BJP Punjab Strategy: राज्यसभा से आउट, फिर भी मोदी कैबिनेट में बरकरार! जानें रवनीत बिट्टू पर BJP की मेहरबानी का राज

BJP Punjab Strategy: पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 से पहले बीजेपी ने अपनी रणनीति तेज कर दी है। केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को पंजाब में बड़ी जिम्मेदारी मिलने की चर्चा है। राज्यसभा में दोबारा न भेजे जाने, मंत्री पद बरकरार रखने और सिख-हिंदू समीकरण साधने की रणनीति ने राजनीतिक अटकलें बढ़ा दी हैं।

Update:2026-06-25 16:05 IST

BJP Punjab Strategy: पंजाब में अगले साल यानी 2027 के भीतर विधानसभा चुनाव होने हैं और भारतीय जनता पार्टी ने अभी से अपनी सियासी गोटियां बिछानी शुरू कर दी हैं। भगवा दल की नजर अब पूरी तरह से पंजाब फतह पर टिक गई है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की जोरदार चर्चा है कि इस महामुकाबले के लिए केंद्रीय रेल राज्य मंत्री रवनीत सिंह 'बिट्टू' को कोई बहुत बड़ी कमान सौंपी जा सकती है।

दिलचस्प बात यह है कि खुद बिट्टू भी कई बार राज्य की राजनीति में दोबारा कदम रखने की अपनी दिली ख्वाहिश जाहिर कर चुके हैं और हाईकमान ने उन्हें राज्यसभा के लिए दोबारा मैदान में न उतारकर एक तरह से इस बात की मौन स्वीकृति दे दी है।

मंत्री पद बरकरार रखने के पीछे की सोची-समझी रणनीति

मोदी सरकार के भीतर रवनीत बिट्टू को लेकर कुछ अलग ही खिचड़ी पक रही है। बीते 21 जून को दो मंत्रियों, जॉर्ज कुरियन और रवनीत बिट्टू का राज्यसभा कार्यकाल खत्म हुआ था। कुरियन से तो फौरन इस्तीफा ले लिया गया, मगर बिट्टू अब भी अपने पद पर शान से काबिज हैं। साफ है कि केंद्र सरकार को उनसे मंत्री की कुर्सी वापस लेने की कोई जल्दी नहीं है।

पार्टी का सीधा सा गणित यह है कि लुधियाना से तीन बार के सांसद रहे बिट्टू मंत्री रहते हुए पंजाब के मुद्दों पर काम करें और सूबे की सियासत में पार्टी का आधार मजबूत करें। संवैधानिक नियम भी इस दोहरी भूमिका के रास्ते में नहीं आते क्योंकि कोई भी मंत्री संसद का सदस्य हुए बिना भी पूरे छह महीने तक अपने पद पर बना रह सकता है।

दिल्ली से पंजाब वापसी की बेकरारी

दिल्ली की सियासत में एक लंबा अरसा गुजारने के बाद अब बिट्टू की नजरें घर वापसी पर हैं। बीते 3 जून को चंडीगढ़ में जब पंजाब बीजेपी अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने कार्यभार संभाला था, तब बिट्टू ने भरे मंच से अपने दिल की बात कह दी थी। उनका कहना था कि दिल्ली में उन्हें पूरे 17 साल हो चुके हैं, इस दौरान वह लोकसभा और राज्यसभा दोनों के सदस्य रहे।

अब उनका मन पंजाब आकर विधानसभा में काम करने का है। उन्होंने तो पार्टी नेतृत्व से यहां तक कह दिया था कि उन्हें कोई जिम्मेदारी दी जाए ताकि वह अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर सीधे पंजाब कूच कर सकें।

इसके ठीक बाद यानी 4 जून को जब बीजेपी ने राज्यसभा चुनाव के लिए अपने 11 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की, तो उसमें बिट्टू का नाम नदारद था। उनकी जगह पार्टी ने पंजाब के एक और बड़े चेहरे तरुण चुग को मध्य प्रदेश से टिकट दे दिया, जो 11 जून को निर्विरोध चुन भी लिए गए। पार्टी का यह कदम चीख-चीख कर कह रहा है कि आलाकमान बिट्टू को पंजाब भेजने की पूरी तैयारी कर चुका है।

सोशल मीडिया और विकास के नैरेटिव का मास्टरस्ट्रोक

रवनीत बिट्टू इन दिनों सोशल मीडिया पर भी खासे एक्टिव हैं। वह रेल मंत्रालय के बड़े प्रोजेक्ट्स जैसे फ्रेट कॉरिडोर और स्टेशन रीडेवलपमेंट के कामों को जनता के सामने प्रमुखता से रखते हैं। साथ ही 'पंजाब ऑलवेज' की एक खास टैगलाइन के साथ सूबे के मुद्दे भी उठाते रहते हैं। पंजाब के पूर्व सीएम स्वर्गीय बेअंत सिंह के पोते बिट्टू को 22 जून, 2024 को राजस्थान उपचुनाव के जरिए राज्यसभा भेजा गया था।

लोकसभा चुनाव के दौरान खुद गृह मंत्री अमित शाह ने लुधियाना में खुले मंच से ऐलान किया था कि एनडीए की वापसी पर बिट्टू को मंत्री बनाया जाएगा। बीजेपी का यह सिख कार्ड काफी हद तक सफल भी रहा। अब इसी फॉर्मूले से विधानसभा फतह की तैयारी है। केंद्र में बिट्टू को मंत्री बनाए रखना और तरुण चुग को राज्यसभा भेजना दरअसल पंजाब में सिख और हिंदू, दोनों समुदायों को साधने का एक बड़ा सियासी दांव माना जा रहा है।

'गद्दार' के तंज से लेकर चुनाव हारने तक का सफर

कांग्रेस का दामन छोड़कर बीजेपी में शामिल होने वाले नेताओं में बिट्टू एक बड़ा नाम हैं। उन्होंने मार्च 2024 में 'हाथ' का साथ छोड़कर 'कमल' का फूल थाम लिया था, जो कांग्रेस के लिए एक करारा झटका था। इसके बाद राहुल गांधी ने उन्हें खुलेआम 'गद्दार' तक कह डाला था। पूरे लुधियाना चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस इसी नैरेटिव पर काम करती रही, जिसका खामियाजा बिट्टू को उठाना पड़ा। वह पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग से 20 हजार से अधिक वोटों से चुनाव हार गए।

मगर, इस करारी हार के बावजूद बीजेपी के भीतर उनका कद कम नहीं हुआ है। पार्टी नेताओं का तर्क है कि इतनी तगड़ी नेगेटिव कैंपेनिंग के बावजूद बीजेपी ने लुधियाना की नौ में से छह सीटों पर शानदार बढ़त बनाई। दाखा, गिल और जगराओं जैसे कुछ इलाकों में पार्टी जरूर पिछड़ी, लेकिन इसका बड़ा कारण किसानों का भारी विरोध था जिसके चलते गांवों में ढंग से प्रचार ही नहीं हो पाया।

आगामी विधानसभा चुनाव और एससी कमीशन से मिली माफी

लुधियाना लोकसभा सीट से बिट्टू का पुराना नाता रहा है। वह 2014 और 2019 में यहां से जीत दर्ज कर चुके हैं और 2024 में भी यहीं से ताल ठोंकी थी। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि बीजेपी उन्हें लुधियाना की ही किसी सीट से विधानसभा चुनाव के मैदान में उतार सकती है। हालांकि, उन पर जनता से दूरी बनाए रखने के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन उनके समर्थकों का दावा है कि उनका लोगों से जुड़ने का अपना एक अलग और पर्सनल अंदाज है।

इसी बीच बिट्टू के लिए एक राहत की खबर भी आई है। 26 मई को धुरी में हुए एक विवाद के दौरान पुलिसकर्मियों पर जातिसूचक टिप्पणी करने के मामले में बुधवार को वह पंजाब राज्य अनुसूचित जाति आयोग के सामने पेश हुए। आयोग ने उनकी माफी तो स्वीकार कर ली है, लेकिन प्रायश्चित के तौर पर उन्हें एक धार्मिक सजा सुनाई गई है। इसके तहत उन्हें अमृतसर के हरमंदिर साहिब, वाल्मीकि राम तीर्थ मंदिर, फिल्लौर के डेरा ब्रह्मांड और जालंधर के डेरा सचखंड बल्लां में जाकर मत्था टेकने और सेवा करने का आदेश दिया गया है।

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