×

लगभग खत्म हो चुके हैं विहिप सुप्रीमो प्रवीण भाई तोगडिय़ा के दिन

raghvendra

raghvendraBy raghvendra

Published on 25 Jan 2018 4:29 PM GMT

लगभग खत्म हो चुके हैं विहिप सुप्रीमो प्रवीण भाई तोगडिय़ा के दिन
X
  • Facebook
  • Twitter
  • Whatsapp
  • Telegram
  • koo
  • Facebook
  • Twitter
  • Whatsapp
  • Telegram
  • koo
  • Facebook
  • Twitter
  • Whatsapp
  • Telegram
  • koo

लखनऊ। विहिप सुप्रीमो प्रवीण भाई तोगडिय़ा के दिन लगभग खत्म हो चुके हैं। सुप्रीमो की कुर्सी तो उन्हें छोडऩी ही पड़ेगी। देखना यह है कि वे अपने आप जाते हैं या हटाए जाते हैं। इसी के साथ उनके अध्यक्ष राघव रेड्डी, भारतीय किसान संघ और भारतीय मजदूर संघ के प्रमुखों की छुट्टी भी तय मानी जा रही है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने ही आनुषांगिक संगठनों में किसी प्रकार के विरोधी सुर नहीं रखना चाहता। इसलिए इन सभी को अपना रास्ता देख लेने को कहा जा चुका है। संघ सिर्फ उस स्थिति से बचने की कोशिश में है जो गोवा में हो गयी थी।

गौरतलब है कि गोवा में संघ के प्रमुख रहे सुभाष वेलिंगकर ने वर्ष 2016 में बगावत कर संगठन की किरकिरी करा दी थी। वेलिंगकर की तरह खासतौर पर तोगडिय़ा की विहिप, बजरंग दल में गहरी पैठ है। यही कारण है कि संघ किसी भी तरह तोगडिय़ा के स्वेच्छा से पद छोडऩे का इंतजार कर रहा है।

नेतृत्व परिवर्तन की पटकथा तैयार

सूत्र बता रहे हैं कि संघ ने फरवरी महीने के अंत तक भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ सहित कुछ अन्य अनुषांगिक संगठनों के नेतृत्व में परिवर्तन करने की पटकथा तैयार कर ली है। संघ मिशन 2019 के लिए अनुषांगिक संगठनों में सरकार विरोधी रुख को खत्म करना चाहता है। संघ के एक वरिष्ठ अधिकारी स्वीकार करते हैं कि विहिप प्रमुख प्रवीण भाई तोगडिय़ा, अध्यक्ष राघव रेड्डी समेत अनुषांगिक संगठनों के कुछ अन्य नेतृत्वकर्ताओं को पद छोडऩे का निर्देश दिया जा चुका है। वह बताते हैं कि वैसे भी इनका कार्यकाल पहले ही पूरा हो चुका है मगर निर्देश का पालन करने के बदले उनकी ओर से शक्ति प्रदर्शन कर दबाव बनाया जा रहा है।

खासतौर से तोगडिय़ा के बगावती सुर और पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ सीधे हमले से संघ बेहद नाराज है। गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान तोगडिय़ा की विद्रोही भूमिका ने संघ नेतृत्व पहले ही तोगडिय़ा से खफा था। हालांकि पहले नेतृत्व परिवर्तन की योजना को बीते साल दिसंबर के अंत तक अमली जामा पहनाने की थी मगर इन नेताओं के तेवरों से बदली परिस्थितियों में संघ ने अपनी इस योजना को अमली जामा पहनाने की पटकथा नए सिरे से लिखी है। संघ अब भी चाहता है कि विवाद खत्म करने के लिए ये सभी नेता स्वेच्छा से पद त्याग दें। अगर ऐसा नहीं हुआ तो संघ इन्हें पद से हटाने की अपनी ओर से प्रक्रिया शुरू करेगा।

तोगडिय़ा समर्थकों ने फेल कर दी रणनीति

उल्लेखनीय है कि तोगडिय़ा कई मौकों पर पीएम नरेंद्र मोदी और उनके समर्थकों को असहज करने वाले बयान दे चुके हैं। पिछले साल ही वीएचपी की भुवनेश्वर में तीन दिन की राष्ट्रीय मीटिंग में वीएचपी के अध्यक्ष और कार्यकारी अध्यक्ष का भी फैसला होना था। सूत्रों के मुताबिक संघ नहीं चाहता था कि प्रवीण तोगडिय़ा को फिर से वीएचपी का अध्यक्ष बनाया जाए। सूत्र बता रहे हैं कि इस संबंध में 13 दिंसबर को संघ के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों की दिल्ली में मीटिंग हुई थी, जिसकी जानकारी पीएम मोदी को भी दी गई। इस मीटिंग में तोगडिय़ा को वीएचपी अध्यक्ष पद से हटाने के लिए दो नाम सामने करने का फैसला हुआ।

मीटिंग में तय फैसले के अनुसार ही भुवनेश्वर में हुई वीएचपी की बैठक में अध्यक्ष और कार्यकारी अध्यक्ष के लिए दो नाम सामने किए गए। सूत्रों के मुताबिक एक नाम हिमाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल जस्टिस वी.एस.कोगजे और दूसरा नाम जगन्नाथ शाही का लिया गया। नौबत वोटिंग तक पहुंच गई। तब तोगडिय़ा समर्थकों ने उनके पक्ष में आवाज बुलंद कर दी। जब तोगडिय़ा का नाम लिया गया तो मीटिंग में मौजूद करीब 250 प्रतिनिधियों में से करीब 70-75 प्रतिनिधियों ने खड़े होकर ओम कहा। संघ की भाषा में सहमति के लिए ओम कहा जाता है।

मीटिंग में मौजूद प्रतिनिधि वीएचपी के अलग-अलग राज्यों के अध्यक्ष और दूसरे देशों के वीएचपी अध्यक्ष थे। जब ज्यादातर लोगों को तोगडिय़ा के पक्ष में ओम कहते देखा गया तो फिर वोटिंग टाल दी गई। इसके बाद छह महीने के लिए इस विषय को टाल दिया गया।

इसी बीच प्रवीण तोगडिय़ा ने फिर कई तरह के बयान देने शुरू कर दिए है। इसी क्रम में उनकी रहस्यमय गुमशुदगी भी है। सबकुछ बहुत ही अजीब सा चल रहा है। तोगडिय़ा रोज-रोज अलग-अलग ढंग के बयान भी दे रहे हैं। संघ के लोग बता रहे हैं कि अपनी ही सरकार के खिलाफ बयानबाजी को किसी भी तरह अब बर्दाश्त करना ठीक नहीं क्योंकि सामने ही 2019 का लोकसभा चुनाव है। इसके अलावा भी आठ राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं। वैसे भी जब इन सभी वरिष्ठ लोगों का कार्यकाल खत्म हो चुका है तो नए लोगों को नेतृत्व का अवसर तो मिलना ही चाहिए।

raghvendra

raghvendra

राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

Next Story