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Y- Factor | COVID-19: सिर्फ दवा नहीं, इन बातों पर भी करें अमल...

मन के हारे हार है। मन के जीते जीत। डर के आगे हार है। वह भी तब जब डर के चलते आप मन हार बैठे हों। इस समय सबको महामारी...

Yogesh Mishra

Yogesh MishraWritten By Yogesh MishraAman DeepankarPublished By Aman Deepankar

Published on 7 May 2021 2:11 PM GMT

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Y.FACTOR (Yogesh Mishra) : मन के हारे हार है। मन के जीते जीत। डर के आगे हार है। वह भी तब जब डर के चलते आप मन हार बैठे हों। इस समय सबको महामारी के भय ने अपने आग़ोश में ले रखा है। पर आप नहीं जानते कि किसी भी समस्या से निपटने के लिए ज़रूरी होता है हौसला। कहा जाता है चिड़िया पंखों से नहीं हौसलों से उड़ती हैं।तभी तो जिस पक्षी के हौसले जितने बुलंद होते हैं, वह उतनी ऊँची उड़ान भरता है।

तो ऐसे में, ऐसे समय में उन सारी चीजों से बचना चाहिए जो हमारे आप में डर पैदा करती हैं।वायरस से बचना तो आसान है। लेकिन जो डर आपके और दुनिया के अधिकतर लोगों के भीतर पैठ गया है, उससे बचना बहुत ही मुश्किल है।डर से ज्यादा खतरनाक इस दुनिया में कोई भी वायरस नहीं है।हर समस्या कमजोर के लिए डर है। जबकि ज्ञानी के लिए अवसर। लेकिन वह अवसर तभी बन पायेगी जब आपका दिमाग़ बदलेगा। दिमाग़ बदलने के लिए ज़रूरी है कि आप खबरें देखना, सुनना व सोशल मीडिया पर महामारी से जुड़ी परेशान करने वाली पोस्टसे बचें। ऐसी पोस्ट डालें भी नहीं। किसी पोस्ट को डालने से पहले तहक़ीक़ात कर लें कि वह सही है या नहीं। गूगल के पास ऐसा साफ्टवेयर है। उसका फायदा उठाया जाना चाहिए ।

समाचार पढ़ने, देखने और सुनने से मैं इसलिए मना कर रहा हूँ क्योंकि इतनी निचले स्तर की रिपोर्टिंग केवल अपने देश मे होती है-"धधकती हुई चिताएं।भरे हॉस्पिटल।परेशान परिजन।" यह हक़ीक़त है। पर क्या ज़रूरत है कि हर आधे घंटे के स्लाट में वही खबर दोहराई जाये। आखिर यह सब दिखा कर क्या जताना चाहते हैं? महामारी है, सबको पता है।आउट ऑफ कंट्रोल है, यह भी सबको पता है।रिपोर्टिंग करिए।ठीक हुए मरीजों का इंटरव्यू करिए।ऑक्सिजन सिलिंडर कहां मिल रहा है यह बताइए।प्लाज्मा डोनर्स का डेटा बेस बनाइये।

किस हॉस्पिटल में बेड खाली है, यह बताइए।

एम्बुलेंस सर्विस का डिटेल दीजिए । ऐसे समाचार व ऐसी सूचनाएँ साझा करें जो

उम्मीद जगाये। इस बात पर यक़ीन कराये कि कोई ऐसी बड़ी से बड़ी अंधेरी रात नहीं होती जिसकी सुबह न होती हो।

जीने के लिए उम्र के साथ साथ जिजीविषा चाहिए। इसकी कुछ मिसाल- स्टीफन हाकिंग, जार्ज बर्नाड शॉ, शरद पवार हैं । हाकिंग को इक्कीस साल की उम्र में डॉक्टरों ने एक भयानक बिमारी की चपेट में आने के बाद कह दिया था कि उनकी उम्र केवल दो साल बची है। उन्होंने डॉक्टरों की भविष्यवाणी को ग़लत साबित करते हुए पचास साल की ज़िंदगी जी। नोबेल पुरस्कार विजेता बर्नाड शॉ जब बहुत बीमार पड़े तो डॉक्टरों ने कहा कि अंडा व मांस का शोरबा नहीं खायेंगे तो बचेगें नहीं। वह जानवर प्रेमी थे लिहाज़ डॉक्टरों के कहे की अनदेखी कर दी। वह अपनी मौत मरे। शरद पवार को डॉक्टरों ने 2004 में कह दिया था कि आपके पास जिदगीं के केवल छह मास शेष हैं। उन्हें कैंसर था। आपरेशन कराया। सत्रह साल से मौज की ज़िंदगी जी रहे हैं।

पर इस जिजीविषा के लिए मन बदलना होगा।

पुस्तकें पढ़िए। फिल्में देखिये। योग कीजिये और एक माह में पंद्रह किलो वजन घटाइए, चेहरे पर बच्चों जैसी ताजगी लाइये।जो शख़्स पसंद हो उससे लंबी लंबी बातें कीजिये । हमारे श्रृंगारी कवियों ने इसमें भी एक रस तलाशा है-बतरस।अपने शौक़ पूरे कीजिए।भय और भीड़ का यह मनोविज्ञान सब के समझ नहीं आता है।डर में रस लेना बंद कीजिए।आमतौर पर हर आदमी डर में थोड़ा बहुत रस लेता है, अगर डरने में मजा नहीं आता तो लोग भूतहा फिल्म देखने क्यों जाते? हंट हाउस क्यों चलते? डर भी एक तरह का आत्म-सम्मोहन ही है। इससे शरीर के भीतर रासायनिक बदलाव होने लगता है। यह बदलाव कभी कभी इतना जहरीला हो जाता है कि आपकी जान भी ले ले।

पैनिक (हड़बड़ाहट )भारतीयों की बहुत बुरी आदत है |ट्रेन आती है ।लोगों को उतरने देंगे नहीं खुद पहले घुसेंगे , कही ट्रेन चली न जाए हम रह ना जाएं।सड़क पर थोड़ी भी जगह दिख जाए कहीं भी घुस जायेंगे। कुछ सेकंड में ही हॉर्न बजाने लगेंगे। गालियाँ देने लगेंगे।जैसे बम डीफ्यूज करने जाना है , एक सेकंड की भी देरी हुई तो ब्लास्ट हो जायेगा । लॉकडाउन की बात हो तो बाजार में टूट पड़ेंगे सामान जमा करने के लिए। हमारी इसी आदत के कारण करोना भी मैनेज नहीं हो पा रहा है | केवल दो फ़ीसदी लोगों को हॉस्पिटल में रखने, ऑक्सीजन की जरुरत होती है। केवल पाँच फ़ीसदी को राम्देसिवर की जरुरत होती है।

हमारी इन्ही हरकतों के कारन ही कमी है , वरना जरुरतमंदों के लिए कोई कमी नहीं |

इज़राइल ने अपने सामूहिक टीकाकरण अभियान में सफलता मिलने के बाद कोरोनावायरस प्रतिबंधों में नवीनतम ढील देते हुए मास्क मुक्त जीवन की अनुमति दे दी है अपनी शिक्षा प्रणाली को पूरी तरह से फिर से खोल दिया है। सभी प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में रविवार को छात्र कक्षाओं में लौट आए।स्वास्थ्य अधिकारियों ने सार्वजनिक स्थानों पर मास्क पहनने के लिए एक साल की आवश्यकता को समाप्त कर दिया। हालांकि मास्क अभी बंद स्थानों और बड़ी सभाओं में आवश्यक हैं।

इज़राइल ने दुनिया में अग्रणी टीकाकरण अभियान चलाकर कोरोनोवायरस के खिलाफ अपनी अधिकांश आबादी को तेजी से कवर कर लिया है। देश ने अपने कोरोनोवायरस प्रतिबंधों में से अधिकांश को उठा लिया है। पिछले सप्ताह घोषणा की है कि यह मई से शुरू होने वाले विदेशी पर्यटकों के टीकाकरण के लिए देश को फिर से खोल देगा।

इज़राइल के कोरोनावायरस सीज़र, नचमैन ऐश ने रविवार को इज़राइली पब्लिक रेडियो पर कहा कि मास्क की आवश्यकता को खत्म करना और शिक्षा प्रणाली के तहत क्लास रूम अध्ययन को फिर से स्थापित करना एक जोखिम भरा फैसला था।35 वर्षीय एली ब्लियाच ने रविवार को सुबह डाउनटाउन यरुशलम में मास्क-फ्री घूमते हुए कहा-" मैं फिर से खुली हवा में साँस ले सकता हूँ।"सूरज निकलने और तापमान बढ़ने के साथ, कुछ लोगों ने मास्क टैन लाइनों से बचने के बारे में मजाक किया। लेकिन अन्य इज़राइली सुरक्षा की परत को हटाने में हिचकिचा रहे थे जो पहली बार में इतने अलग-थलग महसूस कर रहे थे, लेकिन कई लोगों ने इसका इस्तेमाल किया है। कॉस्मेटोलॉजिस्ट और केयरगिव 59 वर्षीय इलाना डैनिनो ने कहा, "मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि महामारी खत्म हो गई है।"

कहा जाता है कि अगर एंटीबॉडी बने तो इस बीमारी से निजात मिल सकती है।एंटीबॉडी सिर्फ दवाइयों की दुकान पर ही नहीं मिलती।

कहीं और भी मिलती है।जैसे-फ़ोन स्क्रीन पर किसी का नाम देखते ही आपका चेहरा खिल उठे। तब बनती है एंटीबॉडी।किसी मुसीबत में जो आपके कंधे पर हाथ रखकर आप से कहे चिंता मत कर, तब बनती है एंटीबॉडीं।सारी दुनिया आपके खिलाफ खड़ी हो , तब कसकर कोई आपको गले लगाकर कहे- 'मैं हूं ना।' तब बनती है एंटीबॉडी।हो सकता है आपकी दोस्ती की एंटीबॉडी मिल जाने से किसी की खुशियां किसी का जीवन पुनः लौट आये।इसलिए जुटिये इस नये काम में।

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