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पंचायत चुनावःगोंडा में पहली बार वन टांगिया परिवार चुनेंगे ग्राम प्रधान

वन टांगिया राजस्व परिवारों को आजादी के 74 साल बाद पहली बार मताधिकार का प्रयोग कर सरकार बनाने का मौका मिलने जा रहा है।

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ShraddhaPublished By ShraddhaTej Pratap SinghReport By Tej Pratap Singh

Published on 13 April 2021 4:01 PM GMT

पांच वनटांगिया ग्रामों को मताधिकार करने का मौका
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 पांच वनटांगिया ग्रामों को पहली बार मताधिकार करने का मौका 

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गोंडा। भाजपा सरकार और प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्याथ की प्रेरणा और विशेष निगरानी में जिले के पांच वन टांगिया राजस्व ग्रामों में रह रहे परिवारों के मतदाताओं को आजादी के 74 साल बाद पहली बार लोकतंत्र के पर्व में मताधिकार का प्रयोग कर गांव की सरकार बनाने का मौका मिलने जा रहा है।

इन पांचों वनटांगिया ग्रामों के निवासियों का नाम पहली बार मतदाता सूची में सम्मिलित हुआ है और वन टांगिया गांवों के इन पांचों ग्रामों के 766 मतदाता त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में अपनी भागीदारी देते हुए गांव की सरकार का चुनाव करेंगे।

2018 में मिला राजस्व ग्राम का दर्जा

सामाजिक न्याय मंत्रालय भारत सरकार के प्रयास के बाद प्रदेश सरकार ने वनटांगिया मजदूरों को चिन्हित करने व पट्टा देने की कवायद की। वर्ष 2011 में तत्कालीन डीएम राम बहादुर के अगुवाई में तरबगंज तहसील के वन ग्राम महेशपुर के वन टांगिया लोगों को चिन्हित कर पट्टा का वितरण किया गया। इसके बाद वनग्राम महेशपुर को राजस्व गांव का दर्जा देने का प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेजा गया। इस गांव को ग्राम पंचायत हरदवां में शामिल किया गया था। वर्ष 2018 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जिले के वनटांगिया गांव में आए थे।

उन्होंने वनग्राम अशरफाबाद में वनटांगिया बिरादरी के राजाराम की झोपड़ी में बैठकर खाना भी खाया था। उन्होंने ही जिले के पांच वन टांगिया ग्रामों क्रमशः तहसील मनकापुर के अशरफाबाद, बुटहनी व मनीपुर ग्रंट तथा तहसील तरबगंज के महेशपुर और रामगढ़ को राजस्व ग्राम का दर्जा दिया था।

सीएम योगी ने समझा वनटांगिया परिवारों का दर्द

प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आजादी के बाद भी मुख्यधारा से विरक्त वनटांगिया आदिवासियों के दर्द को समझा और अपनी सर्वाेच्च निगरानी में वनटांगिया परिवारों को अन्य राजस्व ग्रामों के निवासियों की तरह ही आवास, विभिन्न पेंशन योजनाओं, सड़क, बिजली, पानी, सौर ऊर्जा, आवसीय छात्रावास, शौचालय, राशन कार्ड, गोल्डेन कार्ड, उनके परिवारों के बच्चों का स्कूलों में दाखिला तथा वनटांगिया श्रमिकों का श्रम विभाग में शीर्ष प्राथमिकता के आधार पर पंजीकरण कराकर उन्हें केन्द्र व प्रदेश सरकार की तमाम सरकारी योजनाओं से आच्छादित कराने का काम कराया है।

यही नहीं सीएम योगी आदित्यनाथ की विशेष निगरानी में वन टांगिया गांवों में युद्ध स्तर पर विकास कराए जा रहे हैं और यहां के लोगों को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए अनेकों योजनाएं चलाई जा रही हैं।

पहली बार करेंगे मतदान

जिला निर्वाचन अधिकारी मार्कंडेय शाही ने बताया कि आजादी के 74 वर्ष बाद भी यहां के लोगों को वोट डालने का मौका कभी नहीं मिला था। यह पहला अवसर होगा जब वन टांगिया ग्रामों के लोग वोट दे सकेंगे। जिला निर्वाचन अधिकारी ने बताया कि जिले के पांच वन टांगिया गांव में महेशपुर के 223 मतदाता, रामगढ़ के 157, अशरफाबाद के 44, मनीपुर ग्रंट के 61 तथा बुटहनी के 281 सहित 766 मतदाता प्रथम बार पंचायत चुनाव में अपना वोट डालेंगे।

पांच वनटांगिया ग्रामों के 766 मतदाता पहली बार चुनेंगे अपने गांव की सरकार

उन्होंने बताया कि अशरफाबाद वन टांगियाग्राम को अमवा ग्राम पंचायत एवं मनीपुरग्रंट तथा बुटहनी गांव को महुली खोरी तथा महेशपुर व रामगढ़ के 380 निवासियों को हरदा ग्राम पंचायत में जोड़ा गया है, जिसमें हरदा में 380 वन टांगिया तथा अशरफाबाद, मनीपुर ग्रंट और बुटहनी के 386 निवासियों का नाम मतदाता सूची में सम्मिलित कराया गया है। जिलाधिकारी ने बताया कि राजस्व ग्रामों के रूप में दर्ज किए गए राजस्व ग्राम अशरफाबाद की 71, बुटहनी की 498, मनीपुरग्रण्ट की 80, रामगढ़ की 301 तथा महेशपुर की आबादी 363 सहित पांचों राजस्व ग्रामों की कुल आबादी 1313 है जिसमें से 766 लोगों का नाम पात्रता के अधार पर मतदाता सूची में शामिल किया गया है।

कौन हैं वनटांगिया

वनटांगिया परिवार वे हैं जो जंगलों को सहेजने का काम कई पीढ़ियों से कर रहे हैं। टांगिया शब्द म्यांमार के टोंगिया शब्द का अपभ्रंश है। स्थानीय भाषा में इसे पहाड़ या खेत के लिए इस्तेमाल में लाया जाता है। पेड़-पौधे लगाकर पहाड़ियों का संरक्षण करने वाले ही टांगिया कहलाते हैं। सौ साल पहले भारत में अंग्रेजों ने वनों को संरक्षित करने के लिए मजदूर लगाए थे।

इनका काम वन क्षेत्र में पौधे लगाना और उनका संरक्षण करना था। इन लोगों को पौधों के बीच-बीच में 9 फीट खाली जमीन इसके एवज में दी जाती थी। इस जमीन पर फसल उगाकर अपना भरण-पोषण करते थे। यही परिवार वनटांगिया के रूप में आज भी जाने जाते हैं।

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