BJP के जश्न के पीछे खड़े हैं बिहार के 3 बड़े सवाल! हल नहीं हुए तो बन सकते हैं 'महा विस्फोटक' मुद्दे
Challenges for BJP in Bihar: राजनीतिक सफलता के बीच 3 ऐसे बड़े सवाल खड़े हो गए हैं, जो आगामी वक़्त में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित हो सकते हैं।
Challenges for BJP in Bihar
Challenges for BJP in Bihar: बिहार और पश्चिम बंगाल में राजनीतिक समीकरण बदलने के बाद अब भारतीय जनता पार्टी (BJP) का आत्मविश्वास काफी बढ़ा हुआ स्पष्ट दिखाई दे रहा है। पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद भाजपा अब पूर्वी भारत में खुद को और मजबूत स्थिति में देख रही है। बिहार, असम, ओडिशा और बंगाल जैसे राज्यों में BJP या उसके सहयोगियों की सरकार होने से पार्टी के सामने अब बहाने की गुंजाइश कम हो गई है। लेकिन इसी राजनीतिक सफलता के बीच 3 ऐसे बड़े सवाल खड़े हो गए हैं, जो आगामी वक़्त में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित हो सकते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी भाषणों और वादों के माधयम से जनता के बीच जो उम्मीदें पैदा की गई थीं, अब उन्हें जमीन पर उतारने का दबाव बढ़ चुका है। यदि इन मुद्दों पर ठोस काम नहीं हुआ तो यही सवाल भविष्य में बीजेपी के खिलाफ बड़ा जनाक्रोश पैदा कर सकते हैं।
1. घुसपैठ का मुद्दा अब बनेगा सबसे बड़ी परीक्षा
BJP ने लंबे वक़्त से बिहार, बंगाल और असम में अवैध घुसपैठ को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया है। विशेषकर सीमावर्ती जिलों में बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों की मौजूदगी को लेकर लगातार सवाल खड़े किये जाते रहे हैं। बिहार के किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया जैसे जिलों को लेकर कई बार राजनीतिक बहस भी तेज हुई।
अब स्थिति बदल चुकी है। बिहार, असम, बंगाल और ओडिशा जैसे राज्यों में बीजेपी की मजबूत राजनीतिक पकड़ बन चुकी है। ऐसे में विपक्ष और जनता दोनों यह सवाल पूछ सकते हैं कि यदि केंद्र और राज्य दोनों जगह सरकार एक ही दल की है, तो फिर घुसपैठ रोकने की दिशा में ठोस कार्रवाई क्यों नहीं नज़र आ रही है।
भाजपा के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह घुसपैठियों की पहचान, सीमा सुरक्षा और प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर स्पष्ट रूप से आंकड़े और परिणाम जनता के सामने रखे। आगामी चुनावों में विपक्ष इसी मुद्दे को BJP के खिलाफ प्रयोग कर सकता है।
2. सीमांचल राज्य या यूनियन टेरिटरी की चर्चा पर बढ़ा दबाव
सीमांचल क्षेत्र को लेकर बीते कुछ सालों में अलग राज्य या यूनियन टेरिटरी बनाए जाने की चर्चाएं तेजी से होती रही हैं। बिहार, पश्चिम बंगाल और असम के सीमावर्ती जिलों को मिलाकर एक अलग प्रशासनिक इकाई बनाए जाने का मुद्दा समय-समय पर राजनीतिक बहस का बड़ा भाग बना।
किशनगंज, कटिहार, पूर्णिया, अररिया के साथ बंगाल के मालदा और मुर्शिदाबाद तथा असम के कुछ जिलों को जोड़कर सीमांचल राज्य की कल्पना पेश की गई थी। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा रही कि केंद्रीय गृह मंत्रालय स्तर पर इस विषय को लेकर कई बैठकों में विचार किया गया।
हालांकि, अभी तक इस दिशा में कोई आधिकारिक कदम सामने नहीं आया है। ऐसे में अब BJP के सामने यह चुनौती है कि वह इस मुद्दे पर अपनी स्थिति साफ़ करे। यदि यह सिर्फ राजनीतिक चर्चा थी, तो जनता को जवाब देना होगा और अगर योजना पर काम चल रहा है, तो उसका रोडमैप सामने लाना होगा।
3. पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत को कृषि हब बनाने का सपना
भाजपा सरकार ने पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत को देश का नया कृषि केंद्र बनाने की बात कही थी। सरकार का मानना रहा कि पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी में कृषि उत्पादन अपनी अधिकतम सीमा के करीब पहुंच चुका है। ऐसे में बिहार, बंगाल, ओडिशा और सेवन सिस्टर स्टेट्स को कृषि विकास के नए मॉडल के रूप में तैयार किया जा सकता है।
लेकिन अब तक यह योजना अपेक्षित गति नहीं पकड़ सकी। इसका एक बड़ा कारण केंद्र और राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारों को माना जाता रहा। अब जब इन राज्यों में BJP की मजबूत मौजूदगी बन चुकी है, तो जनता की उम्मीदें भी बढ़ गई हैं।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पूर्वी भारत में सिंचाई, भंडारण और आधुनिक खेती पर बड़े स्तर पर काम किया जाए तो देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूती मिल सकती है। ऐसे में भाजपा सरकार के सामने अब यह साबित करने की चुनौती होगी कि वह चुनावी वादों को जमीन पर उतारने में कितनी सफल होती है।
यदि राजनीतिक तौर पर देखें तो भाजपा इस वक़्त पूर्वी भारत में अपने सबसे मजबूत दौर में नज़र आ रही है, लेकिन यही मजबूती अब उसके लिए सबसे बड़ी परीक्षा भी बन सकती है। जनता आगामी वक़्त में केवल नारों और वादों से संतुष्ट नहीं होगी, बल्कि ठोस परिणाम भी देखना चाहेगी।