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UP ELECTION 2022: सहसवान सीट पर आज तक नहीं जीत सकी भाजपा, मोदी लहर में भी झेलनी पड़ी थी करारी शिकस्त

UP Election 2022 :सहसवान सीट पर इस बार भाजपा और सपा के बीच जोरदार मुकाबला हो रहा है।

Anshuman Tiwari
Report Anshuman TiwariPublished By Ragini Sinha
Updated on: 2022-02-10T14:38:47+05:30
UP ELECTION 2022: सहसवान सीट पर आज तक नहीं जीत सकी भाजपा, मोदी लहर में भी झेलनी पड़ी थी  करारी शिकस्त
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UP Election 2022: बदायूं (Badaun) जिले की सहसवान विधानसभा सीट (Sahaswan Assembly seat) को समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) का गढ़ माना जाता है। इस सीट पर समाजवादी पार्टी के संरक्षक और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) भी 1996 में जीत हासिल कर चुके हैं।

इस सीट पर 1991 से हुए विधानसभा चुनावों में सिर्फ 2007 को छोड़कर हर बार समाजवादी पार्टी (Samajwadi party Latest news) ही जीत का परचम लहराती रही है। भारतीय जनता पार्टी (Bhartiye janta party) आज तक इस सीट पर एक बार भी जीत हासिल नहीं कर सकी है। 2017 के विधानसभा चुनाव में मोदी लहर (PM Narendra Modi) के बावजूद भाजपा को इस सीट पर हार झेलनी पड़ी थी। हार ही नहीं बल्कि भाजपा प्रत्याशी (Bjp candidate) चौथे नंबर पर पहुंच गया था।

बसपा ने हाजी विट्टन मुसर्रत को टिकट दिया

सहसवान सीट पर इस बार भाजपा और सपा के बीच जोरदार मुकाबला हो रहा है। सपा ने इस सीट पर पार्टी के चार बार विधायक रह चुके ओमकार सिंह यादव के बेटे बृजेश यादव को टिकट दिया है जबकि भाजपा ने डीके भारद्वाज को चुनाव मैदान में उतारा है। बसपा ने हाजी विट्टन मुसर्रत को टिकट दिया है जबकि कांग्रेस से राजवीर यादव चुनाव मैदान में उतरे हैं।

सपा का मजबूत गढ़ है सहसवान

सहसवान विधानसभा सीट पर पहला चुनाव 1957 में हुआ था और इस चुनाव में निर्दल प्रत्याशी उलफत सिंह ने कांग्रेस के मुश्ताक अली को हरा दिया था। समाजवादी पार्टी का गठन होने के बाद यह सीट सपा का गढ़ बन गई और यहां के मतदाताओं ने सिर्फ एक चुनाव को छोड़कर हमेशा सपा में ही भरोसा जताया। सहसवान विधानसभा सीट बदायूं जिले के अंतर्गत आती है और 2017 के विधानसभा चुनाव में बदायूं की 6 में से 5 सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की थी। सिर्फ सहसवान सीट ही ऐसी थी जहां भाजपा प्रत्याशी को हार झेलनी पड़ी थी।

दरअसल इस सीट पर आज तक भाजपा एक बार भी जीत हासिल नहीं कर सकी है। यादव और मुस्लिम बहुल सीट होने के कारण इस सीट पर सपा प्रत्याशी ही दमखम दिखाते रहे हैं। 1990 के बाद से हमेशा इस सीट पर यादव जाति का प्रत्याशी ही चुनाव जीतता रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने भी 1996 में इस सीट पर जीत हासिल की थी। हालांकि साल भर बाद उन्होंने इस सीट से इस्तीफा दे दिया था। उनके इस्तीफे के बाद हुए उपचुनाव में सपा के ओमकार सिंह यादव ने बाजी मार ली थी।

2007 में मिली थी डीपी यादव को जीत

सहसवान सीट पर 1991 के बाद हुए विधानसभा चुनावों में सपा अपनी ताकत दिखाती रही है। पार्टी को सिर्फ 2007 के चुनाव में हार झेलनी पड़ी थी। 2007 के चुनाव में सीट पर राष्ट्रीय परिवर्तन दल के नेता और बाहुबली डीपी यादव ने जीत हासिल की थी। हालांकि उन्हें मामूली वोटों से ही जीत मिली थी। डी पी यादव ने सपा प्रत्याशी ओमकार सिंह को 109 मतों से चुनाव हराया था। उसके बाद 2007 और 2012 के चुनाव में सपा प्रत्याशी ओमकार यादव फिर चुनाव जीतने में कामयाब रहे थे।

2017 का जनादेश

2017 के विधानसभा चुनाव में ओमकार सिंह ने बसपा के अरशद अली को पराजित किया था। ओमकार सिंह को 77,543 मत मिले थे जबकि बसपा के अरशद अली 73,274 मत पाने में कामयाब रहे थे। डी पी यादव की पत्नी तीसरे स्थान पर रही थीं। 2017 के चुनाव में भाजपा प्रत्याशी चौथे स्थान पर खिसक गया था।

इस सीट पर यादव और मुस्लिम मतदाता काफी ज्यादा संख्या में हैं और सपा की कामयाबी के पीछे इसे बड़ा कारण माना जाता है। वैसे इस क्षेत्र में मौर्य, शाक्य, ब्राह्मण और क्षत्रिय मतदाता भी काफी संख्या में है। चुनाव नजदीक आने के साथ ही सभी प्रत्याशी जातीय समीकरण साधने की कोशिश में जुटे हुए हैं।

सपा और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला

सहसवान सीट पर भाजपा ने इस बार डीके भारद्वाज को चुनाव मैदान में उतारा है। भारद्वाज 2009 में जनता दल यू के टिकट पर संसदीय चुनाव भी लड़ चुके हैं। हालांकि इस चुनाव में सपा के धर्मेंद्र यादव ने बाजी मारी थी। इस बार भारद्वाज बिल्सी विधानसभा सीट से टिकट मांग रहे थे मगर पार्टी ने उन्हें सहसवान से चुनाव मैदान में उतारा है।

समाजवादी पार्टी ने सीट से चार बार विधायक रहे पूर्व मंत्री ओमकार सिंह यादव के बेटे ब्रजेश यादव को टिकट दिया है। ब्रजेश यादव अपने पिता की विरासत संभालने के लिए चुनाव मैदान में उतरे हैं।

बसपा ने मुस्लिम प्रत्याशी हाजी विट्टन को उतारकर सपा का खेल बिगाड़ने की कोशिश की है। विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने के लिए सभी दलों ने पूरी ताकत झोंक रखी है मगर सपा और भाजपा के बीच ही सीधा मुकाबला माना जा रहा है। यदि बसपा प्रत्याशी मुस्लिमों में अच्छी तरह सेंधमारी में कामयाब रहा तो सपा का खेल बिगड़ भी सकता है।

Ragini Sinha

Ragini Sinha

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