Bengal Politics: सांसद-विधायक छोड़ रहे साथ, पार्टी में दो फाड़... फिर भी ममता के साथ क्यों खड़ा है TMC कार्यकर्ता?

Bengal Politics: पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस गहरे संगठनात्मक संकट से जूझ रही है। नेताओं के इस्तीफे, गिरफ्तारी और गुटबाजी के बीच जमीनी कार्यकर्ता खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। कई जिलों में स्थानीय नेतृत्व गायब है, फोन तक नहीं उठाए जा रहे, जबकि कार्यकर्ता भविष्य को लेकर असमंजस में हैं। इसके बावजूद बड़ी संख्या में समर्थक अब भी ममता बनर्जी के नेतृत्व पर भरोसा बनाए हुए हैं।

Update:2026-06-25 17:05 IST

Mamata Banerjee

Bengal Politics: पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस इस समय अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। पार्टी के अंदरूनी हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं और बड़े चेहरों का पाला बदलना या इस्तीफा देना अब आम बात हो गई है। सांसद, विधायक और पार्षद तक पार्टी का साथ छोड़ रहे हैं। कई नेता तो गिरफ्तारी के डर से या तो फरार हो चुके हैं या फिर सलाखों के पीछे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि उन आम कार्यकर्ताओं का क्या हो रहा है जिन्होंने जमीन पर पार्टी को खड़ा किया था।

जो हकीकत सामने आई है, वह बेहद चौंकाने वाली है। जमीनी स्तर के कार्यकर्ता पूरी तरह से दिशाहीन हो चुके हैं। उन्हें समझ ही नहीं आ रहा कि आगे का रास्ता क्या है, और विडंबना यह है कि संकट की इस घड़ी में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने उनके फोन तक उठाने बंद कर दिए हैं।

नेतृत्व का भारी संकट और नादिया जिले की हकीकत

पार्टी इस समय एक गहरे नेतृत्व संकट का सामना कर रही है। अलग-अलग जिलों की पड़ताल करने पर पता चलता है कि जमीनी कार्यकर्ताओं की स्थिति बेहद दयनीय है। नादिया जिले की बात करें, तो यहां के एक पुराने और कद्दावर नेता ने स्पष्ट किया कि इलाके का पूरा संगठनात्मक ढांचा केवल चुनाव परिणामों के भरोसे छोड़ दिया गया था। उन्होंने बताया कि पूरे जिले में जानबूझकर डर और खौफ का माहौल पैदा किया गया है।

उनके मुताबिक, पूर्व राज्य मंत्री मानस भुइयां और प्रताप नायक नाम के एक शख्स को कैमक स्ट्रीट स्थित कार्यालय से पैसे निकालने का जिम्मा दिया गया था। दिलचस्प बात यह है कि प्रताप नायक की मां अभिषेक बनर्जी के माता-पिता के घर खाना बनाती थीं, जिस वजह से उन्हें यह अहम जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इसके अलावा, चकड़ा इलाके के जाने-माने नेता शंकर सिंह और जिशु सिंह भी पूरी तरह से गायब हैं। जिले में संगठन को मजबूत करने वाला कोई नहीं बचा है और आम कार्यकर्ता पूरी तरह से भ्रमित हैं।

उत्तर 24 परगना: पार्टी की पहचान सिर्फ 'ममता बनर्जी'

उत्तर 24 परगना जिले की तस्वीर थोड़ी अलग है, जहां कुछ नेता अब भी उम्मीद बांधे हुए हैं। टीएमसी के पूर्व अध्यक्ष निर्मल घोष का दावा है कि वे हर कदम पर अपने कार्यकर्ताओं के साथ खड़े हैं। उनका मुख्य मकसद पार्टी के उन वफादार और ईमानदार कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाना है जो कहीं पीछे छूट गए थे।

जब उनसे जिले में पार्टी के भीतर चल रही गुटबाजी और दरार के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने इसे सिरे से खारिज कर दिया। घोष का स्पष्ट कहना था कि तृणमूल कांग्रेस का सीधा सा मतलब केवल ममता बनर्जी है। उनके अलावा कोई और नहीं है, और जमीन पर हर एक कार्यकर्ता सिर्फ उन्हीं का समर्थक है।

पूर्वी बर्दवान में दबाव का सामना करते ब्लॉक स्तरीय नेता

पूर्वी बर्दवान में भी हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं। टीएमसी के पूर्व जिलाध्यक्ष सद्दाम हुसैन का मानना है कि मौजूदा संकट का सबसे ज्यादा असर पार्टी के बड़े और मुख्य पदाधिकारियों पर पड़ा है, जो फिलहाल इधर-उधर भाग रहे हैं। हालांकि, उनका भी यही कहना है कि आम कार्यकर्ता आज भी ममता बनर्जी से मजबूती से जुड़े हुए हैं।

सद्दाम के मुताबिक, ब्लॉक स्तर तक के नेताओं पर भारी प्रशासनिक दबाव बनाया जा रहा है। प्रशासन का सहारा लेकर कुछ इलाकों में टीएमसी के संगठन को सुनियोजित तरीके से कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने ऋतब्रत जैसे नेताओं से किसी भी तरह की पहचान होने से इनकार किया और कहा कि कार्यकर्ता भी उन्हें नहीं जानते। हालांकि, ममता के करीबी नेताओं से संपर्क जरूर बना हुआ है और पार्टी कार्यकर्ता आज भी उनके साथ खड़े हैं।

गायब होते नेता और खौफ के साए में कार्यकर्ता

उत्तर बंगाल के कूच बिहार जिले में तो स्थिति और भी ज्यादा चिंताजनक है। यहां बड़े नेताओं ने कार्यकर्ताओं की पुकार सुननी ही छोड़ दी है। टीएमसी के पूर्व युवा नेता राहुल रॉय बताते हैं कि ग्राम पंचायत और ब्लॉक स्तर के नेताओं ने कार्यकर्ताओं से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया है। यहां तक कि वे अपने खुद के परिवारों के भी संपर्क में नहीं हैं। ज्यादातर नेता जिले से बाहर जा चुके हैं और खुद के लिए सुरक्षित ठिकाना तलाश रहे हैं, ऐसे में वे कार्यकर्ताओं को क्या ही आसरा देंगे। जिला और ब्लॉक स्तर पर कई स्थानीय नेताओं की गिरफ्तारी के बाद से आम कार्यकर्ता पूरी तरह से खौफ में हैं।

कमोबेश यही हाल दक्षिण 24 परगना का भी है। वहां के एक स्थानीय नेता ने अपनी हताशा जाहिर करते हुए बताया कि जिले की सभी कमेटियां भंग हो चुकी हैं और किसी को यह तक नहीं पता कि पार्टी में किसकी क्या हैसियत है। कार्यकर्ता सबसे ज्यादा खतरे में हैं और वे अपनी जान बचाने के लिए खुद ही परिस्थितियों से तालमेल बिठा रहे हैं। पहले जो नेता आगे बढ़कर नेतृत्व करते थे, वे अब फोन भी नहीं उठाते।

ब्लॉक स्तर के नेता तो जैसे गायब ही हो गए हैं। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में इतनी भयंकर गुटबाजी आ गई है कि निचले स्तर के लोगों को समझ नहीं आ रहा कि इसे कैसे संभाला जाए। फिर भी, इन सबके बीच एक बात जो स्पष्ट नजर आती है, वह यह है कि निचले स्तर का कार्यकर्ता आज भी 'दीदी' के ही भरोसे है। अगर कोई दूसरे खेमे में जा रहा है, तो वह उसका निजी फैसला है, क्योंकि अंततः हर इंसान अपनी जिंदगी में शांति ही चाहता है।

Tags:    

Similar News