INDIA Alliance Meeting से दूरी के बाद अब कौन सा दांव चलेंगे केजरीवाल और स्टालिन?
INDIA Alliance Meeting: दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में सोमवार को विपक्षी INDIA Bloc की बैठक से दूरी बनाने के बाद अरविंद केजरीवाल और एमके स्टालिन की अगली राजनीतिक रणनीति क्या होगी। कांग्रेस से बढ़ती नाराजगी, क्षेत्रीय राजनीति और संभावित नए विपक्षी समीकरणों पर एक विस्तृत विश्लेषण।
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INDIA Alliance Meeting: दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में सोमवार को विपक्षी INDIA ब्लॉक की बैठक आयोजित की जा रही है। कांग्रेस इस बैठक को ‘इंडिया जनबंधन’ की बैठक बता रही है, जिसमें 23 विपक्षी दलों के नेता शामिल हो रहे हैं। देश की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के बीच हो रही इस बैठक को विपक्षी एकजुटता के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि इस बैठक से दो प्रमुख क्षेत्रीय दलों ने दूरी बना ली है। द्रविड़ मुनेत्र कषगम यानी डीएमके और आम आदमी पार्टी इस बैठक में शामिल नहीं हो रही हैं।
विपक्ष के दो बड़े नेता एमके स्टालिन और अरविंद केजरीवाल ने INDIA ब्लॉक से अलग राह पकड़ने के संकेत दिए हैं। कांग्रेस से बढ़ती नाराजगी के चलते दोनों नेता अब अपनी राजनीतिक रणनीति अलग तरीके से तय करते नजर आ रहे हैं।
कांग्रेस से नाराजगी के बाद डीएमके ने बनाई दूरी
तमिलनाडु की राजनीति में लंबे समय तक साथ चलने वाली डीएमके और कांग्रेस की राहें अब अलग होती दिखाई दे रही हैं। डीएमके ने INDIA ब्लॉक की बैठक का बहिष्कार कर दिया है। पार्टी की नाराजगी की मुख्य वजह तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस का अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी टीवीके के साथ जाना बताया जा रहा है।
डीएमके का मानना है कि चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस ने उसका साथ छोड़ दिया। पार्टी ने इसे सीधे तौर पर विश्वासघात माना है। यही कारण है कि डीएमके ने संसद में भी अपने सांसदों की बैठने की व्यवस्था कांग्रेस से अलग करने की मांग की है।
डीएमके के प्रवक्ता सरवनन अन्नादुरई ने साफ कहा है कि उनकी पार्टी ने INDIA ब्लॉक की बैठक का बहिष्कार करने का फैसला किया है क्योंकि वे ऐसी जगह नहीं रहना चाहते जहां कांग्रेस मौजूद हो।
स्टालिन अब क्षेत्रीय राजनीति पर करेंगे फोकस
तमिलनाडु की सत्ता संभाल रहे एमके स्टालिन अब राष्ट्रीय गठबंधन की राजनीति के बजाय अपने द्रविड़ियन मॉडल और क्षेत्रीय राजनीति पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। उनकी कोशिश राज्य में अपनी राजनीतिक पकड़ और मजबूत करने की होगी।
इसके लिए वे वामपंथी दलों और छोटे क्षेत्रीय संगठनों को अपने साथ बनाए रखने की रणनीति पर काम कर सकते हैं। साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर भी नए राजनीतिक समीकरण तलाशने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
ममता बनर्जी और अखिलेश यादव जैसे नेताओं के साथ स्टालिन के अच्छे संबंध माने जाते हैं। ऐसे में कांग्रेस से असहज क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर किसी नए राजनीतिक मंच या फेडरल फ्रंट की संभावनाएं भी तलाश की जा सकती हैं। हालांकि समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ऐसे किसी प्रयास का हिस्सा बनेंगी या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है। खासकर उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के लिए कांग्रेस से दूरी बनाना आसान नहीं माना जा रहा है।
केजरीवाल ने चुनी ‘एकला चलो’ की राह
आम आदमी पार्टी और कांग्रेस का रिश्ता हमेशा परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहा है। पंजाब में दोनों दल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे हैं, जबकि दिल्ली में कई बार गठबंधन की मजबूरी ने उन्हें साथ खड़ा किया। लेकिन अब अरविंद केजरीवाल ने साफ संकेत दिए हैं कि वह आगे स्वतंत्र राजनीतिक रास्ता अपनाना चाहते हैं।
इसी वजह से आम आदमी पार्टी ने भी INDIA ब्लॉक की बैठक से दूरी बनाई है। पार्टी नेताओं ने कांग्रेस पर क्षेत्रीय दलों को कमजोर करने की कोशिश करने का आरोप लगाया है।
केजरीवाल अब कांग्रेस के प्रभाव वाले राज्यों जैसे गुजरात और गोवा में खुद को भारतीय जनता पार्टी के विकल्प के रूप में स्थापित करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। वहीं पंजाब में उनकी राजनीतिक लड़ाई कांग्रेस और बीजेपी दोनों से है। ऐसे में वह दोनों दलों से समान दूरी बनाए रखने की नीति अपनाते नजर आ रहे हैं।
गठबंधन से दूरी बनाते नजर आ रहे केजरीवाल
अरविंद केजरीवाल अब गठबंधन की राजनीति से दूरी बनाते दिखाई दे रहे हैं। संसद में वे केंद्र सरकार की नीतियों, जांच एजेंसियों के कथित दुरुपयोग और महंगाई जैसे मुद्दों पर विपक्ष के साथ खड़े हो सकते हैं, लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व वाले मंच से दूरी बनाए रखने की कोशिश करेंगे।
उनका मुख्य फोकस दिल्ली में अपनी राजनीतिक जमीन को फिर से मजबूत करना और पंजाब में अपनी सरकार को बनाए रखना होगा। ऐसे में आम आदमी पार्टी फिलहाल किसी औपचारिक विपक्षी गठबंधन का हिस्सा बनने के मूड में नहीं दिख रही है।
INDIA ब्लॉक के सामने बढ़ती चुनौती
डीएमके और आम आदमी पार्टी जैसे दलों का INDIA ब्लॉक से दूरी बनाना विपक्षी गठबंधन के लिए एक नई चुनौती माना जा रहा है। इससे यह संकेत भी मिल रहा है कि देश की राजनीति अब केवल दो ध्रुवों तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि क्षेत्रीय दल अपनी स्वतंत्र पहचान और राजनीतिक ताकत को बनाए रखने पर ज्यादा जोर दे रहे हैं।
स्टालिन और केजरीवाल जैसे नेता न तो बीजेपी के साथ जाने के संकेत दे रहे हैं और न ही कांग्रेस के नेतृत्व को स्वीकार करने के इच्छुक दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में विपक्षी राजनीति का स्वरूप आने वाले समय में और अधिक बहुध्रुवीय हो सकता है।
BJP का विरोध जारी, लेकिन कांग्रेस के साथ नहीं
गौरतलब हो कि, लोकसभा और राज्यसभा में डीएमके के पास अच्छी संख्या में सांसद हैं। ऐसे में पार्टी केंद्र की बीजेपी सरकार का विरोध पहले की तरह जारी रखेगी। हालांकि अब वह कांग्रेस के नेतृत्व वाले INDIA ब्लॉक के फैसलों या साझा कार्यक्रमों के प्रति जवाबदेह नहीं रहना चाहती।
इसी तरह आम आदमी पार्टी भी राष्ट्रीय मुद्दों पर विपक्ष के साथ खड़ी दिखाई दे सकती है, लेकिन वह किसी औपचारिक गठबंधन का हिस्सा बनने से बचने की कोशिश करेगी। यही वजह है कि दिल्ली में विपक्षी एकजुटता की तस्वीर के बीच INDIA ब्लॉक के भीतर दरार और क्षेत्रीय दलों की बढ़ती स्वतंत्रता सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बनी हुई है।