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इन्हें तो बस चाहिए दो जून की रोटी, मायने नहीं रखता Women's Day

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AdminBy Admin

Published on 7 March 2016 11:05 AM GMT

इन्हें तो बस चाहिए दो जून की रोटी, मायने नहीं रखता Womens Day
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लखनऊ: नारी ऊष्मा है, ऊर्जा है, प्रकृति है, पृथ्वी है, और आधी दुनिया और पूरी स्त्री है। हम अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रहे है। ना जाने कई सालों से मनाते आ रहे है। इस दिवस का एकमात्र उद्देश्य महिलाओं को बराबरी का दर्जा देना है। उन्हें समाज में उनकी स्थिति से रुबरू कराना है। उनके हालात को सुधारना है और एक अच्छे जीवन के लिए प्रेरित करना , ताकि उनका शोषण ना हो सके, समाज में उन्हें अपने अधिकार का पता चल सके।

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क्या हम अपने इस मंसूबे में कामयाब हो सके है? क्या महिलाओं को अपने हालात और महिला दिवस के बारे में पता है। अगर इसके तह में जाएंगे तो आपको कई उदाहरण मिल जाएंगे। जहां महिलाएं आज भी जद्दोजहद कर रही है और उन्हें ये पता भी नहीं होता कि न्यूज पेपर,टीवी चैनल पर दिखाया जाने वाला महिला दिवस आखिर किस चिड़िया का नाम है।

इस तस्वीर को ध्यान से देखिए एक तरफ घंटा घर पर घंड़ी की सुई अपनी रफ्तार से चल रही है तो दूसरी तरफ मिट्टी ढोती महिला के लिए वक्त कोई मायने नहीं रखता । घड़ी की सुई अपने बदलाव को बता रही है, लेकिन इस महिला के लिए वक्त जहां कल था आज भी वहीं है। अगर बात महिला दिवस की करें तो इनका बस यही जवाब होगा क्या होता है महिला दिवस। अब खुद समझिए कि महिला दिवस की सार्थकता कितनी है।

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दो जून की रोटी की तालाश

इनकी जिंदगी में छाँव के वही मायने हैं जो आपकी जिंदगी में धूप के। 3 घंटे कड़ी धूप में लगातार मिट्टी उठाने के बाद जब गीता (बदला नाम ) को प्यास का एहसास हुआ तो पास ही रखे एक अधफटे छोले में हाथ डाल कर उसने बोतल निकाली । बोतल को मुंह से लगाया, जिसने सिर्फ दो बूंद ही पानी था। माथे पर आया पसीना, पानी उन चंद बूंदों को हेय दृष्टि से देख रहा था। बोतल को वापस रखकर गीता फिर से अपने काम में लग गयी। ज्यादा कुछ तो नहीं मैंने बस एक सवाल पूछा, 8 मार्च को अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस है, आप कुछ कहना चाहती है ? उसका जवाब कुछ यूं था

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' का होत है, हम तो कभो नाही सुनेन ईके बारे में , हमरे लिए सब दिन एक्के जइस होत हैं। वहव दिन अइसने काम करिबा'

आज़ादी के कई साल बीत जाने के बाद भी इन महिलाओं के लिए वक्त वही रुका हुआ है, फिर कैसा महिला दिवस। देश में सेव टाइगर्स जैसा अभियान चलाया जाना तो समझ में आता है, लेकिन दुर्गा और सीता के देश में अगर बेटी बचाओ जैसा अभियान चलाना पड़े तो इससे ज्यादा शर्मनाक और कुछ नहीं हो सकता है। इसलिए भारतीय संस्कृति में महिलाओं को देवी, दुर्गा व लक्ष्मी आदि का यथोचित सम्मान दिया गया है अत: उसे उचित सम्मान दिया ही जाना चाहिए।ये सम्मान एकदिन का ना हो , हम सबको मिलकर सच्चेमन से संकल्प करना चाहिए हम नारी वो स्थान दे जिसकी वो हकदार है।

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