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चिट फंड स्कैम-रोज़ वैली के दलदल में फंसे हैं बड़े-बड़े नाम

raghvendra

raghvendraBy raghvendra

Published on 8 Feb 2019 7:55 AM GMT

चिट फंड स्कैम-रोज़ वैली के दलदल में फंसे हैं बड़े-बड़े नाम
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लखनऊ: ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के लिए इन ‘रोज़’ यानी गुलाबों में न तो खुशबू है और न यह ‘वैली’ या घाटी हरी-भरी और सुंदर नजर आती है। वजह है कि तूणमूल कांग्रेस के बड़े नेता इस ‘रोज़ वैली’ घोटाले में जेल जा चुके हैं। आरोप है कि ममता बनर्जी की पार्टी ने इस घोटाले को पनपने देने और बाद में जांच दबाने की पुरजोर कोशिशें की थीं।

‘रोज़ वैली’ के अलावा ‘शारदा’ चिट फंड स्कैम में भी तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के शामिल होने का आरोप है। रोज़ वैली मामले में जहां तृणमूल कांग्रेस के तापस पाल और सुदीप बंदोपाध्याय जेल जा चुके हैं वहीं ‘शारदा’ घोटाले में ममता की पार्टी के सांसद कुणाल घोष और शताब्दी रॉय जुड़े हुए बताए जाते हैं। रोज़ वैली घोटाला ४०,000 करोड़ रुपए और शारदा चिट फंड घोटाला में 2०,०00 करोड़ रुपए का बताया जाता है।

रोज़ वैली घोटाला

रोज़ वैली घोटाला पुरानी ‘पोन्जी’ स्कीम जैसा है जिसमें लोगों को बड़े बड़े सपने दिखा कर उनसे पैसा जमा करवाया जाता था। इस कंपनी की रियल इस्टेट व होटल-इंटरटेनमेनट कंपनियों ने अपना जाल पूर्वी राज्यों में खूब फैलाया और लोगों से हजारों करोड़ रुपए बटोरे। यह रकम लोगों को प्रॉपर्टी या बेहतरीन हॉलीडे पैकेज के सपने दिखा कर ली गई थी। निवेशकों को २१ फीसदी तक के ब्याज का लालच दिया जाता था।

शुरू में तो सब सही चला लेकिन जब रोज़ वैली की देनदारियां बढ़ गईं तो निवेशकों को टरकाया जाने लगा। लोगों को अपने पैसे नहीं मिले तो सेबी के पास शिकायतें पहुंचीं। सेबी ने जवाब मांगना शुरू किया तो रोज़ वैली ने वही पुरानी तरकीबें अपनाईं - नोटिसों के जवाब न देना, अपीलें करना, टाइम मांगना आदि। अंतत: सेबी ने कहा कि रोज़ वैली कंपनी की स्कीमें ‘सामूहिक निवेश योजनाएं’ थीं जिनका सेबी के यहां रजिस्ट्रेशन नहीं कराया गया था। सेबी ने यह स्कीमें बंद करने का आदेश दिया और कहा कि निवेशकों को उनका पैसा लौटाया जाए। रोज़ वैली के पास पैसा बचा ही नहीं था। करीब 1 लाख निवेशकों का पैसा फंस गया।

इस खबर को भी देखें: स्पेशल रिपोर्ट: ‘चीट इंडिया’ कंपनियों की निवेशकों से लूट का खेल जारी

इसी बीच सुप्रीमकोर्ट ने छोटे निवेशकों के पैसे जमा करने वाली संदिग्ध कंपनियों की जांच करने के आदेश दिए। यह आदेश पश्चिम बंगाल के ‘शारदा ग्रुप’ के मामले के परिप्रेक्ष्य में आया था। शरदा ग्रुप भी निवेशकों के पैसे लेकर बैठ गया था। कोर्ट के आदेश के बाद ईडी और सीबीआई ने रोज़ वैली के खिलाफ जांच शुरू की। जांच एजेंसियों का कहना है कि रोज़ वैली घोटाला १७ हजार करोड़ रुपए का है लेकिन स्माल डिपाजिटर्स एसोसिएशन इस घोटाले को ४० हजार करोड़ रुपए का बताता है। अन्य स्रोत इसे ६० हजार करोड़ रुपए तक का आंकते हैं। बहरहाल, इसे देश का सबसे बड़ा चिटफंड स्कैम कहा जा सकता है।

शारदा चिटफंड घोटाला

शारदा चिटफंड स्कैम भी पश्चिम बंगाल का एक बड़ा आर्थिक घोटाला है। इससे कई बड़े नेताओं के नाम जुड़े हैं। वर्ष साल २०१४ में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को आदेश दिए थे कि इस मामले की जांच करे।

शारदा ग्रुप का साम्राज्य वर्ष २००० में फैलना शुरू हुआ था। देखते ही देखते इस कंपनी ने बंगाल के अलावा झारखंड, उड़ीसा और उत्तर-पूर्व के राज्यों में अपने 300 ऑफिस खोल लिए। शारदा ग्रुप ने मीडिया, प्लांटेशन, निर्माण, होटल आदि क्षेत्रों में २०० कंपनियों का जाल फैला दिया था। यह कंपनी लोगों को सागौन प्लांटेशन के बॉन्ड्स में निवेश कर 34 गुना रिटर्न पाने का लालच देती थी। 1 लाख रुपए के निवेश पर 25 साल बाद 34 लाख रुपए देने के वादे किए गए। इसके अलावा आलू के बिजनेस में 15 महीनों के भीतर ही रकम डबल करने का सपना भी इस ग्रुप ने दिखाया। लालच में आकर १७ लाख लोगों ने निवेश किया। अप्रैल २००३ में कंपनी पैसों के साथ फरार हो गई। अनुमान है कि इस चिटफंड कंपनी ने 20,000 करोड़ रुपए लेकर अपने दफ्तरों पर ताला लगा दिया था।

आयकर विभाग और ईडी के जरिए केंद्र सरकार ने शारदा घोटाले की जांच शुरू की। २०१४ में सुप्रीमकोर्ट ने शारदा घोटाले की पूरी जांच सीबीआई को सौंप दी। जांच के क्रम में कई बड़े-बड़े लोग गिरफ्तार किए गए जिनमें दो सांसद कुणाल घोष और श्रींजय बोस, बंगाल के पूर्व डीजीपी रजत मजूमदार, एक टॉप फुटबाल क्लब के अधिकारी देबब्रत सरकार, राज्य के खेल व परिवहन मंत्री मदन मित्रा शामिल हैं।

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राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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