‘नैतिक और भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेन्स’ के चक्रव्यूह में फंसी सरकार

आलोक अवस्थी
देहरादून। चव्वालीस हजार करोड़ के कर्जे से डूबी उत्तराखंड की त्रिवेंद्र सिंह रावत की सरकार अपने ही रचे ‘नैतिक और भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेन्स’ के चक्रव्यूह में फंस गई है। मामला कांग्रेस की हरीश सरकार के जमाने का है। सडक़ निर्माण के लिए भारत सरकार के पैसे के घोटाले का है। तत्कालीन भाजपा के नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट ने जब चार हजार करोड़ के मुआवजे की रकम की धोखाधड़ी का मामला उठाया कर इसे चुनावी मुद्दा बनाया था तो शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि ये उनकी सरकार के लिए सिरदर्द बन जाएगा।

हरीश रावत की सरकार के कारनामे जीरो टालरेन्स की भीष्म प्रतिज्ञा और गडकरी का विकास रथ अब आमने-सामने है। वादा किया था कि सीबीआई से जांच करायेंगे। अब जांच कराते हैं तो काम रुकता है, काम रुकता है तो गडकरी को गुस्सा आता है। विकास की रफ्तार के पहिए के नीचे भ्रष्टाचार की जांच का रोड़ा आफत बना हुआ है। बीजेपी के मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष और इस मामले पर सबसे पहले तूल देने वाले अजय भट्ट जी तो एसआईटी की जांच से संतुष्ट हैं। कहते हैं कि सीबीआई से भी तेज काम हो रहा है।

गडकरी की समस्या यह है कि यदि जांच का दायरा बढ़ा तो एनएच के अधिकारी भी उसके दायरे में आयेंगे और उस स्थिति में केवल जांच ही होगी काम रुकेगा जो उन्हें किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं है। अजय भट्ट एन.एच. को क्लीन चिट देते हैं और कहते हैं कि एन.एच. तो केन्द्रीय एजेंसी है। उसने सडक़ के निर्माण के लिए मुआवजा भेजा। उस मुआवजे को बांटने की सही तौर पर जिम्मेदारी राज्य सरकार की थी। घोटाला जिसने किया जांच उसकी ही होनी चाहिए। मामला जितना सरल दिख रहा है उतनी ही उसकी पेचीदगी भी है।

अब कमान त्रिवेंद्र सिंह के हाथ में है। धर्म संकट में उनकी नैतिकता भी है और उत्तराखंड के विकास की चुनौती भी। इस बार की ताजा उत्तराखंड की यात्रा से गडकरी का तेवर और उग्र हो गया है। अटठारह हजार करोड़ रुपयों की महत्वाकांक्षी चार धाम आलवेदर सडक़ की ‘टाइम बाण्ड’ लक्ष्य की तलवार अब त्रिवेंद्र सिंह रावत की गर्दन पर तन गई है। गडकरी ने साफ चुनौतीपूर्ण रूप में कह दिया जो करना हो करो… सीबीआई से जांच करानी हो तो जाओ पीएम से बात कर लो, लेकिन लक्ष्य के बीच में मत आओ…।

क्या है मामला

कांग्रेस के शासनकाल में नेशनल हाईवे के 74 प्रोजेक्ट स्वीकृत हुए थे। जमीन अधिग्रहण के दौरान 4000 करोड़ के घोटाले का आरोप लगा था। एसआईटी जब जांच आगे बढ़ी तो पता चला कि सबसे पहले गजट नोटिफिकेशन के तहत कृषि भूमि को तत्कालीन एसडीएम बीएस फोनिया और मुख्य आरोपी डीपी सिंह ने पूरी प्लानिंग के साथ व्यवसायिक भूमि में 143 के तहत बदल दिया क्योंकि कृषि भूमि का सर्किल रेट कम होता है, ऐसे में कृषि भूमि को व्यवसायिक भूमि बनाकर इसका सर्किल रेट बढ़ा दिया गया था।

लिहाजा एक करोड़ की जमीन 10 करोड़ से ऊपर की हो गई। फोनिया पर यह भी आरोप थे कि उन्होंने चकबंदी अधिकारियों के साथ मिलकर चकबंदी भूमि को भी व्यवसायिक भूमि में बदल दिया जबकि कानूनी दृष्टि से यह अधिकार सिर्फ चकबंदी अधिकारी का ही है।

गडकरी की चेतावनी

गडकरी की इस यात्रा के पहले से ही यह मुद्दा इस पर्वतीय राज्य की फिजा में तैर रहा है। उत्तराखंड में राष्ट्रीयराजमार्ग के लिए जमीन अधिग्रहण में धांधली की सीबीआई से जांच कराने के त्रिवेंद्र सरकार के फैसले पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने नाखुशी जाहिर करते हुए इसे वापस लिये जाने के लिए पत्र लिखा था और यह पत्र लीक भी हुआ था। इस पत्र में गडकरी ने प्रदेश सरकार को यह भी चेताया था कि यदि मामले की सीबीआई जांच होती है तो राज्य में राष्ट्रीय राजमार्ग का काम लटक सकता है।

राज्य में चुनाव के समय भाजपा ने राजमार्ग के लिए जमीन अधिग्रहण में कांग्रेसी सरकार की कथित धांधली को चुनावी मुद्दा बनाया था। मुख्यमंत्री बनते ही त्रिवेन्द्र ने सीबीआई जांच की सिफारिश भी कर दी। इस पर नितिन गडकरी नाराज हो गए। वजह.. जांच में नेशनल हाईवे के अफसरों के भी चपेट में आने की आशंका। उधर गडकरी का पत्र मिलने के बाद मुख्यमंत्री रावत अड़ गए। साफ कह दिया कि सरकार सीबीआई जांच का फैसला वापस नहीं लेगी। जबकि मंत्रालय का मानना था कि यदि राज्य में राष्ट्रीय राजमार्गों को लेकर सीबीआई जांच शुरू होती है तो विभिन्न परियोजनाओं का काम लटक जाएगा।

गडकरी ने भी पत्र में लिखा था कि एनएच घोटाले की जांच सीबीआई से न करवाई जाए बल्कि एसआइटी से ही करवाएं क्योंकि सीबीआई से जांच करवाने में एनएच के अधिकारियों की कार्यशैली पर फर्क पड़ेगा और उनकी छवि भी खराब होगी, जिससे उनका मनोबल टूट जाएगा।

अभी एसआईटी कर रही है जांच

एसआइटी की रिपोर्ट में सामने आया कि इसमें एसडीएम से लेकर एनएच के अधिकारी भी शामिल थे और यह घोटाला 170 करोड़ से बढक़र 300 करोड़ से ज्यादा का था। जांच अभी जारी है। सरकार ने इतने बड़े घोटाले में अबतक सिर्फ दो एसडीएम को ही जेल भेजा और 6 पीसीएस अधिकारियों को निलंबित कर दिया, इन अधिकारियों में से दो गिरफ्तार हुए। अधिकारियों में एक बीएल पूनिया तो दूसरे डीपी यादव हैं। इसके अलावा कुल 12 गिरफ्तारियां हुई हैं।

जीएसटी से सरकार भी परेशान

जीएसटी के चलते राज्य सरकार की आमदनी में 500 करोड़ की गिरावट आयी है। वहीं आबकारी से सरकार को दिसंबर
तक 1750 करोड़ की आय हुई है जबकि 23 सौ करोड़ का लक्ष्य बहुत दूर है। कुल मिलाकर देखा जाए तो राज्य सरकार अपनी आमदनी के लक्ष्य से करीब 6000 करोड़ रुपए अभी पीछे चल रही है।

14वें वित्त आयोग को चमक दिखाना पड़ चुका है महंगा

14 वें वित्त आयोग को चमक दिखाने के चक्कर में राज्य को सालाना करीब 1500 करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है। नतीजा यह हुआ कि विशेष आयोजनागत मद में और विशेष केंद्रीय सहायता के रूप में मिलने वाली ग्रांट में कैंची चल गई। अब 15वां वित्त आयोग अपना काम करना शुरू कर देगा। इस बार सरकार पिछली चूक दोहराने के पक्ष में नहीं है।

दरअसल चमकदार आंकड़ों का नतीजा यह हुआ था कि राज्य के बड़े भूभाग में आर्थिक सामाजिक असमानता छिप गई थी जो कि इस पर्वतीय राज्य की प्रगति या विकास में बाधक है। इस बार त्रिवेंद्र सरकार विषम पर्वतीय क्षेत्रों में ढांचागत विकास में अधिक मदद के लिए पुरजोर पैरवी की तैयारी कर रही है। सरकार की निगाहें चार धाम आलवेदर रोड व नमामि गंगे पोजेक्ट्स पर हैं। अगर स्थितियां सरकार की मंशा के अनुरूप रहीं तो सडक़, पेयजल, ऊर्जा, हवाई पट्टियों का विकास करने के लिए केंद्र सरकार के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से ज्यादा मदद लेकर पलायन और बेरोजगारी की समस्या से निपट सकेगी।

कहां से चुकाएंगे कर्ज

त्रिवेंद्र सरकार के समक्ष बड़ी चुनौती और भी है वह है बाह्य सहायतित योजनाओं में केंद्र से मिलने वाली बड़ी मदद में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं का कर्ज चुकाने की। दरअसल केंद्र सरकार ने केवल 14वें वित्त आयोग तक ही बाह्य सहायतित योजनाओं 90 फीसदी हिस्सेदारी चुकाने का जिम्मा लिया हुआ है।

अभी तक राज्य सरकार को सिर्फ दस फीसदी चुकाना पड़ रहा है। लेकिन 2019 के बाद राज्य सरकार को पूरा ऋण खुद ही चुकाना पड़ेगा। जो सबसे भारी पड़ेगा। इसलिए अब बची हुई अवधि में बाह्य सहायतित योजनाओं के लिए मिले धन का सरकार अधिक से अधिक सदुपयोग करने की कोशिश कर रही है ताकि इसको आगे भी जारी रखवाया जा सके।
केंद्र के दरवाजे पर दस्तक की तैयारी में पंत

संकट में घिरी उत्तराखंड सरकार को उबारने के उपायों पर हुई एक बातचीत में राज्य के वित्त मंत्री प्रकाश पंत ने कहा कि आर्थिक संकट जैसा कुछ नहीं है। और जो कुछ है वह आज का नहीं है। जनता ने हमें जो जिम्मेदारी सौंपी है हम उसको निभाएंगे। केन्द्रीय बजट से पहले हम दिल्ली जाकर राज्य की अपेक्षाओं का खाका रखेंगे। हमें उम्मीद है कि हमें केंद्र से अपेक्षित सहयोग मिलेगा।

पंत ने कहा कि पहली जरूरत राज्य का बुनियादी ढांचा मजबूत करने की है। इसके जरिये हम रोजगार के नये अवसर सृजित करेंगे। जिससे पलायन भी रुकेगा। राज्य कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग व संपर्क मार्गों के अधिक से अधिक विकास के लिए केंद्र पोषित योजनाओं में अधिक से अधिक मदद की मांग करेगा।

वित्तमंत्री ने कहा कि हमारा जोर तीन बिन्दुओं पर है केंद्र सरकार पर विभिन्न योजनाओं के बकाये की देनदारी, केंद्र पोषित योजनाओं व बाह्य सहायतित योजनाओं में ज्यादा से ज्यादा सहायता हासिल करना। उन्होंने कहा कि 2013 की आपदा के बाद केंद्र सरकार सेमिलने वाली धनराशि की प्रत्याशा में किये गए खर्च की प्रतिपूर्ति की मांग भी की जाएगी। इसके अलावा एक महत्वपूर्ण बिन्दुअधूरी योजनाओं को पूरा करने के लिए धन की मांग का भी रहेगा।

चुनौतियों के मुकाबले के लिए चाहिए पैसा

पहाड़ पर बेरोजगारों की बढ़ती भीड़ और पलायन रोकने के लिए रोजगार के नए अवसर देने का रास्ता तभी खुलेगा जब विकास की बड़ी योजनाओं पर काम शुरू होगा। राज्य की स्थिति यह है कि सारा पैसा गैर योजनागत खर्चों में खर्च हो जा रहा है। विकास की योजनाओं पर काम करने के लिए कुल तेरह – चौदह फीसदी जुटाने में सरकारी मशीनरी को छींकें आ रही हैं।

केंद्र से अभी तक राज्य को विभिन्न योजनाओं के रूप में 5700 करोड़ की मदद दी जा चुकी है। जबकि राज्य के हालात देखकर केंद्र पोषित योजनाओं और अन्य केंद्रीय मदद को लेकर मोदी सरकार ने अभी कुछ भी साफ नहीं किया है। हालांकि राज्य सरकार वैसे तो केंद्र से चार हजार करोड़ की मदद मिलने की उम्मीद जता रही है लेकिन खुद उसी ने केंद्र से सहायता अनुदान के रूप में 82.30 करोड़ मिलने की बात कही है। बाकी 2500 करोड़ कहां से आएंगे इस पर कुछ साफ नहीं है।

केंद्र के रहमोकरम पर उत्तराखंड

उत्तराखंड राज्य पूरी तरह से केंद्र सरकार के रहमोकरम पर निर्भर है। राज्य की आमदनी की बात करें तो आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपइया वाली कहावत चरितार्थ हो जाएगी। वेतन पेंशन और भत्तों पर राज्य का सालाना खर्च जहां 18 हजार करोड़ है वहीं आमदनी मात्र 15 हजार करोड़ है।

उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्या इसका विषम भौगोलिक क्षेत्रफल है तो राज्य में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों पर पर्यावरण बंदिशों का पहरा है। बड़े विकास कार्यों और पर्वतीय क्षेत्र के विषम भूभाग में विकास की बुनियाद डालना भी बहुत ही खर्चीला काम है। यानी विकास मदों और अवस्थापना विकास के लिए राज्य की त्रिवेंद्र सरकार को खासी मशक्कत करनी पड़ेगी।

राज्य की जनता भी सरकार की ओर टकटकी लगाए हुए है, विपक्ष भी सरकार की प्रत्येक गतिविधि पर सतर्क निगाह लगाए हुए है क्योंकि उसे सिर्फ एक चूक का इंतजार है। इन हालात में केंद्र पर निर्भर होना राज्य की विवशता भी है क्योंकि अकेले दम राज्य की बिगड़ी व्यवस्था को पटरी पर लाना संभव नहीं है। न तो मुख्यमंत्री और न ही राज्य केन्द्र की नाराजगी झेलने की स्थिति में हैं।

 

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