India Ethanol Blending Increase: भारत में पेट्रोल में मिलेगा 30% एथेनॉल, BIS ने लागू किए नए मानक
Ethanol Blending Increase: भारत ने ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने के लिए पेट्रोल में 30% तक एथेनॉल मिलाने का नया रोडमैप तैयार किया है। BIS ने 15 मई 2026 से नए फ्यूल ब्लेंड मानक लागू कर दिए हैं, जिससे कच्चे तेल पर निर्भरता कम होगी और क्लीन मोबिलिटी को बढ़ावा मिलेगा।
ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और विदेश से आयात होने वाले कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने की ओर भारत एक बड़ा कदम उठाने जा रहा है। सरकार अभी लागू ए-20 योजना से आगे का रास्ता तैयार कर रही है। जिसके तहत पेट्रोल में 20% से ज्यादा यानी 22% से लेकर 30% तक एथेनॉल मिलने की तैयारी शुरू कर दीजिए। इस योजना को अमली जामा पहनाने के लिए भारतीय मानक ब्यूरो नए फ्यूल ब्लेंड के लिए नए मानक भी जारी कर दिए जिसे 15 में से लागू कर दिया गया है।
यह फैसला उसे समय लिया गया है जब पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर है जिसकी वजह से पूरी दुनिया में कच्चे तेल की सप्लाई बुरी तरीके से प्रभावित हुई है। बता दें, भारत विदेश से आयात होने वाले कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से ही लेता है। हार्मोन स्ट्रेट बंद होने के बाद से ही दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमत में भारी तार चढ़ा देखा गया है। ऐसे में भारत सरकार अब कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता को कम करना चाह रही है।
भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा जारी नियमों के तहत इंजनों और वाहनों के लिए कड़े तकनीकी मापदंड तय कर दिए गए हैं जो आगे चलकर हाई ग्रेड एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन पर चलेंगे। इन मनको में ईंधन की शुद्धता, ऑक्टेन लेवल, सल्फर की सीमा, पानी की मात्रा, वाष्प का दबाव और जंग से बचाने के महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान दिया गया है। इन नियमों का उद्देश्य है कि आने वाले समय में फ्लेक्स फ्यूल और ज्यादा मात्रा में एथेनॉल क्षमता वाले वहां भारतीय सड़कों पर बिना किसी खराबी के और सुरक्षित रूप से चल सकें।
सरकार द्वारा फैसले का घरेलू एथेनॉल उद्योग ने दिल खोल कर स्वागत किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार के इस फैसले से न केवल देश में पर्यावरण अनुकूल और क्लीन मोबिलिटी को बढ़ावा मिलेगा। साथी देश में मौजूद सरप्लस एथेनॉल का भी ढंग से इस्तेमाल हो पाएगा। आंकड़ों की माने तो भारत की एथेनॉल उत्पादन क्षमता 2 लाख अब लीटर तक पहुंच चुकी है। जबकि तेल कंपनियों द्वारा इसकी खरीद स्वरूप अब तक केवल एक अरब डॉलर के आसपास ही है। नए नियमों के अनु के बाद अब इनका पूरा इस्तेमाल किया जाएगा जिस देश के किसानों और चीनी मिलों को भी सीधा लाभ पहुंचेगा।