उपेंद्र कुशवाहा के साथ हो गया ‘खेला’! बेटे को मंत्री बनाने का टूटा सपना, बीजेपी ने बिगाड़ा पूरा गेम
Upendra Kushwaha: बिहार की राजनीति में एक बार फिर दिलचस्प मोड़ देखने को मिल रहा है, जहां राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा की रणनीति अब उन्हीं के लिए चुनौती बनती नजर आ रही है।
Upendra Kushwaha
Upendra Kushwaha: बिहार की राजनीति में एक बार फिर दिलचस्प मोड़ देखने को मिल रहा है, जहां राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा की रणनीति अब उन्हीं के लिए चुनौती बनती नजर आ रही है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि क्या कुशवाहा परिवारवाद की राजनीति में उलझ गए हैं या फिर उनकी अपनी चालें ही उन पर भारी पड़ रही हैं।
दरअसल, पूर्व स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय के सिवान विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उन्हें एमएलसी पद से इस्तीफा देना पड़ा था। इसके बाद खाली हुई इस सीट को लेकर कई तरह की अटकलें लगने लगीं। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की थी कि इस सीट पर उपेंद्र कुशवाहा अपने बेटे दीपक प्रकाश को भेजने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि उनका मंत्री पद सुरक्षित रखा जा सके। लेकिन यह संभावना तब खत्म हो गई जब भाजपा नेतृत्व ने इस सीट के लिए वरिष्ठ नेता अरविंद शर्मा को उम्मीदवार बना दिया।
यह घटनाक्रम कुशवाहा की राजनीतिक रणनीति पर सवाल खड़े कर रहा है। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने पहले 10 से 15 सीटों की मांग की थी। बाद में बातचीत के बाद उन्हें पांच सीटें मिलीं। हालांकि, जब अन्य सहयोगी दलों को ज्यादा सीटें मिलने लगीं तो उन्होंने अपनी नाराजगी जाहिर की। अंततः उन्हें छह सीटों पर चुनाव लड़ने का मौका मिला। लेकिन चुनाव परिणाम उनके पक्ष में नहीं रहे। RLM ने जिन छह सीटों पर चुनाव लड़ा, उनमें से अधिकांश पर हार का सामना करना पड़ा। खासकर पारू जैसी सीट, जो भाजपा के कोटे से दी गई थी और जीत की संभावना मजबूत मानी जा रही थी, वहां भी पार्टी को हार मिली। इससे भाजपा नेतृत्व में भी निराशा देखी गई।
इसी बीच, मंत्रिमंडल गठन के दौरान उपेंद्र कुशवाहा ने अपने विधायकों को मंत्री न बनाकर अपने बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बना दिया। इस फैसले को लेकर पार्टी के अंदर ही असंतोष उभर आया और कुछ विधायकों ने इसे परिवारवाद का उदाहरण बताते हुए विरोध भी किया। हालांकि कुशवाहा की रणनीति यह थी कि बाद में एमएलसी बनाकर बेटे का मंत्री पद बचाया जा सके। लेकिन भाजपा द्वारा अरविंद शर्मा को एमएलसी उम्मीदवार बनाए जाने के बाद यह योजना लगभग विफल होती दिख रही है। अब कुशवाहा के सामने सीमित विकल्प बचे हैं। राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार, वह अपनी पार्टी का भाजपा में विलय कराकर बेटे के लिए रास्ता निकालने की कोशिश कर सकते हैं या फिर पुराने सहयोगी नीतीश कुमार से मदद की उम्मीद कर सकते हैं।
दीपक प्रकाश की स्थिति भी दिलचस्प है। उन्होंने नवंबर 2025 में मंत्री पद की शपथ ली थी, जबकि वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। नियम के अनुसार, उन्हें छह महीने के भीतर किसी सदन का सदस्य बनना जरूरी था। हालांकि राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव के चलते यह बाध्यता फिलहाल टल गई है, लेकिन उनका राजनीतिक भविष्य अभी भी अनिश्चित बना हुआ है। इस पूरे घटनाक्रम ने बिहार की राजनीति में परिवारवाद बनाम रणनीति की बहस को फिर से हवा दे दी है। अब देखना यह होगा कि उपेंद्र कुशवाहा अपनी सियासी चालों को किस तरह संभालते हैं और अपने बेटे के लिए नया रास्ता निकाल पाते हैं या नहीं।