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Yogesh Mishra Y Factor: एक अद्भुत स्वाधीनता सेनानी आचार्य कृपलानी, आजादी के अमृत महोत्सव पर याद आया ये बांका योद्धा

Yogesh Mishra Y Factor JB Kripalani: आचार्य कृपलानी की अंतिम, अत्यधिक यादगार घटना थी आपातकाल के समय। जॉर्जफर्नांडिस (Georgefernandes) और के विक्रम राव (K Vikram Rao) अभियुक्त नम्बर—2 बड़ौदा डाइनामाइट केस में फांसी की सजा की प्रतीक्षा में थे।

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Yogesh MishraWritten By Yogesh Mishra

Published on 25 Nov 2021 4:17 PM GMT

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Yogesh Mishra Y Factor: आजादी के अमृत महोत्सव (festival of freedom) पर एक बांका योद्धा याद आया। वह त्रासदी का पर्याय थे। शेक्सपियर (Shakespeare) के शोकान्तक नाटक के नायक के सदृश। उनने दो सदियां देखीं थीं- उन्नीसवीं और बीसवीं। पर अपनी जन्मशती (Birth Centenary) के ठीक सात साल पूर्व ही दुनिया से विदाई ले ली थी। वह पहले ब्रिटिश साम्राज्यवाद (British Imperialism) से लड़े। फिर जिन्ना से । अंत में इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) के आपातकालीनसत्ता के विरुद्ध लड़े। अलबेला थे। नाम था आचार्य जीवतराम भगवानदास कृपलानी (Acharya Jivatram Bhagwandas Kripalani)।

ठीक स्वतंत्रता के वर्ष (1947) (Years of Independence (1947)) में राष्ट्रीय कांग्रेस (National Congress) के वह अध्यक्ष थे। बापू के साथ विभाजन की पुरजोर खिलाफत की थी। अपनी जन्मभूमि (सिंध) गवां दीं। इसके लिये जवाहरलाल नेहरु (Jawaharlal Nehru) को उन्होंने कभी भी क्षमा नहीं किया। इस सिंधीभाषी सोशलिस्ट राष्ट्रनायक की बांग्लाभाषी कांग्रेसी पत्नी सुचेता कृपलानी (sucheta kripalani) उत्तर प्रदेश की चौथी तथा भारत की प्रथम महिला मुख्यमंत्री (first woman chief minister of india) रहीं। विवाह से पहले वह सुचेता मज़ूमदार थी। संविधान निर्मात्री सभा की प्रथम बैठक पर आचार्य कृपलानी ने वंदे मातरम् (Vande Mataram) गाया था।

आचार्य जे. बी. कृपलानी का जीवन परिचय (Acharya JB Kripalani Wikipedia)

उनकी शरारत जानीमानी थी। अपने कटाक्ष से सुहृद भले ही वे गवां दिये, पर सटीक तानामारने से कभी नहीं चूके। उनके शत्रु बढ़ते गये। लेकिन तंज भी अविस्मरणीय रहा। काशीविद्यापीठ (Kashividyapeeth) में एक सहककर्मी ने उनसे पूछा," कृपलानी जी, क्या देखा था सुचेता भाभी में?'' कृपलानी जी का जवाब था, "जरा मेरी नजर से उसे देखो तो।'' तब तक वे साठ लांघ चुके थे। गाल पोपले हो गये थे।

एक बार लखनऊ विश्वविद्यालय (Lucknow University) आचार्य कृपलानी आये। समाजवादी युवक सभा के साथियों ने एपी सेन हाल (AP Sen Hall) में सभा रखी। इतनी भारी भीड़ की अपेक्षा नहीं थी। छात्र हाल में घुसने में जुटे रहे। उथल—पुथल देखकर कृपलानी जी रुष्ट होकर बोले , "माइक्रोफोन कीआवाज बरामदे में भी सुनी जा सकती है। अगर शक्ल ही देखनी थी तो मुझसे भी किसी ज्यादाहसीन को बुलवा लेते।'' आचार्य कृपलानी हर कार्टूनिस्ट के लिये बड़े मनपसंद शक्ल थे। लम्बी, नुकीली नाक, झूलते कान, ठुड्डी से हड्डी झांकती और जुल्फे गरदन पर लहरातीं।

जब जनमत के दबाव में नेहरु को अपने रक्षामंत्री को बर्खास्त करना पड़ा

1962 में तीसरी लोकसभा (3rd Lok Sabha) के निर्वाचन के दौरान कृपलानी का मुकाबला नेहरु के प्रतिरक्षा मंत्री वीके कृष्ण मेनन (VK Krishna Menon) से था। यह बदनाम, बदगुमानी चीन—समर्थक तब उत्तर बम्बईकी लोकसभाई सीट से प्रत्याशी थे।खुद लापरवाही और बेहूदगी से लबरेज थे। उनकाअकड़पन जग जाहिर था। चुनावी अभियान की कांग्रेस—विरोधी फिजां में तय था कि आचार्यकृपलानी लोकसभा पहुंच जाते। पर तभी रक्षामंत्री ने सेना को गोवा मुक्ति हेतु रवाना करदिया। वोट के खातिर। बम्बई में गोवा के उत्प्रवासी हजारों थे। सब प्रमुदित हो गये। मेनन जीत गये। मगर आठ माह बाद अक्टूबर, 1962 चीन के हमले और सीमा पर लज्जास्पद पराजय के बाद जनमत के दबाव में नेहरु को अपने रक्षामंत्री को बर्खास्त करना पड़ा। तब महाराष्ट्र केमुख्यमंत्री यशवंत चव्हाण नये रक्षामंत्री बने। कृपलानी के समर्थक मीनू मसानी तथा अन्य सोशलिस्टों ने विजय उत्सव आयोजित किया। मसानी का प्रथम वाक्य था : ''दादा, आप उत्तरबम्बई का चुनाव जीत गये। मगर आठ माह बाद।'' मेनन तब संन्यास ले चुके थे।

कृपलानी जी (Acharya JB Kripalani) की यादगार घटना थी 1963 में। उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) से लोकसभा के तीन उपचुनावों पर देश की नजर गड़ी थी। डा. राममनोहर लोहिया (Dr. Ram Manohar Lohia) कन्नौज से जीते। दीनदयाल उपाध्याय (Deen Dayal Upadhyay) जौनपुर से हार गये। मगर कृपलानी का अमरोहा से उपचुनाव बड़ा जटिल और महत्वपूर्ण था।प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु तथा इंदिरा गांधी भी प्रयत्नशील थीं कि कृपलानी लोकसभा नपहुंचे। भारतीय गणराज्य के संसदीय निर्वाचन इतिहास में यह अनूठा अध्याय था। कांग्रेसप्रत्याशी का चयन शीर्ष नेताओं ने किया था। हाफिज साहब का।

1963 का अमरोहा लोकसभा उपचुनाव

तभी 27 अप्रैल, 1963 को एक बड़ा हादसा अमरोहा लोकसभा उपचुनाव के वक्त हुआ था। तब जवाहर लाल नेहरु प्रधानमंत्री थे। उनके संज्ञान में ही एक विधि-विरोधी, बल्किजनद्रोही हरकत हुई थी। अप्रत्याशित, अनपेक्षित तथा अत्यन्त अवांछित थी। सत्तारूढ़ कांग्रेस के प्रत्याशी का नामांकन पत्र समय सीमा बीत जाने के बाद स्वीकारा गया था। कलक्ट्रेट(जिला निर्वाचन अधिकारी कार्यालय) के दीवार पर लगी घड़ी की सुइयों को पीछे घुमा दियागया था। इस घटना की रपट दिल्ली के दैनिकों तथा मुम्बई की मीडिया, विशेषकर अंग्रेजी साप्ताहिक "करन्ट" के 28-30 अप्रैल, 1963 में प्रमुखता से छपी थी। शीर्षक के हिन्दी मायनेथे कि ''कांग्रेसी उम्मीदवार के अवैध नामांकन पत्र को घड़ी कि सुई घुमाकर वैध किया गया।''

Acharya JB Kripalani - दिल्ली में मेनन, बस्ती निवासी तेलमंत्री केशवदेव मालवीय (Oil Minister Keshavdev Malviya) और स्वयं नेहरू ने तय कियाकि सिंचाई मंत्री तथा राज्य सभा सदस्य हाफिज मुहम्मद इब्राहिम को लोकसभा के लिएअमरोहा से लडाया जाय। लगभग पचास प्रतिशत अमरोहा के मतदाता मुसलमान थे। अर्थातचोटी बनाम बोटी का नारा कारगर हुआ। अतः जिला कांग्रेस अध्यक्ष रामशरण का नामांकनवापस लेकर हाफिज मुहम्मद इब्राहिम का प्रस्ताव पेश हुआ। इसके लिए केन्द्रीय मंत्रीकेशवदेव दिल्ली से मोटरकार से मुरादाबाद कलक्ट्रेट पहुचे। यह सब अंतिम दिन 27 अप्रैल, 1963 को हुआ।

मगर दिल्ली से मुरादाबाद वे लोग शाम तक पहुचे। तब तक चार बज चुके थे। भीड़ जा चुकी थी। उस सन्नाटे में कलक्टर ने नामांकन को दर्ज कर लिया। चालाकी की कि घडी में दो बजा दिये और फोटो ले ली। विरोध हुआ पर उसे करने वाले विरोधी नेता केवल कुछ ही थे, बात बढ नही पायी। फिर भी कलेक्टर स्वतंत्र वीर सिंह जुनेजा (Collector Swatantra Veer Singh Juneja) ने बात दबा दी। मगर मतदान में हिन्दुओं ने जमकर वोट डाला। आचार्य कृपलानी जीत गये। हाफिज साहब का मंत्री पद और राज्य सभा की मेम्बरी चली गई। आचार्य कृपलानी ने, लोहिया के आग्रह पर, नेहरू सरकार में अविश्वास का सर्व प्रथम प्रस्ताव लोकसभा में रखा। तब भारतीयों की दैनिकऔसत आय तीन आने बनाम तेरह आने वाली मशहूर बहस चली थी।

आचार्य कृपलानी (Acharya JB Kripalani) की अंतिम, यादगार घटना

आचार्य कृपलानी (Acharya JB Kripalani) की अंतिम, अत्यधिक यादगार घटना थी आपातकाल के समय। जॉर्जफर्नांडिस (Georgefernandes) और के विक्रम राव (K Vikram Rao) अभियुक्त नम्बर—2 बड़ौदा डाइनामाइट केस में फांसी की सजा की प्रतीक्षा में थे। पच्चीस अभियुक्तों की रक्षा में एक समिति बनी थी। दादा कृपलानी अध्यक्ष बने। सीबी गुप्ता कोषाध्यक्ष। लोकनायक जयप्रकाश नारायण (Lok Nayak Jayaprakash Narayan) संरक्षक थे। वकील सभीप्रसिद्ध थे। राम जेडठमलानी, फाली नारीमन, सोली सोरबजी, अशोक देसाई, शांति भूषणइत्यादि।

दादा कृपलानी (Acharya JB Kripalani) की मांग पर मोरारजी काबीना ने हमारा मुकदमा वापस लेने कानिर्णय कराया। तब अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, एचएम पटेल, चौधरी चरणसिंह, जगजीवन राम, हेमवती नंदन बहुगुणा आदि की काबीना के समर्थन से भारत सरकार नेडायनामाइट केस निरस्त कर दिया। कृपलानी जी के नाते के विक्रम राव व जार्ज फ़र्नाडिस कोनया जीवन मिला।

Shashi kant gautam

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