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Tokyo Olympics 2020: क्या आपको पता है टोक्यो ओलंपिक की लागत, होश उड़ा देगी कीमत, देखें Y-Factor...

मेजबान शहर को खेलों के आयोजन स्थल, इंफ्रास्ट्रक्चर, श्रमशक्ति और मनोरंजन के लिए अरबों डालर खर्च करने पड़ते हैं...

Yogesh Mishra

Yogesh MishraWritten By Yogesh MishraPraveen SinghPublished By Praveen Singh

Published on 29 July 2021 11:32 AM GMT

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Tokyo Olympics 2020: ओलिंपिक (Olympics) खेलों का आयोजन कोई हंसी-खेल नहीं है। न कोई सस्ते का सौदा है। कहने को यह खेल है। लेकिन असलियत में यह अरबों डालर का मामला है। ओलिंपिक के आयोजन का खर्चा लगातार बढ़ते हुए अब किसी छोटे देश की समूची अर्थव्यवस्था के बराबर का हो गया है। टोक्यो ओलिंपिक की ही बात करें तो इसका बजट 7.3 अरब डालर था । लेकिन असल खर्चा बढ़ कर 30 अरब डालर के करीब पहुँच गया है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस खर्चे का लम्बे समय में कोई फायदा नहीं होता है।

मेजबान शहर को खेलों के आयोजन स्थल, इंफ्रास्ट्रक्चर, श्रमशक्ति और मनोरंजन के लिए अरबों डालर खर्च करने पड़ते हैं। इसके लिए उसे इंटरनेशनल ओलिंपिक समिति के साथ अनुबंध करना होता है। ओलिंपिक खेलों (Olympics Games) के आयोजन के लिए आईओसी के समक्ष बोली लगती है। जिसमें बोली लगाने वाले बताते हैं कि वह कितना खर्चा करेंगे। सबसे ऊंची बोली लगाने वाला जो रकम दिखाता है, अंत में जा कर वास्तव में उससे कई गुना ज्यादा खर्चा हो जाता है। टोक्यो ओलिंपिक की बात करें तो 2013 में उसने 2020 के आयोजन की बोली जीती थी। अब इन खेलों के आयोजन का वास्तविक खर्चा 30 अरब डालर बताया जा रहा है जबकि टोक्यो ने 2013 में 7.5 अरब डालर की बोली लगाई थी।

इन भारी भरकम खर्चे का बोझ स्वाभाविक रूप से जापानी करदाताओं के कन्धों पर पड़ा है क्योंकि जनता के पैसे से 55 फीसदी बजट की पूर्ति होगी। बाकी की रकम निजी रूप से की गयी फंडिंग, स्पॉन्सरशिप, टिकट बिक्री और आईओसी के सहयोग से जुटाई जायेगी। इस बार चूँकि दर्शकों को स्टेडियम में जाने की इजाजत नहीं होगी सो टिकट बिक्री से कुछ नहीं मिलने वाला है।

वैसे तो कोरोना के कारण बजट बढ़ गया है लेकिन महामारी आने से पहले ही लागत नियंत्रण से बाहर हो चली थी। 2017 में ही आईओसी ने टोक्यो से कहा था कि वह बजट घटाए। आईओसी को चिंता थी कि लागत बेतहाशा बढ़ने से भविष्य के आयोजनों पर बुरा असर होगा । ज्यादा खर्चे के डर से संभावित मेजबान पीछे हट जायेंगे।

टोक्यो ओलिंपिक में करीब 7.5 अरब डालर स्थाई या अस्थाई आयोजन स्थल के निर्माण पर खर्च हुए हैं। आयोजनों के लिए आठ नए स्थाई स्टेडियम बनाये गए हैं। खेलों का उदघाटन और समापन नेशनल स्टेडियम में होगा । इस स्टेडियम को बनाने में 1.4 अरब डालर की मोटी रकम खर्च की गयी है। 15 हजार दर्शक क्षमता वाला ओलिंपिक तैराकी प्रतियोगिता स्थल ५४२ मिलियन डालर के खर्च पर बना है।

2016 के ओलिंपिक ब्राज़ील के रिओ डी जेनेरो में हुए थे । उस समय आयोजकों ने कुल 13.2 अरब डालर खर्च किये थे , जिसमें से 2.06 अरब डालर खेल आयोजन स्थलों पर खर्च हुआ था। इनमें से अधिकाँश स्टेडियम खेलों के बाद बुरी हालत में पहुँच चुके हैं।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि खेल अर्थव्यवस्थाओं से मिले मजबूत साक्ष्य बताते हैं कि आयोजन स्थलों के निर्माण पर खर्च की गयी रकम कोई ऐसा निवेश नहीं है , जिससे बढ़िया रिटर्न मिल सके। इन भारी भरकम निर्माणों का खेलों के समापन के बाद कोई इस्तेमाल नहीं रह जाता है। इसकी वजह यह है कि ओलिंपिक में बहुत से विशिष्ट खेल इवेंट होते हैं , जिनमें आमतौर पर लोग भाग नहीं लेते हैं। सो, ऐसे इवेंट्स के लिए निर्माण पर ज्यादा खर्च करने का कोई औचित्य नहीं है।

एक्सपर्ट्स के अनुसार आयोजन स्थलों के निर्माण में कमी ला कर बजट कंट्रोल किया जा सकता है। मिसाल के तौर पर 2028 का आयोजन अमेरिका के लॉस एजेलेस में होगा और यह शहर कम से कम दो उन वेन्यू का इस्तेमाल करेगा जिनका निर्माण 1932 के ओलिंपिक के लिए हुआ था। जरूरत है कि जो इन्फ्रास्ट्रक्चर पहले से खड़ा है उसी का अधिकतम इस्तेमाल किया जाए।

2020 के ओलिंपिक की एक खासियत यह है कि यह इतिहास के सबसे ज्यादा स्पॉन्सरशिप वाले खेल होने वाले हैं। आयोजकों ने अपने ही देश से 3.3 अरब डालर की स्पॉन्सरशिप हासिल कर रखी है। दरअसल, कोरोना आने से पहले सब कुछ ठीकठाक चल रहा था। आयोजकों ने लोकल स्पॉन्सरशिप बेचने का रिकार्ड बना लिया था। इतनी बड़ी रकम लोकल स्पॉन्सरशिप के जरिये पहले कभी जुटाई नहीं जा सकी थी। इसके अलावा आईओसी के पास 14 टॉप स्पांसर पार्टनर हैं , जिनको ओलिंपिक पार्टनर कहा जाता है। इनमें कोकाकोला, टोयोटा, सैमसंग और अलीबाबा शामिल हैं। ये ग्लोबल स्पांसर मार्केटिंग अधिकारों के लिए धन देते हैं।

बहरहाल, एक्सपर्ट्स का कहना है कि खेलों, खिलाड़ियों, आम जनता और सरकारों के हित में है कि ओलिंपिक पर होने वाला खर्चा सीमित किया जाये क्योंकि अनावश्यक खर्चे से किसी भी पक्ष को कोई फायदा नहीं पहुँच रहा हैं।

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