Bollywood Old Movie Sholay: कभी नहीं सोचा था भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा तूफ़ान बन जाएगी ‘शोले’
Sholay Full Movie Story: ‘शोले’ को केवल एक सफल मसाला फ़िल्म के रूप में देखना उसके वास्तविक महत्व को कम कर देता है।
Bollywood Old Movie Sholay Behind Scenes Box Office Collection
Bollywood Old Movie Sholay: भारतीय सिनेमा के इतिहास को यदि दो हिस्सों में बाँटा जाए — ‘शोले’ से पहले और ‘शोले’ के बाद — तो शायद यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि 15 अगस्त 1975 को रिलीज़ हुई यह फ़िल्म केवल एक सुपरहिट फ़िल्म नहीं थी। यह एक सांस्कृतिक विस्फोट थी। इसने हिंदी सिनेमा की भाषा बदल दी। संवाद बदल दिये। खलनायक की परिभाषा बदल दी। दोस्ती का अर्थ बदल दिया। एक्शन फ़िल्मों का स्तर बदल दिया। यहाँ तक कि भारतीय दर्शकों की सिनेमाई अपेक्षाएँ भी बदल दीं।
‘शोले’ को केवल एक सफल मसाला फ़िल्म के रूप में देखना उसके वास्तविक महत्व को कम कर देता है। यह फ़िल्म दरअसल भारतीय लोकप्रिय संस्कृति का ऐसा मोड़ थी जहाँ हिंदी सिनेमा पहली बार इतने विशाल पैमाने पर ‘इंडियन वेस्टर्न’ शैली में दिखाई दिया। रमेश सिप्पी पर हॉलीवुड की वेस्टर्न फिल्मों का प्रभाव था। विशेष रूप से चौड़े फ्रेम, लंबी चट्टानी लोकेशन, घोड़ों की दौड़ और बंदूकधारियों की टकराहट में यह प्रभाव साफ दिखाई देता है। लेकिन ‘शोले’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उसने विदेशी सिनेमाई शैली को पूरी तरह भारतीय भावनाओं में ढाल दिया। इसलिए दर्शकों को यह फ़िल्म अपनी लगी।
आज ‘शोले’ को लेकर जो दीवानगी दिखाई देती है, उसे देखकर यह कल्पना करना कठिन है कि रिलीज़ के शुरुआती दिनों में फ़िल्म को अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिली थी। कुछ समीक्षकों ने इसे लंबी बताया। कुछ ने हिंसा अधिक होने की बात कही। लेकिन धीरे-धीरे जो हुआ, वह भारतीय सिनेमा के इतिहास में शायद दोबारा कभी नहीं हुआ। फ़िल्म लोगों की ज़िंदगी में घुस गई। उसके संवाद रोज़मर्रा की भाषा बन गये। उसके किरदार मिथक बन गये। और ‘गब्बर सिंह’ भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा खलनायक बन गया।
लेकिन ‘शोले’ की निर्माण यात्रा उतनी ही कठिन और नाटकीय थी जितनी उसकी कहानी। इस फ़िल्म के पीछे तकनीकी संघर्ष था। आर्थिक जोखिम था। महीनों तक चलने वाली कठिन शूटिंग थी। कलाकारों की चोटें थीं। मौसम की समस्याएँ थीं। और निर्देशक रमेश सिप्पी का वह जुनून था जिसने इस फ़िल्म को साधारण मसाला फ़िल्म बनने से रोक दिया।
‘शोले’ की कहानी लेखक जोड़ी सलीम-जावेद ने लिखी थी। उस समय तक दोनों हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बना चुके थे। वे ऐसी कहानी लिखना चाहते थे जिसमें वेस्टर्न फिल्मों जैसा स्केल हो, भारतीय गाँव की भावनाएँ हों और याद रह जाने वाले किरदार हों। कहा जाता है कि कहानी का प्रारंभिक विचार उन्हें डकैतों की खबरें पढ़ते समय आया। 1960 और 70 के दशक में चंबल क्षेत्र डकैतों के कारण लगातार चर्चा में रहता था। वहीं से एक निर्दयी डकैत और बदले की कहानी का बीज पैदा हुआ।
जब सलीम-जावेद ने कहानी रमेश सिप्पी को सुनाई तो वे तुरंत समझ गये कि यह साधारण फ़िल्म नहीं है। लेकिन समस्या यह थी कि फ़िल्म का पैमाना बेहद बड़ा था। विशाल एक्शन दृश्य। लंबा शूटिंग शेड्यूल। भारी स्टारकास्ट। तकनीकी प्रयोग। उस समय हिंदी सिनेमा में इतनी बड़ी योजना पर बहुत कम निर्माता पैसा लगाने को तैयार होते थे।
निर्माता जी. पी. सिप्पी ने जोखिम उठाया। विभिन्न स्रोतों के अनुसार फ़िल्म का बजट लगभग 2.5 करोड़ से 3 करोड़ रुपये तक पहुँचा, जो 1970 के दशक के हिसाब से असाधारण रूप से बड़ा था। उस समय अधिकांश बड़ी हिंदी फ़िल्में 40 से 60 लाख रुपये में बन जाया करती थीं। यही कारण था कि उद्योग में लोग ‘शोले’ को लेकर हैरान भी थे और संशय में भी।
फ़िल्म की सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती थी उसकी लोकेशन। निर्देशक रमेश सिप्पी ऐसा गाँव चाहते थे जो वास्तविक लगे लेकिन सिनेमाई रूप से भी भव्य दिखाई दे। लंबी खोज के बाद बेंगलुरु के पास रामनगरम इलाके का चयन किया गया। वहाँ की चट्टानी पहाड़ियाँ और सूखा परिदृश्य कहानी के लिए बिल्कुल उपयुक्त लगा।
फ़िल्म की सिनेमैटोग्राफी पर भी असाधारण मेहनत हुई थी। ‘शोले’ हिंदी सिनेमा की शुरुआती 70 एमएम फिल्मों में गिनी जाती है। उस समय इतनी बड़ी तकनीकी प्रस्तुति अत्यंत महँगी और जोखिम भरी मानी जाती थी। चौड़े फ्रेम में एक्शन और भीड़ वाले दृश्य शूट करना आसान नहीं था। कैमरे भारी थे। रोशनी की जरूरत अधिक थी। लेकिन रमेश सिप्पी चाहते थे कि दर्शक फ़िल्म को केवल देखें नहीं, बल्कि उसके भीतर प्रवेश कर जाएँ। यही कारण है कि ‘रामगढ़’ का परिदृश्य आज भी दर्शकों की स्मृति में जीवित महसूस होता है।
लेकिन असली समस्या तब शुरू हुई जब पूरी यूनिट को महीनों तक वहाँ रहना पड़ा। उस समय वहाँ आधुनिक सुविधाएँ लगभग नहीं थीं। गर्मी बेहद तेज़ थी। धूल लगातार उड़ती रहती थी। कई बार तापमान इतना बढ़ जाता था कि कलाकारों और तकनीशियनों को घंटों शूटिंग रोकनी पड़ती थी। भारी कैमरे और उपकरण पहाड़ियों पर ले जाना अपने आप में कठिन काम था।
रामगढ़ गाँव का पूरा सेट वहीं तैयार किया गया। घर। मस्जिद। ठाकुर का मकान। पानी की टंकी। सब कुछ वास्तविक रूप से बनाया गया था। सेट बनाने में महीनों लगे और उस दौर के हिसाब से भारी पैसा खर्च हुआ। रमेश सिप्पी चाहते थे कि दर्शकों को लगे यह सचमुच जीवित गाँव है, कोई स्टूडियो सेट नहीं।
फ़िल्म की शूटिंग लगभग ढाई वर्षों तक चली। कई कलाकारों ने बाद में कहा कि यह फ़िल्म बनाना शारीरिक रूप से बेहद थकाऊ अनुभव था। अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र को लगातार कठिन एक्शन दृश्य करने पड़ते थे। घुड़सवारी, दौड़, धूल और गर्मी ने पूरी यूनिट को थका दिया था।
धर्मेंद्र के बारे में एक मशहूर किस्सा आज भी सुनाया जाता है। ‘बसंती’ यानी हेमा मालिनी के साथ पानी की टंकी वाले दृश्य के दौरान धर्मेंद्र जानबूझकर रीटेक करवाते थे ताकि शूटिंग लंबी चले और उन्हें हेमा मालिनी के साथ अधिक समय मिल सके। यूनिट के कई सदस्य बाद में हँसते हुए यह घटना याद करते थे।
‘बसंती’ का चरित्र भी सामान्य फ़िल्मी नायिका जैसा नहीं था। हेमा मालिनी का तेज़ बोलना, लगातार ऊर्जा से भरा रहना और डर के बीच भी जीवंत बने रहना उस समय के लिए बिल्कुल अलग शैली थी। दिलचस्प बात यह है कि रमेश सिप्पी चाहते थे कि बसंती दर्शकों को वास्तविक गाँव की लड़की लगे, केवल ग्लैमरस नायिका नहीं। इसलिए उसके संवादों में लगातार बोलने की आदत और सहज हास्य रखा गया। यही कारण है कि ‘बसंती’ बाद में सांस्कृतिक प्रतीक बन गई।
लेकिन फ़िल्म के दौरान केवल हल्के-फुल्के पल ही नहीं थे। गंभीर हादसे भी हुए।
सबसे बड़ा हादसा अमिताभ बच्चन के साथ हुआ। एक एक्शन दृश्य के दौरान उन्हें चोट लगी और कुछ समय के लिए शूटिंग रोकनी पड़ी। हालांकि यह चोट बाद की फ़िल्म ‘कुली’ जितनी गंभीर नहीं थी, लेकिन ‘शोले’ के दौरान भी लगातार कठिन स्टंट कलाकारों पर भारी पड़ रहे थे। उस समय सुरक्षा व्यवस्थाएँ आज जैसी विकसित नहीं थीं। कई स्टंट वास्तविक रूप से किये जाते थे। विस्फोट सचमुच होते थे। घोड़े सचमुच दौड़ते थे। यही कारण है कि शूटिंग कई बार खतरनाक हो जाती थी।
फ़िल्म के एक्शन दृश्यों में उस समय उपलब्ध तकनीक की सीमाएँ साफ थीं। विस्फोट वास्तविक रूप से किये जाते थे। कई बार कलाकारों को खतरनाक दूरी तक जाकर शूट करना पड़ता था। आज की तरह डिजिटल सुरक्षा या कंप्यूटर ग्राफिक्स नहीं थे। यही कारण है कि ‘शोले’ के कई दृश्य वास्तविक और खुरदरे महसूस होते हैं। उनमें कृत्रिमता कम दिखाई देती है।
फ़िल्म का सबसे बड़ा कास्टिंग चमत्कार था ‘गब्बर सिंह’। शुरुआत में यह भूमिका अभिनेता डैनी डेन्जोंगपा को दी गई थी। लेकिन वे दूसरी फ़िल्म की शूटिंग में व्यस्त हो गये। तब सलीम-जावेद ने अमजद खान का नाम सुझाया। समस्या यह थी कि अमजद खान उस समय बड़े स्टार नहीं थे। उनकी आवाज़ को लेकर भी संदेह था। कुछ लोगों को लगता था कि उनकी आवाज़ बहुत पतली है। लेकिन जब उन्होंने पहला संवाद बोला — “कितने आदमी थे?” — पूरी यूनिट को एहसास हो गया कि हिंदी सिनेमा को नया खलनायक मिल चुका है।
अमजद खान को लेकर शुरुआती संदेह इतने अधिक थे कि कुछ लोगों ने शूटिंग के शुरुआती दिनों में सुझाव दिया था कि भूमिका बदल दी जाए। लेकिन सलीम-जावेद अमजद खान के पक्ष में मजबूती से खड़े रहे। उन्होंने महसूस कर लिया था कि गब्बर का डर उसके चेहरे से कम और उसकी आवाज़ तथा ठहराव से पैदा होगा। बाद में यही निर्णय हिंदी सिनेमा के इतिहास का सबसे बड़ा कास्टिंग चमत्कार साबित हुआ।
दिलचस्प बात यह है कि अमजद खान को अपने संवाद बोलने का अंदाज़ विकसित करने में काफी मेहनत करनी पड़ी। उन्होंने चंबल के डकैतों पर आधारित सामग्री पढ़ी। उनके बोलने के तरीके और शरीर की भाषा पर काम किया। परिणाम इतिहास बन गया।
‘कितने आदमी थे?’ वाला दृश्य फिल्माने में कई दिन लगे थे। रमेश सिप्पी चाहते थे कि गब्बर पहली बार स्क्रीन पर आते ही दर्शकों के भीतर भय पैदा कर दे। इसलिए कैमरे की लो एंगल पोज़िशन, धूल, चट्टानें और अमजद खान की धीमी आवाज़—सब कुछ बहुत सावधानी से तैयार किया गया। परिणाम यह हुआ कि गब्बर का पहला दृश्य ही भारतीय सिनेमा का ऐतिहासिक क्षण बन गया।