उत्तराखण्ड : एक और हाइड्रो प्रोजेक्ट पर ग्रहण, लैंको इन्फाट्रेक लि. ने खड़े किये हाथ

Published by raghvendra Published: February 17, 2018 | 4:28 pm
Modified: February 17, 2018 | 4:30 pm

देहरादून। रुद्रप्रयाग में फांटा-ब्यूंगगाड हाइड्रो प्रोजेक्ट बना रही लैंको इन्फाट्रेक लिमिटेड ने इस परियोजना को बनाने से हाथ खड़े कर दिये हैं। कंपनी का तर्क है कि 2013 की केदारनाथ आपदा में इस जलविद्युत परियोजना को भारी नुकसान हुआ था जिसकी भरपाई कर पाने में कंपनी असमर्थ है इसलिए कंपनी खुद को दिवालिया घोषित कर रही है।

बताया जाता है कि कंपनी पिछले एक साल से इस प्रोजेक्ट से मुंह मोडऩे का मन बना रही थी वाजिब कारण की तलाश थी जो उसे केदारनाथ त्रासदी के रूप में बड़े आराम से मिल गया। कंपनी की बनायी टनल में 2011 से ही दरारें आनी शुरू हो गई थीं। 2012 में फिर दरारें आयीं जिन्हें कंपनी लुकाछिपाकर ठीक करने का प्रयास करती रही। इसके बाद 2013 की त्रासदी से कंपनी को परियोजना छोडऩे का बहाना मिल गया।

वर्ष 2007 में केदारघाटी में 76 मेगावाट की ब्यूंगाड़ जलविद्युत परियोजना का कार्य लैंको कंपनी ने शुरू किया था। इसे वर्ष 2012 में पूरा होना था। इसकी लागत उस समय 484 करोड़ की रखी गई थी। लेकिन यह परियोजना 10 वर्ष बाद भी पूरी नहीं हो सकी। अभी तक मात्र 75 फीसदी कार्य ही हो सका, जबकि अब तक दो गुने से अधिक 11 सौ करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं।

जून 2011 में केदारघाटी में मंदाकिनी नदी में निर्माणाधीन फाटा-ब्यूंगगाड़ जल विद्युत परियोजना के एडिट-2 के ऊपर जमीन में काफी चौड़ी और गहरी दरार पड़ी थी। अगस्त 2011 में भी इसी प्रोजेक्ट के तहत बनाई जा रही कंपनी की निमार्णाधीन टनल में दरार आ गई थी। तब टनल का पांच मीटर हिस्सा टूट गया था। इससे सेरसी के बीस परिवारों को खतरा पैदा हो गया था।

जमीन में दरार आने से सेरसी गांव का मुख्य पैदल मार्ग बंद हो गया था। ग्रामीणों ने फाटा-ब्यूंगगाड़ जल विद्युत परियोजना के एडिट-2 में काम रुकवा दिया था। उनका आरोप था कि परियोजना के लिए सुरंग बनाने के लिए भारी मात्रा में विस्फोटकों का प्रयोग किया गया, जिसकी वजह से जमीन में दरार आ गई। लेकिन उस समय कंपनी ने ग्रामीणों के इस आरोप को खारिज कर दिया था तब कंपनी ने कहा था कि साइट में दो माह से ब्लास्टिंग ही बंद है।

भवनों में दरारें पडऩे पर ग्रामीण इस परियोजना का काम बंद कराते थे काम कुछ दिन बाद फिर शुरू हो जाता था। इसी तरह 2012 में कंपनी ने सुरंग निर्माण के लिए फिर भारी मात्रा में विस्फोटकों का प्रयोग किया। जिससे शेरसी गांव में एडिट-2 के ऊपर लगभग दो मीटर चौड़ी और करीब 60 मीटर गहरी दरार पड़ गई।

ग्रामीणों ने उस समय भी एडिट-2 में काम बंद करवाया था। ग्रामीण बताते हैं कि उस समय गांव में नुकसान होने के बावजूद कंपनी ने टनल निर्माण जारी रखा। एजेंसी के कार्यों की जांच की ग्रामीणों की मांग की लगातार अनदेखी की जाती रही । जबकि परियोजना निर्माण से जुड़ी लैंको इनर्जीज लिमिटेड आरोपों को सिरे से नकारती रही। उसका यही दावा रहा कि साइट में दो माह से ब्लास्टिंग बंद है।

संभव है विगत दिनों आए भूकंप से दरार आई हो। अलबत्ता दरार को भर दिया गया और काम फिर शुरू हो गया। इसके बाद केदारनाथ आपदा 2013 में आयी जिसमें फिर टनल में गाद भर गई। और कंपनी का काम रुक गया। लंबे समय तक काम को अटकाए रखने के बाद फाटा-ब्यूंगगाड हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट बना रही लैंको इन्फाट्रेक लिमिटेड ने अब इस जल विद्युत परियोजना को बनाने से हाथ खड़े कर दिए हैं। परियोजना बंद हो जाने के कारण उन लोगों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया है जो इस प्रोजेक्ट में काम कर रहे थे।

उत्तराखंड जल विद्युत निगम के महाप्रबंधक हिमांशु अवस्थी का कहना है कि लैंको अब तक थर्मल एनर्जी वाली परियोजनाएं बनाता रहा है लेकिन उसने उत्तराखंड में जल विद्युत परियोजना में हाथ आजमाया जिससे उसे नुकसान उठाना पड़ा और अब वह ऋण चुकाने में असमर्थ है। इसलिए उसने खुद को दिवालिया घोषित कर उत्तराखंड की अपनी परियोजनाएं बंद करने का फैसला किया है।

लीड बैंक अधिकारी एसएस तोमर का कहना है कि केंद्र सरकार की गाइडलाइन के मुताबिक हाइड्रो प्रोजेक्ट को कई नियमों से गुजरना पड़ता है। नियमों का पालन न करने पर वित्तीय लेन-देन पर रोक लगा दी जाती है।

कंपनी ने परियोजना के लिए पहाड़ में सुरंग बनाने के लिए ब्लास्टिंग से लोगों को हुए नुकसान का मुआवजा दिया था लेकिन अब नुकसान के कारण वह दिवालिया हो गई है। इस परियोजना की वजह से कई जल स्रोत भी सूख गए थे या उन्हें डाइवर्ट कर दिया गया था। इस कारण लोगों को पेयजल की समस्या का सामना भी करना पड़ रहा था।

यही नहीं सुरंग के लिए किए गए विस्फोटों से घरों में दरारें पड़ गई थी और ब्यूंग गांव में तो चार घर ध्वस्त ही हो गए थे। आम लोगों का आरोप था कि उन्हें परियोजना के लिए मामूली कीमत पर अपने खेत बेचने को मजबूर किया गया। अब खेती छोड़ कर परियोजना में काम कर रहे लोगों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया है। इनमें अधिकांश उत्तराखंड के हैं।

यह परियोजना वर्ष 2018 में पूरी होनी थी, लेकिन लैंको कंपनी की अच्छी परफोरमेंस न होने के कारण बैंकर्स ने ऋण देने से मना कर दिया, जिससे परियोजना बंद हो गई है। कंपनी ने सामान समेटना शुरू कर दिया है। बैंकों ने हाइड्रो प्रोजेक्ट कंपनी लैंको के खातों को नान परफारङ्क्षमग ऐसेट्स (एनपीए) में डाल दिया है।
मंगेश घिल्डियाल
जिलाधिकारी, रुद्रप्रयाग