Bihar Politics: उपेंद्र कुशवाहा के बेटे की बढ़ी मुश्किलें, दीपक प्रकाश और सम्राट सरकार को SC से नोटिस

Bihar Politics: बिहार में मंत्री दीपक प्रकाश की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठा है। बिना विधायक बने मंत्री पद पर रहने को लेकर संवैधानिक विवाद गहराया है।

Update:2026-06-15 15:18 IST

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Bihar Politics: बिहार की राजनीति में एक बड़ा विवाद उस समय सामने आया जब राष्ट्रीय लोक मोर्चा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र और बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गंभीर सुनवाई हुई। यह मामला सोशल एक्टिविस्ट राकेश कुमार सिंह द्वारा दायर रिट याचिका से जुड़ा है, जिस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहन ने इसे अत्यंत गंभीर संवैधानिक मुद्दा माना है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि दीपक प्रकाश को बिना विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बने मंत्री पद पर नियुक्त किया गया, जो संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन है।

सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार, दीपक प्रकाश और भारत के चुनाव आयोग (ECI) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत के इस कदम के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है और यह मुद्दा बिहार की सियासत में चर्चा का केंद्र बन गया है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सुदीप चंद्रा और एओआर सान्या कौशल ने दलील दी कि दीपक प्रकाश को पहली बार 20 नवंबर 2025 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार में मंत्री बनाया गया था। इसके बाद 15 अप्रैल 2026 को सरकार बदल गई और 7 मई 2026 को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार में उन्हें फिर से मंत्री पद दिया गया।

अनुच्छेद 164(4) के उल्लंघन का आरोप

याचिका में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(4) के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जो विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं है, वह केवल छह महीने तक ही मंत्री पद पर रह सकता है और इस अवधि के भीतर उसे विधायक बनना अनिवार्य होता है। याचिकाकर्ता का दावा है कि पहली नियुक्ति के आधार पर छह महीने की संवैधानिक अवधि 20 मई 2026 को समाप्त हो चुकी थी, इसके बावजूद दीपक प्रकाश को दोबारा मंत्री बनाया जाना नियमों का उल्लंघन है।

संवैधानिक दुरुपयोग का आरोप

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि बार-बार गैर-विधायक को मंत्री बनाना संविधान की भावना के खिलाफ है और यह अनुच्छेद 164(4) की छह महीने की छूट का दुरुपयोग है। याचिकाकर्ता के अनुसार, सरकारें कैबिनेट फेरबदल या मुख्यमंत्री परिवर्तन के जरिए इस अवधि को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं, जो असंवैधानिक है।

एस.आर. चौधरी केस का हवाला

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘एस.आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य (2001)’ का भी उल्लेख किया गया, जिसमें कहा गया था कि छह महीने की सीमा को किसी भी राजनीतिक या प्रशासनिक बदलाव के जरिए रीसेट नहीं किया जा सकता। याचिका में ‘को वारंटो’ (Quo Warranto) रिट जारी करने की मांग की गई है, जिसमें पूछा गया है कि दीपक प्रकाश किस कानूनी अधिकार के तहत मंत्री पद पर बने हुए हैं।

बढ़ी सरकार की मुश्किलें

याचिका में अनुच्छेद 14, 164(2), 164(4) और 141 के उल्लंघन का भी आरोप लगाया गया है। सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद अब बिहार सरकार और संबंधित पक्षों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। यह मामला आने वाले दिनों में राज्य की राजनीति और संवैधानिक व्याख्या दोनों पर बड़ा असर डाल सकता है।

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