकरण का रास्ता है। बीएसएनएल, एमटीएनएल, बाल्को और एनटीपीसी का निगमीकरण किया गया। आज वो किस रास्ते पर हैं, उन्हें घाटे में दिखलाया जा रहा है। इसमें एक सीईओ व एक सीएमडी की तैनाती की बात कही गई है। अगर एक सीईओ बेइमान-भ्रष्ट आ गया तो पूरी कंपनी को डूबो देगा।

कहीं बीएसएनएल जैसा ना हो जाए हश्र

डीरेका के कर्मचारी विरोध के पीछे अपने तर्क दे रहे हैं। उनके मुताबिक हाल के सालों में सरकार ने जिन विभागों का निगमीकरण किया, उसका हश्र बेहद बुरा रहा। बीएसएनएल इसकी सबसे बड़ी नजीर हैं। सरकार ने बीएसएनएल को अपडेट करने की मंशा लेकर उसका निगमीकरण किया, लेकिन आज बीएसएनएल अन्य दूरसंचार कंपनियों से काफी पीछे है।

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बीएसएनएल के पास अपने कर्मचारियों को देने के लिए सैलरी तक नहीं है। निगमीकरण का जिक्र छेड़ते ही कंपनी की वंदना सिंह गुस्से से लाल हो जाती है। सरकार से सवाल करती हैं कि बीएसएनएल के कर्मचारियों से जाकर आप पूछिए. उन्हें सैलरी कितने महीनों से नहीं मिल रही है। हमारे यहां भी सभी कर्मचारियों को बीएसएनएल के ही सिमकार्ड मिले थे, लेकिन अब सब लोग जिओ का सिमकार्ड यूज कर रहे हैं। उन कर्मचारियों से पूछिए जिनकी छंटनी कर दी गई है, जिन्हें कुछ मिल ही नहीं रहा है।

ये डर सिर्फ वंदना जैसी गृहणी का नहीं है। डीरेका में अकाउंट डिपार्टमेंट में काम करने वाली भावना के मुताबिक निगमीकरण से सबसे ज्यादा जॉब सिक्योरिटीको लेकर प्रॉब्लम होगी। रेलवे के जो सात प्रोडक्शन हाउस हैं, उसमें रोजगार की कमी आएगी। इसके अलावा रेलवे में पोस्ट की संख्या भी घटेगी। सरकार चाहती है कि अब रेलवे का हश्र भी बीएसएनएल जैसा हो जाए।

शानदार रहा है कि डीरेका का इतिहास

साल 1961 में डीजल विद्युत रेल इंजन निर्माण के लिए एल्को-अमेरिका के सहयोग से कारखाने की स्थापना हुई। जनवरी 1964 में प्रथम रेल इंजन का निर्माण कर राष्ट्र को समर्पित किया गया। जनवरी 1976 निर्यात बाजार में प्रवेश हुआ और प्रथम रेल इंजन तंजानिया को निर्यात किया गया। इसके बाद दिसम्बर 1977 में प्रथम डीजल जनित सेट का कमीशन किया गया।

अक्टूबर 1995 में अत्याधुनिक माइक्रोप्रोसेसर नियंत्रित, एसी-एसी डीजल इलेक्टिक रेल इंजनों के निर्माण के लिए जनरल माटर्स, अमेरिका के साथ समझौता किया गया। मार्च 2001 में आईएसओ प्रमाण पत्र मिला। मार्च 2002 में कारखाने में निर्मित जनरल मोटर्स डिजाइन के माइक्रोप्रोसेसर नियंत्रित चार हजार अश्व शक्ति के प्रथम रेल इंजन का लोकार्पण किया गया।

पीएम ने किया था डीरेका कर्मचारियों से वादा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब भी वाराणसी आते हैं तो डीरेका गेस्ट हाउस में ही रुकते हैं। दो साल पहले डीरेका में एक कार्यक्रम के दौरान नरेंद्र मोदी ने साफ कहा था कि रेलवे का निजीकरण नहीं होगा। ये बातें पूरी तरह अफवाह हैं। अब जबकि रेलवे की ओर से निगमीकरण की सुगबुगाहट शुरू हुई है तो कर्मचारी पूछ रहे हैं कि प्रधानमंत्री का वादा क्या खोखला था? कर्मचारी आरोप लगा रहे हैं कि पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए सरकार इस तरह के कदम उठाने की तैयारी में है। कर्मचारी संघ के सचिव वीएन दुबे कहते हैं कि एयरपोर्ट बेचे जा रहे हैं। कई स्टेशन भी प्राइवेट कंपनियों को दिया जा रहा है। कर्मचारियों को इस बात का मलाल है कि प्रधानमंत्री छोटी-छोटी बातों पर तो ट्वीट करते हैं, लेकिन उनके ही संसदीय क्षेत्र में रेलवे के कर्मचारी पिछले पंद्रह दिनों तक धरना-प्रदर्शन और विरोध करते रहते हैं। इस पर उनकी नजर नहीं जा रही।

डीजल के साथ इलेक्ट्रिक इंजन भी बनाता है डीरेका

डीरेका में पहले सिर्फ डीजल इंजन बनता था, लेकिन बाद में यहां पर इलेक्ट्रिक इंजन का भी प्रोडक्शन शुरू हो गया। मौजूदा वक्त में इस कारखाने में लगभग 6 हजार कर्मचारी काम करते हैं। हैरानी इस बात की है कि डीरेका में प्रतिदिन एक लोको का निर्माण होता है यानी साल में लगभग 350 लोको बनकर तैयार होता है। यहां पर बने हुए लोको का निर्यात दुनिया के 11 देशों में होता है। कर्मचारी संघ से जुड़े कृष्ण मोहन तिवारी कहते हैं कि हम लोग डीजल इंजन का कन्वर्जन इलेक्ट्रिक लोको में कर रहे हैं। आज तक जितना लक्ष्य हम लोगों को मिला है, हम लोगों ने उससे अधिक ही उत्पादन किया है। कर्मचारियों के मुताबिक अगर सरकार ने डीरेका का निगमीकरण कर दिया तो कई तरह की परेशानियां सामने आएंगी।

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मसलन निगमीकरण होने के बाद भारत सरकार सिर्फ डीरेका से लोको खरीदने के लिए बाध्य नहीं रहेगी। बाजार खुला हो जाएगा। हो सकता है कि डीरेका से कम लागत पर चीन या अन्य देश लोको तैयार करे। ऐसे में डीरेका पिछड़ सकता है। कर्मचारियों के मुताबिक लोको एक ऐसा उत्पादन है, जिसे कोई आम आदमी या पूंजीपति नहीं खरीदता। लिहाजा अगर सरकार डीरेका का साथ नहीं देगी तो बाजार में पिछडऩे का डर बना रहेगा और आने वाले दिनों में इसके नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं। डीरेका के एक और कर्मचारी विनोद सिंह कहते हैं कि सरकार की निगमीकरण की सोच बिल्कुल गलत है। अभी हमारे यहां डीजल से इलेक्ट्रिकल करने की तकनीक नहीं थी। कर्मचारियों ने दिन-रात एक करके समय से पहले उसे पूरा किया। फिर उन्होंने बीस साल पुराना कन्वर्जन लोको दिया।

रायबरेली में हो रहा आंदोलन

नरेन्द्र सिंह

रायबरेली: रेल कोच फैक्ट्री निगम करण के विरोध में मॉडर्न कोच फैक्ट्री, रायबरेली के कर्मचारी आंदोलनरत हैं। सरकार द्वारा निगमीकरण किए जाने वाली सूची में रेल कोच फैक्ट्री रायबरेली का नंबर पहले स्थान पर है। निगमीकरण के विरोध में फैक्ट्री के कर्मचारी और उनके परिवारवाले फैक्ट्री के गेट पर लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। आंदोलनरत कर्मचारियों का कहना है की कोच फैक्ट्री अपने अल्पकाल में ही कई गुना मुनाफा कमाकर रेलवे और सरकार को दे चुकी है लेकिन उसके बाद भी सरकार इसके निगमीकरण पर तुली हुई है। बीजेपी के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ चुके एमएलसी दिनेश सिंह निगम निगमीकरण का समर्थन कर रहे हैं। उनका कहना है कि निजीकरण से रायबरेली के युवाओं को रेल कोच फैक्ट्री में रोजगार मिलेगा। वहीं कांग्रेस विधायक अदिति सिंह कर्मचारियों के धरना प्रदर्शन में शामिल हुई हैं। उन्होंने सरकार के इस कदम को तानाशाही करार दिया है। इस बीच फैक्ट्री में कार्यरत कर्मचारी बलवंत सिंह का अत्यधिक तनाव के कारण हार्ट अटैक से मृत्यु हो गई। बताया जाता है कि निगमीकरण के प्रस्ताव का पत्र जारी होने के दिन से वह काफी तनाव में थे।

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राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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