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Pegasus Spyware: बहुत बड़ी है ये इंडस्ट्री, जानिए कौन-कौन हैं इसमें शामिल, देखें Y-Factor...

Pegasus Spyware: स्पाईवेयर इंडस्ट्री (Spyware Industry) 12 अरब डॉलर से ज्यादा की है। जो बढ़ती ही जा रही है। सरकारें ऐसी टेक्नोलॉजी खरीदने को तैयार बैठी हैं।

Yogesh Mishra

Yogesh MishraWritten By Yogesh MishraShreyaPublished By Shreya

Published on 4 Aug 2021 11:41 AM GMT

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Pegasus Spyware: इजरायल के एनएसओ ग्रुप के पेगासस स्पाईवेयर को लेकर दुनियाभर में हल्ला मचा हुआ है। एनएसओ ग्रुप और इजरायल सरकार कठघरे में है। जासूसी प्रकरण (Jasoosi Case) के खुलासे से लगता है कि सिर्फ एक ही कम्पनी यह गुल खिला रही है जबकि असलियत यह है कि इजरायल और कई अन्य देशों में इस तरह की ढेरों कंपनियां हैं जो स्पाईवेयर और अन्य साइबर हथियार बनाती और बेचती हैं। क्योंकि सरकारें ऐसी टेक्नोलॉजी खरीदने को तैयार बैठी हैं। न सिर्फ सरकारें, बल्कि लोकल पुलिस एजेंसियां, कॉर्पोरेट और आम जनता भी खरीद रही हैं। स्पाईवेयर इंडस्ट्री (Spyware Industry) 12 अरब डॉलर से ज्यादा की है। जो बढ़ती ही जा रही है।

स्पाईवेयर बनाने और बेचने में इजरायल के अलावा, ब्रिटेन और यूरोपीय देश आगे हैं। ब्रिटेन में सर्विलांस उपकरण (Surveillance Equipment) बनाने और एक्सपोर्ट करने वाली 104 कम्पनियां हैं। 122 कंपनियों के साथ अमेरिका नंबर वन पर है। चेल्टनहम में ब्रिटेन की सर्विलांस एजेंसी 'गवर्नमेंट कम्युनिकेशन्स हेडक्वार्टर' (जीसीएचक्यू) का विशालकाय दफ्तर है। यह दुनिया की सबसे आक्रामक खुफिया एजेंसियों में से एक है, जो पूरे विश्व की जासूसी करती है। जीसीएचक्यू की उपस्थिति के चलते चेल्टनहम जैसा छोटा सा कस्बा सर्विलांस और साइबर सिक्योरिटी के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियों का हब बन गया है।

जीसीएचक्यू (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

गतिविधियों का पर्दाफाश

2013 में सीआईए के पूर्व ऑपरेटर एडवर्ड स्नोडेन ने इसकी गतिविधियों का पर्दाफाश कर दिया। इसका एक नतीजा यह हुआ कि जीसीएचक्यू ज्यादा खुलेपन के साथ प्राइवेट कंपनियों के साथ काम करने लग गई। चेल्टनहम में आज विश्व की दिग्गज हथियार निर्माता कंपनियों के भी दफ्तर हैं। द इंटरसेप्ट वेबसाइट के अनुसार, ये कंपनियां बेहद गोपनीय तरीके से काम करती हैं। मीडिया को कोई जानकारी नहीं दी जाती है। लेकिन 'एल 3 टीआरएल टेक्नोलॉजी' कम्पनी ने कुछ जानकारियां शेयर की हैं। यह कंपनी अपने ग्राहकों के बारे में कुछ नहीं बताती है। लेकिन इसके यूएई से ताल्लुक हैं।

पिछले एक दशक में ब्रिटेन ने 9.9 अरब डालर कीमत के हथियार और अन्य उपकरण यूएई को बेचे हैं। ब्रिटेन की एक अन्य कंपनी है 'कम्सऑडिट'। जिसका टॉप प्रोडक्ट 'स्पेक्ट्रा ब्लैक' नामक सर्विलांस सिस्टम है। जो एक पोर्टेबल डिवाइस है। यह सेलफोन कॉल और अन्य वायरलेस कम्युनिकेशन को मॉनिटर करता है।

2013 में सर्विलांस और हैकिंग टेक्नोलॉजी की बिक्री को कंट्रोल करने के लिए 'वास्सेनर अरेंजमेंट' नामक समझौता हुआ। इस पर 43 देशों ने हस्ताक्षर किये थे। इस समझौते का उद्देश्य था कि दमनकारी और तानाशाही सरकारों को जासूसी उपकरण की बिक्री पर रोक लगे ताकि ऐसी ताकतें मानवाधिकारों का उल्लंघन न करने पायें। पर हुआ कुछ नहीं।

(सांकेतिक फोटो साभार- सोशल मीडिया)

2015 के बाद से 74 देशों ने खरीदी स्पाईवेयर टेक्नोलॉजी

ग्लोबल स्पाईवेयर मार्किट इंडेक्स के अनुसार 2015 के बाद से 74 देशों ने 18 कंपनियों से स्पाईवेयर टेक्नोलॉजी खरीदी है या इस्तेमाल की है। यूरोप, ब्रिटेन , अमेरिका और इजरायल में ऐसे स्पाईवेयर बनाने वाली 78 फीसदी कम्पनियां स्थित हैं।

स्पाईवेयर के ग्राहकों में से 55 फीसदी निरंकुश सरकारें हैं। सिर्फ 7 फीसदी ग्राहक पूर्ण लोकतान्त्रिक सरकारें हैं। ब्रिटिश-जर्मन कंपनी फिनफिशर के पास सबसे ज्यादा 34 ग्राहक हैं। इसके बाद 25 ग्राहकों के साथ सर्कल्स कंपनी है । जबकि 23 ग्राहकों के साथ एनएसओ ग्रुप तीसरे स्थान पर है। स्पाईवेयर के जरिये सबसे ज्यादा जासूसी सामाजिक एक्टिविस्टों और राजनीतिक असंतुष्टों की की जाती है। ऐसे करने वाले 25 देश हैं।

कनाडा स्थित टोरंटो यूनिवर्सिटी की सिटिज़न लैब सरकारों द्वारा डिजिटल जासूसी के प्रमाण खोजती है। पिगेसस स्पाईवेयर मामले का भंडाफोड़ होने से हफ्ता भर पहले सिटिज़न लैब ने खुलासा किया था कि किस तरह इजरायल की कैंडिरू कंपनी विदेशी सरकारों को स्पाईवेयर बेचती है। इसके स्पाईवेयर का इस्तेमाल टर्की से लेकर सिंगापुर में पत्रकारों और राजनीतिक विरोधियों की जासूसी करने के लिए किया गया है।

यही नहीं, 2017 में सिटिज़न लैब ने जांच में पाया था कि एक अन्य इजरायली कम्पनी साइबरबिट के स्पाईवेयर का इस्तेमाल इथियोपिया की सरकार ने निर्वासित असंतुष्टों के कम्प्यूटरों में किया था। इस बिजनेस में सिर्फ इजरायल ही शामिल नहीं है बल्कि और भी देश लगे हुए हैं। हालांकि इजरायल इस मामले में सबसे आगे है। पिगेसस की तरह ब्रिटेन जर्मनी के फिनफिशर स्पाईवेयर को इंटेलिजेंस व कानून व्यवस्था से जुड़ी एजेंसियों की मदद वाला हथियार बताया जाता है। इटली की कम्पनी हैकिंग टीम के बारे में 2015 में खुलासे हुये थे कि ये दुनियाभर में दर्जनों सरकारों को स्पाईवेयर बेचती थी।

हैकिंग (सांकेतिक फोटो साभार- सोशल मीडिया)

हैकरों की मदद लेती हैं स्पाईवेयर बनाने वाली कंपनियां

जानकारों का कहना है कि स्पाईवेयर बनाने वाली कंपनियां अक्सर हैकरों की मदद लेती हैं। मिसाल के तौर पर पिगेसस के लेटेस्ट वर्जन को लोगों के फोन में इंस्टाल करने के लिए व्हाट्सएप और आईमैसेज जैसे सामान्य सॉफ्टवेयर की खामियों का फायदा उठाया गया। डार्क वेब पर हैकर इन 'जीरो डे' खामियों के डिटेल बेचते हैं।अमेरिका में जीरोडियम जैसी कंपनियां सॉफ्टवेयरों की खामियों की जानकारियां हैकरों से खरीदती हैं। ये जानकारी फिर सरकारों को या एनएसओ जैसी कंपनियों को बेची जाती है।

स्पाईवेयर की जड़ें 90 के दशक की शुरुआत से ही देखी जा सकती हैं। स्पाईवेयर इंडस्ट्री में सबसे निचले लेवल पर ऐसे टूल हैं जो डार्क वेब पर पांच-पांच हजार रुपए में बिक रहे हैं। ऐसे टूल किसी के वेबकेम में सेंध लगा सकते हैं, कंप्यूटर कीबोर्ड के इस्तेमाल को पढ़ सकते हैं, किसी की लोकेशन का डेटा हासिल कर सकते हैं।

ये तो निजी लेवल की जासूसी की बात है।लेकिन अगर ग्लोबल लेवल पर सर्विलांस पर नजर डालें तो हैरान और परेशान करने वाली स्थिति है। अमेरिका के पूर्व सीआईए ऑपरेटर एडवर्ड स्नोडेन ने इसी सर्विलांस का खुलासा 2013 में किया था। स्नोडेन ने बताया था कि किस तरह सर्विलांस टूल्स के जरिये नागरिकों के निजी डेटा को एकत्र किया जाता है।

2017 में पता चलता है कि अमेरिका की नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी के टॉप प्रोग्रामरों ने 'इटरनल ब्लू' नामक एक अडवाणी साइबर जासूसी हथियार डेवेलप किया है जिसे शैडो ब्रोकर्स नामक हैकरों के ग्रुप ने चोरी करके डार्क वेब पर बेच दिया। बाद में इसी स्पाईवेयर के जरिये इंग्लैंड के नेशनल हेल्थ सिस्टम और सैकड़ों अन्य संगठनों पर रैनसमवेयर हमला किया गया। अब अगर पिगेसस को भी कोई हैकर चुरा कर डार्क वेब में बेचने लगे तो उसका क्या अंजाम होगा यह अच्छी तरह समझा जा सकता है।

सरकारों को स्पाईवेयर की बिक्री की मंजूरी

ऑनलाइन रिसर्च जर्नल 'सेजपब' में प्रकाशित एक स्टडी में बताया गया है कि ब्रिटिश सरकार ने होंडुरास, सऊदीअरब, बहरीन, टर्की और मिस्र की सरकारों को स्पाईवेयर की बिक्री की मंजूरी दी हुई है। इस स्टडी में यह भी कहा गया है कि स्पाईवेयर इंडस्ट्री आम जनता को भी ऐसे सॉफ्टवेयर बेचने में भी बराबर की रुचि रखती है। मिसाल के तौर पर 'रेटिना एक्स' और 'फ्लेक्सी स्पाई' के 1 लाख 30 हजार सामान्य ग्राहक हैं। 'एमस्पाई' के 20 लाख ग्राहक बताए जाते हैं। इस कम्पनी के अनुसार उसके ग्राहकों में 40 फीसदी पेरेंट्स हैं जो अपने बच्चों की मॉनिटरिंग करते हैं। 15 फीसदी ग्राहक अपने कर्मचारियों की जासूसी करते हैं। बाकी 45 फीसदी ग्राहक कौन हैं, इसके बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है।

रामकृष्ण हेगडे़-बीएस येदियुरप्पा (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

भारतीय लोकतंत्र में फोन टैपिंग का मामला आज से तीन दशक पहले भी उठ चुका है। 1988 में इसकी वजह से कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगडे़ को इस्तीफा देना पडा था। 1990 में जब कांग्रेस के समर्थन से केन्द्र में चन्द्रशेखर के प्रधानमंत्रित्व में सरकार का गठन हुआ। तो चार महीने बाद 2 मार्च को मीडिया में कांग्रेस नेता राजीव गांधी की जासूसी और फोट टैपिंग का मामला उछला। इस पर राजीव गांधी और चन्द्रशेखर के बीच गहरे मतभेद पैदा होगए।कांग्रेस समर्थन वापसी का एलान करती चन्द्रशेखर ने 6 मार्च, 1991 को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

पिछले साल कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा पर फोन टैंपिंग के आरोप लगे। यहां तक कि येदियुरप्पा पर एफआईआर भी हुई। जब केन्द्र में मनमोहन सिंह की सरकार थी तब भी नीरा राडिया टेप कांड सुर्खियों में रहा। जिसमें कुछ पत्रकारों नौकरशाहों और नेताओं के नाम शामिल थें। इसके बाद दूरसंचार मंत्री ए राजा को इस्तीफा देना पडा था।

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