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Politics: क्यों ट्रेंड बन गई है संकेतों की राजनीति, देखें Y-Factor...

श्रीलंका की आज़ादी के बाद से संकेतों की राजनीति एक ट्रेंड बन गयी है...

Yogesh Mishra

Yogesh MishraWritten By Yogesh MishraPraveen SinghPublished By Praveen Singh

Published on 2 Aug 2021 11:55 AM GMT

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Politics Y-Factor: जब इंसान ने भाषा नहीं सीखी थी। तब अपनी बात कहने के लिए वह संकेतों का ही इस्तेमाल करता था। राजनीती में भी संकेतों का इस्तेमाल पूरी दुनिया में होता आया है। जहाँ जाति, धर्म और क्षेत्र के आधार पर लोगों के समूह ज्यादा बंटे हुए हैं । वहां इस तरह के राजनीति ज्यादा रही है। भारत इसका सबसे बड़ा उदहारण है। लेकिन अमेरिका, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन, श्रीलंका, पाकिस्तान, तुर्की आदि देश भी इससे अछूते नहीं हैं। तुर्की सबसे तजा उदहारण हैं । जहाँ इस्लामी देशों का नेतृत्व हथियाने के लिए इस्लामीकरण पर जोर है। अमेरिका में गृह युद्ध के बाद से ऐसी ही राजनीती रही है। यूनाइटेड किंगडम में आयरलैंड, स्कॉटलैंड ने अलगाववाद के लिए अपने राष्ट्रवाद और क्षेत्रवाद को ऐसी ही राजनीति से बढ़ावा दिया है।

अमेरिका के गृह युद्ध (America Black Civil War) (1861-1865) के साथ साथ संकेतों की राजनीति का उदय हुआ। दक्षिण के जो राज्य अमेरिका (America) से अलग हो कर पृथक अस्तित्व चाहते थे, उनके हीरो आज तक अलग हैं। इन राज्यों, जिनको कान्फेडरेट राज्य कहा गया, में गुलामी प्रथा का समर्थन करने वाले इन राज्यों के हीरो की मूर्तियाँ आज तक स्थापित हैं। अब ब्लैक लाइव मैटर आन्दोलन में कुछ जगहों पर इन मूर्तियों को ढहा दिया गया है। गृह युद्ध में संघीय (यूनियन) सेना के खिलाफ लड़ने वाले कान्फेडरेट राज्य के सेनापतियों और सैनिकों को श्वेत अमेरिकी नागरिकों का हीरों माना जाता है।

इसी तरह मार्टिन लूथर किंग जैसे मानवतावादी, मानवाधिकार आन्दोलनकारी नेता अश्वेतों के ही हीरो बना दिए गए। मेक्सिको सीमा पर दीवार खड़ी करना भी डोनाल्ड ट्रम्प की सांकेतिक राजनीती का हिस्सा हैं । यह दीवार श्वेत और गैर अप्रवासियों को राष्ट्रवाद के लिए प्रेरित करती है और ट्रम्प इसके नेता हैं।

श्रीलंका की आज़ादी के बाद से संकेतों की राजनीति एक ट्रेंड बन गयी है। भाषाई राष्ट्रवाद, बौद्ध धर्म के नायकों का स्मरण – ये सब सिंहली राजनीतिक दलों का चुनाव जेतने का मुख्या जरिया बना रहा है। 1948 से अब तक के सभी चुनावों में धार्मिक और संजातीय संकेतों का जमकर इस्तेमाल किया जाता रहा है। श्रीलंका में संकेतों की राजनीति का समावेश भंडारनायके ने 1950 के दशक में शुरू किया था। उनकी पार्टी ने सम्पूर्ण देश के विभिन्न वर्गों की बजाय सिर्फ बौद्धों और सिंहलियों पर फोकस किया। बौद्ध नायकों को देश का नायक बताना शुरू कर दिया । यहीं से श्री लंका में धार्मिक और सांप्रदायिक आधार पर बंटवारे की राजनीति शुरू हुई।

चीन में माओ की सांस्कृतिक क्रांति के बाद माओ ही एकमात्र संकेत बना दिए गए। देश में अलग अलग वर्गों के धार्मिक, राजनीतिक, सामुदायिक संकेतों या अगुवाओं के अस्तित्व को मिटा दिया गया। अब यही सांकेतिक राजनीती माओ से हट कर जिनपिंग पर केन्द्रित कर डी गयी है।

तुर्की में संकेतों की राजनीती का ताजा उद्धरण हदिया सोफिया का है। तुर्की के राष्ट्रपति ने इस प्राचीन स्मारक को मस्जिद में बदल कर तुर्की के कट्टरपंथी और इस्लामी तत्वों को तुर्की के गौरवशाली इतिहास से जोड़ने की कोशिश की है। ये इस्लामी राष्ट्रवाद का संकेत है। हदिया सोफिया भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द का संकेत हो सकता था । लेकिन उसे सीधे सीधे इस्लाम से जोड़ दिया गया. तुर्की में इस तरह का राष्ट्रवादी बदलाव बहुत लम्बे समय बाद सामने आया है।

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