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Sonbhadra News: शिवशक्ति धाम.. गिरिजाशंकर धाम जहां एक शिवलिंग में हैं शिव-पार्वती
Sonbhadra News: पथरीले रास्ते और कंडाकोट यानी त्रिकूट पहाड़ की ऊंची चढ़ाई चढ़ने के बाद भक्त जब, गर्भगृह के सामने पहुंचते हैं तो सारी थकान छूमंतर हो जाती है।
Sonbhadra News (Image From Social Media)
Sonbhadra News: पूरे देश में नवरात्र की धूम है। देवी मंदिरों-शक्तिपीठों में दर्शन-पूजन के लिए लंबी कतारों के साथ ही, घरों में कलश स्थापित कर मां आदिशक्ति की पूजा-अर्चना का क्रम जारी है। सोनभद्र में भी दो शक्तिपीठों की मान्यता के साथ ही, मां के कई सिद्धपीठ मौजूद हैं। इसी में एक पीठ है राबटर्सगंज ब्लाक के बहुआर ग्राम पंचायत स्थित गिरिजाशंकर धाम। जिला मुख्यालय से महज, छह से आठ किमी की दूरी पर मौजूद इस धाम के गर्भगृह में एक ऐसा शिवलिंग स्थापित हैं, जिसमें सिर्फ भगवान शिव ही नहीं, मां पार्वती के भी दर्शन होते हैं। मां आदिशक्ति को गिरिजा यानी पार्वती रूप में यहां विद्यमान होने की भी मान्यता है। यहां की एक किंवदंती, मां कामाध्या से जुड़़ी किंवदंती से मिलती-जुलती दिखाई देती है। पथरीले रास्ते और कंडाकोट यानी त्रिकूट पहाड़ की ऊंची चढ़ाई चढ़ने के बाद भक्त जब, गर्भगृह के सामने पहुंचते हैं तो सारी थकान छूमंतर हो जाती है। पहाड़ी से दिखने वाला प्राकृतिक सौंदर्य भी, तन-मन दोनों को आनंदित कर देता है। इसे शिव शक्ति धाम भी कहते हैं।
- प्रमुख पर्वों-दिवसों पर उमड़ती है भक्तों की भारी भीड़
कैमूर-वन्य जीव विहार की महुअरिया ब्लैक बक घाटी के पास वाली एरिया में स्थापित यह स्थल जहां कंडाकोट महादेव और गिरिजाशंकर धाम के रूप में विख्यात है। वहीं, यहां दुगर्म रास्ता और कठिन चढ़ाई के बावजूद श्रावण सोमवार, बसंत पंचमी, शिवरात्रि पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। प्रमुख पर्वों पर यहां मेले का भी आयोजन किया जाता है। बसंत पंचमी पर नौ दिवसीय रूद्रचंडी महायज्ञ का आयोजन होता है, जिसमें विख्यात संतों का जमावड़ा भी देखने को मिलता है।
- इकलौता शिवलिंग, जिसका मां पार्वती के रूप में होता है श्रृंगार
मंदिर में स्थापित शिवलिंग को जहां अर्धनारीश्वर स्वरूप की मान्यता है। वहीं, यह सोनभद्र ही नहीं, पूर्वांचल का एकलौता ऐसा शिवलिंग है, जिसका श्रृंगार, शिव के रूप में नहीं, बल्कि मां गिरिजा के रूप में किया जाता है। सिंदूर का चोला चढ़ाई जाने के साथ, शिव-शक्ति के इस स्वरूप को चुनरी, नारियल और श्रृंगार सामग्री बेहद प्रिय होने की मान्यता है। हालांकि इस शिवलिंग की पूजा शिव के रूप में भी की जाती है। रूद्राभिषेक के साथ ही, शिव के रूप में श्रंगार के साथ, शिव को प्रिय वस्तुएं भी अर्पित की जाती हैं लेकिन कई बार इस शिविलंग की मां गिरिजा के रूप में पूजन-श्रृंगार का नजारा, शिव-शक्ति में आस्था में रखने श्रद्धालुओं को आह्लादित कर देता है।
- कभी दिव्य प्रकाश तो कभी संगीत सुनाई देने का होता है दावा
यहां रात में रूकने वाले कभी मंदिर के शिखर पर दिव्य प्रकाश दिखने तो कभी गर्भगृह से संगीत सुनाई देने का दावा करते हैं। एक अज्ञात पुंज की तरफ से चांदनी रात में मंदिर की परिक्रमा किए जाने का भी दावा सुनने को मिलता रहता है। कंडाकोट सेवा ट्रस्ट के प्रबंधक धनंजय त्रिपाठी और अध्यक्ष सर्वेश त्रिपाठी भी इस मंदिर के साथ कई किंवदंतियां और चमत्कारों को जुड़ा होने का दावा करते हैं। मंदिर तक यज्ञ, मेले एवं पर्व विशेष के आयोजनों के जरूरी सामग्री, जरूरी संसाधन पहुंचा पाना चुनौती भरा होता है लेकिन भक्तों का जुनून, रास्ते में आने वाली कठिनाई और कठिन चढ़ाई दोनों को आसान बना देता है।
- रह चुकी है कण्व ऋषि की तपोस्थली, अज्ञातवास बिताने पहुंचे थे पांडव
त्रिकूट पर्वत स्थित गिरिजाशंकर धाम के बारे में कई किंवदंतियां सुनने को मिलती है। इस स्थल को कण्व ऋषि के तपोस्थली की मान्यता तो है ही, कण्व ऋषि के कर्नाटक में रह रहे वंशजों की तरफ से यहां उनकी भव्य मूर्ति भी स्थापित की जा चुकी है। भरत-शकुंतला की कहानी से भी इस स्थल को जोड़कर चर्चा होती रहती है। अज्ञातवास के दौरान पांडवों के यहां आने और यहां से आगे बढ़ने पर, कोन क्षेत्र में मां कुंती को प्यास लगने पर, अर्जुन द्वारा बाण मारकर पांडु नदी का उद्गम किए जाने की मान्यता है।
- मां कामाख्या मंदिर के निर्माण से मिलती-जुलती है यहां की किंवदंतीः
वहीं, इस स्थल को कंडाकोट, कोट यानी दुर्ग का दर्जा मिलने के पीछे भी, एक अलग और खासी रोचक कहानी है। यहां का लोगों का दावा है कि जिस समय चंद्रकांता के तिलिस्मि दुर्ग विजयगढ़ का निर्माण शुरू हुआ। उसी समय कंडाकोेट का भी निर्माण शुरू हुआ। चर्चाओं में दावा किया जाता है कि दोनों जगह पर निर्माण दो दैत्यों द्वारा शुरू किया गया। शर्त रखी गई थी कि जिसका निर्माण पहले होगा, वह दीपक जला देगा और वह हारने वाली की हत्या कर देगा।
क्या है कहानी
किंवदंती है कि विजयगढ़ दुर्ग के निर्माण के समय टांकी गिर गई जिसे ढूंढने के लिए, दीपक जलाना पड़ा। यह देख कंडाकोट का निर्माण कर रहे, कथित दैत्य यानी व्यक्ति ने समझा कि, उसका निर्माण पूरा हो गया और मारे जाने के डार से वह कंडाकोट का निर्माण अधूरा छोड़़कर ही भाग खड़ा हुआ। कंडाकोट पहाड़ी के छोरों पर चिनाई के अवशेष और कहीं-कहीं चट्टानों में टांकी मारने जैसे निशानों को इसी किंवदंती से जोड़कर देखा जाता है। बता दें कि कामाख्या धाम में भी मां पार्वती ने नरकासुर के सामने एक ही रात में सीढ़ियों के निर्माण की शर्त रखी थी जो मुर्गे के बांग देने पर अधूरा रह गया था।