Kuno Cheetah Project: कूनो में अचानक खुले जंगल में छोड़ी गईं 2 मादा चीते, क्या मौतों के बाद बदली रणनीति?

Kuno National Park: आखिर क्यों खुले जंगल में छोड़ी गईं 2 मादा चीते? जानिए क्या बदली गई नई रणनीति

Update:2026-05-11 17:32 IST

Kuno National Park Cheetah Project India 

Kuno National Park Cheetah Project: मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में 11 मई का दिन सिर्फ वन्यजीव प्रेमियों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक ऐतिहासिक पल बन गया। खुले आसमान के नीचे जब दो मादा चीते बाड़े से आजादी पाकर घने जंगल की ओर दौड़ पड़े। वह दृश्य सिर्फ एक वन्यजीव गतिविधि नहीं था, बल्कि भारत में चीतों की वापसी की उम्मीदों का जीवंत प्रतीक बन गया। वर्षों पहले भारत से विलुप्त हो चुके चीते अब फिर से भारतीय जंगलों में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं और इस मिशन का सबसे बड़ा केंद्र बना है मध्यप्रदेश का कूनो नेशनल पार्क। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने स्वयं कूनो पहुंचकर इन दोनों मादा चीतों को खुले जंगल में छोड़ा। इस दौरान उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश अब चीता स्टेट के रूप में नई पहचान बना रहा है और प्रोजेक्ट चीता देश की जैव विविधता को मजबूत करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम साबित हो रहा है।

आखिर इन मादा चीतों को खुले जंगल में क्यों छोड़ा गया?

कूनो में लाए गए सभी चीतों को सीधे जंगल में नहीं छोड़ा जाता। पहले उन्हें क्वारंटीन में रखा जाता है, ताकि उनकी सेहत की निगरानी की जा सके और यह सुनिश्चित हो कि वे किसी संक्रमण या बीमारी से प्रभावित नहीं हैं। इसके बाद उन्हें छोटे बाड़ों में रखा जाता है, जहां वे स्थानीय जलवायु, भोजन और वातावरण के अनुरूप खुद को ढालते हैं।

जब वन विभाग और वाइल्डलाइफ विशेषज्ञों को यह भरोसा हो जाता है कि चीते अब स्वतंत्र रूप से शिकार कर सकते हैं और जंगल में जीवित रह सकते हैं, तब उन्हें खुले जंगल में छोड़ा जाता है। यही प्रक्रिया इन दोनों मादा चीतों के साथ भी अपनाई गई।

विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी पुनर्वास परियोजना की असली सफलता तब मानी जाती है, जब जानवर इंसानी निगरानी से बाहर प्राकृतिक वातावरण में सामान्य जीवन जीने लगें। खुले जंगल में छोड़ने का मकसद यही है कि चीते प्राकृतिक रूप से अपना इलाका तय करें, शिकार करें और आने वाले समय में प्रजनन कर अपनी संख्या बढ़ाएं।

क्या हाल ही में हुई चीते और शावकों की मौत से जुड़ा है यह फैसला?

पिछले कुछ समय में कूनो में कई चीतों और शावकों की मौत ने चिंता बढ़ा दी थी। गर्मी, संक्रमण, आपसी संघर्ष, रेडियो कॉलर से जुड़ी समस्याएं और कमजोर प्रतिरोधक क्षमता जैसे कई कारण इन मौतों के पीछे बताए गए। खासकर मादा चीता ज्वाला के कुछ शावकों की मौत ने प्रोजेक्ट चीता पर सवाल भी खड़े किए थे। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना अभी शुरुआती चरण में है और किसी भी बड़े वन्यजीव पुनर्स्थापन कार्यक्रम में शुरुआती चुनौतियां हैं सामान्य होती हैं। अफ्रीकी देशों में भी चीता संरक्षण के दौरान ऐसी परिस्थितियां सामने आती रही हैं।

वन्यजीव विशेषज्ञों का एक वर्ग यह भी मानता है कि लगातार बाड़ों में रखने से चीतों में तनाव बढ़ सकता है। सीमित क्षेत्र में रहने के कारण वे प्राकृतिक व्यवहार पूरी तरह नहीं अपना पाते। खुले जंगल में छोड़ने से वे अपने हिसाब से क्षेत्र चुनते हैं, लंबी दूरी तय करते हैं और प्राकृतिक जीवनशैली में जल्दी ढलते हैं। इसलिए हालिया मौतों के बाद अब रणनीति का फोकस “प्राकृतिक अनुकूलन” को तेज़ करने पर भी माना जा रहा है। यानी यह फैसला केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सोच और लंबे समय की रणनीति का हिस्सा भी है।

बोत्सवाना से आए चीते क्यों माने जा रहे हैं खास?

इसी साल फरवरी के अंत में बोत्सवाना से 9 नए चीते भारत लाए गए थे, जिनमें 6 मादा और 3 नर शामिल थे। विशेषज्ञों का कहना है कि बोत्सवाना के चीतों में अधिक जेनेटिक विविधता है। इसका सीधा फायदा यह होगा कि भारत में चीतों की आबादी लंबे समय तक स्वस्थ बनी रह सकेगी।

अगर किसी प्रजाति में जेनेटिक विविधता कम हो जाए, तो बीमारियों और प्रजनन संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए अलग-अलग देशों से चीते लाना प्रोजेक्ट चीता की बड़ी रणनीति का हिस्सा है।

कूनो क्यों बना चीतों का नया घर?

श्योपुर जिले में स्थितकुनो नेशनल पार्क (Kuno National Park) को लंबे अध्ययन के बाद चीतों के लिए चुना गया था। यहां विशाल घास के मैदान, पर्याप्त शिकार, कम मानव हस्तक्षेप और बेहतर पारिस्थितिकी तंत्र मौजूद है। कूनो का क्षेत्रफल और वन संरचना चीतों की जीवनशैली के अनुकूल मानी जाती है। दिलचस्प बात यह है कि चीते बेहद तेज़ दौड़ने वाले और बड़े इलाके में घूमने वाले जानवर होते हैं। यही कारण है कि अब ये कूनो से निकलकर राजस्थान और मध्यप्रदेश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचने लगे हैं। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी कहा कि कई बार पता ही नहीं चलता कि चीता कब दौड़ते-दौड़ते राजस्थान पहुंच गया।

भारत में कब शुरू हुआ प्रोजेक्ट चीता?

भारत में एशियाई चीते 1952 में आधिकारिक रूप से विलुप्त घोषित कर दिए गए थे। इसके बाद दशकों तक देश में चीते नहीं रहे। फिर वर्ष 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नामीबिया से आए 8 चीतों को कूनो नेशनल पार्क में छोड़कर प्रोजेक्ट चीता की शुरुआत की। इसके बाद वर्ष 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीते लाए गए। अब बोत्सवाना से आए चीतों को जोड़कर भारत में कुल संख्या 57 तक पहुंच गई है। इनमें 54 चीते कूनो में और 3 गांधी सागर अभ्यारण्य में मौजूद हैं।

क्या भारत फिर से चीतों की स्थायी आबादी बना पाएगा?

यही इस पूरे प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा सवाल है। विशेषज्ञों के मुताबिक किसी भी वन्यजीव प्रजाति की स्थायी आबादी बनाने के लिए सिर्फ जानवरों को लाना काफी नहीं होता। उन्हें सुरक्षित वातावरण, पर्याप्त भोजन, कम मानव संघर्ष और लंबी अवधि की वैज्ञानिक निगरानी की जरूरत होती है।

कूनो में अब तक कई सफलताएं भी मिली हैं। यहां कई मादा चीतों ने शावकों को जन्म दिया, जो इस बात का संकेत है कि चीते भारतीय वातावरण को स्वीकार कर रहे हैं। हालांकि चुनौतियां अब भी मौजूद हैं।

सबसे बड़ी चुनौती है इंसान और वन्यजीव के बीच संतुलन बनाए रखना। जैसे-जैसे चीते बड़े क्षेत्र में घूमेंगे, वैसे-वैसे गांवों और मानव बस्तियों के करीब पहुंचने की आशंका भी बढ़ेगी। ऐसे में स्थानीय लोगों का सहयोग बेहद जरूरी होगा।

स्थानीय लोगों की भूमिका क्यों अहम?

प्रोजेक्ट चीता की सफलता केवल वन विभाग पर निर्भर नहीं है। कूनो और आसपास के गांवों के लोगों ने भी इस परियोजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कई गांवों का पुनर्वास किया गया, लोगों ने वन्यजीव संरक्षण के लिए सहयोग दिया और अब वे खुद चीतों को अपने क्षेत्र की पहचान मानने लगे हैं।

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी कहा कि चंबल और श्योपुर क्षेत्र के लोगों ने चीतों को परिवार की तरह अपनाया है। यही वजह है कि यह परियोजना केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि जनभागीदारी का उदाहरण बनती जा रही है।

गांधी सागर और नौरादेही में भी बसेंगे चीते

एक्सपर्ट्स अब केवल कूनो तक सीमित नहीं रहना चाहते। भविष्य में गांधी सागर और नौरादेही अभ्यारण्य में भी चीतों को बसाने की तैयारी चल रही है। इसका उद्देश्य एक ही स्थान पर दबाव कम करना और अलग-अलग क्षेत्रों में चीतों की सुरक्षित आबादी विकसित करना है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह योजना सफल होती है, तो आने वाले वर्षों में मध्यप्रदेश वास्तव में भारत का चीता लैंडस्केप बन सकता है।

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