दो आधार कार्ड, पैन और ड्राइविंग लाइसेंस! लखनऊ में लोला कायूमोवा के दस्तावेजों की जांच तेज
Lola Kayumova: उज्बेकिस्तान की नागरिक लोला कायूमोवा की गिरफ्तारी के बाद पुलिस दो आधार कार्ड, पैन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस की जांच कर रही है। मोबाइल और आव्रजन रिकॉर्ड से मददगारों की तलाश जारी है।
Lola Kayumova (Image Credit-Social Media)
लखनऊ। उज्बेकिस्तान की नागरिक लोला कायूमोवा की गिरफ्तारी के बाद जांच अब केवल उसके भारत में अवैध रूप से रहने तक सीमित नहीं है। पुलिस को उसके मोबाइल, यात्रा दस्तावेजों और भारतीय पहचान पत्रों से ऐसी जानकारियां मिलने का दावा है जिनसे यह संदेह गहरा गया है कि उसने वर्षों तक अलग-अलग दस्तावेजों और स्थानीय मददगारों के सहारे अपनी वास्तविक आव्रजन स्थिति छिपाए रखी। पुलिस के अनुसार उसके पास से दो आधार कार्ड, पैन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस मिले हैं और अब यह जांच की जा रही है कि एक विदेशी नागरिक के नाम पर ये भारतीय दस्तावेज किस प्रक्रिया से तैयार हुए और इसमें किन लोगों की भूमिका रही। लोला को 12 अगस्त को सुशांत गोल्फ सिटी क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया था और पुलिस उसके कथित अंतरराज्यीय देह व्यापार नेटवर्क तथा विदेशी महिलाओं के अवैध प्रवास से जुड़े संपर्कों की जांच कर रही है।
आपकी उपलब्ध सामग्री में पुलिस जांच के हवाले से दावा है कि लोला ने अपने प्रवास के दौरान दो बार पासपोर्ट और तीन-तीन महीने का पर्यटक वीजा हासिल किया। यहां कानूनी शब्दावली स्पष्ट रखना जरूरी है। उज्बेक पासपोर्ट उज्बेकिस्तान की सक्षम प्राधिकारी या उसके दूतावास/वाणिज्य दूतावास की प्रक्रिया से जारी होता है, जबकि भारत का वीजा भारतीय मिशन अथवा संबंधित भारतीय आव्रजन व्यवस्था से मिलता है। इसलिए इसे ‘दोनों दूतावासों से वीजा बनवा लिया’ कहना सही नहीं होगा। जांच का असली प्रश्न यह होना चाहिए कि उसने उज्बेक अधिकारियों के सामने पासपोर्ट के लिए और भारतीय अधिकारियों के सामने वीजा के लिए कौन-सी जानकारी तथा दस्तावेज प्रस्तुत किए और क्या उसमें तथ्य छिपाए गए।
पुलिस का कहना है कि उसके मोबाइल फोन की फॉरेंसिक जांच में संपर्क, संदेश, तस्वीरें, स्थान और वित्तीय लेनदेन खंगाले जा रहे हैं। जांचकर्ता इसी डिजिटल सामग्री के जरिए उन लोगों तक पहुंचना चाहते हैं जिन्होंने कथित रूप से आवास, दस्तावेज, यात्रा या देह व्यापार नेटवर्क चलाने में सहयोग किया। पुलिस ने उसके यात्रा मार्ग और आव्रजन रिकॉर्ड की भी जांच शुरू कर दी है।
2018 से लखनऊ में रहने का दावा लेकिन दस्तावेजों की कहानी उलझी
उपलब्ध पुलिस विवरण के अनुसार लोला कई वर्षों से भारत में रह रही थी। पुरानी जांच में उसका नाम तब प्रमुखता से सामने आया जब जून 2025 में सुशांत गोल्फ सिटी के एक फ्लैट से उज्बेकिस्तान की दो महिलाएं बिना वैध पासपोर्ट और वीजा के मिलीं। उन दोनों ने पूछताछ में पुलिस को बताया था कि लोला उनके भारत आने और रहने की व्यवस्था से जुड़ी थी। उस समय डॉक्टर विवेक गुप्ता और त्रिजिन राज उर्फ अर्जुन राणा की भूमिका भी जांच में आई थी।
पुलिस का आरोप है कि लोला उसी समय गिरफ्तारी से बच गई थी और कुछ समय दिल्ली में छिपी रही। ताजा गिरफ्तारी के बाद अधिकारियों ने कहा कि वह लगभग दो महीने पहले फिर लखनऊ लौटी थी और उसके पास वैध वीजा-पासपोर्ट नहीं थे।
इसलिए अब पुलिस के सामने सबसे महत्वपूर्ण काम उसकी पूरी आव्रजन समयरेखा बनाना है—भारत में पहली बार कब आई, किन तारीखों पर वीजा मिला, कब उसकी वैधता समाप्त हुई, क्या बीच में देश से बाहर गई, दूसरा पासपोर्ट किस आधार पर बना और भारत में दोबारा प्रवेश या प्रवास की अनुमति किस दस्तावेज पर मिली।
फर्जी भारतीय पहचान दस्तावेज मामला और गंभीर बनाते हैं
2025 की जांच में भी पुलिस ने दावा किया था कि लोला ने भारतीय पहचान बनाने की कोशिश की थी और उसके पास स्थानीय पते पर बना ड्राइविंग लाइसेंस था, जिसकी वैधता 2035 तक बताई गई थी। उस समय जांच एजेंसियां आधार और दूसरे दस्तावेजों की भी पड़ताल कर रही थीं।
अब गिरफ्तारी के बाद दो आधार कार्ड, पैन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस की बरामदगी का दावा सामने आने से यह जांच केवल विदेशी नागरिक अधिनियम के उल्लंघन का मामला नहीं रह जाती। यदि दस्तावेज जाली पाए जाते हैं या गलत घोषणाओं के आधार पर बनवाए गए हैं तो दस्तावेज तैयार कराने और उनका उपयोग करने वाले भारतीय सहयोगियों की भूमिका भी अलग अपराध के रूप में सामने आ सकती है।
इसी आधार पर पुलिस ने उपलब्ध सामग्री के मुताबिक कूटरचित दस्तावेज और अनैतिक देह व्यापार से संबंधित धाराएं बढ़ाई हैं। हालांकि अंतिम दोषसिद्धि अदालत में साक्ष्यों पर निर्भर करेगी; अभी पुलिस आरोपों की जांच कर रही है।
व्हाट्सऐप चैट से बिल्डर और दूसरे मददगारों की तलाश
ताजा जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा लोला का मोबाइल है। पुलिस का दावा है कि व्हाट्सऐप और अन्य डिजिटल रिकॉर्ड से लखनऊ के अलावा दूसरे राज्यों से जुड़े लोगों के बारे में जानकारी मिली है। पुलिस टीमें इन संपर्कों का सत्यापन कर रही हैं और यह देख रही हैं कि इनमें कौन केवल परिचित था और कौन कथित नेटवर्क के संचालन में सक्रिय सहयोगी।
किसी व्यक्ति का फोन में नाम होना अपने आप अपराध में भागीदारी सिद्ध नहीं करता। गिरफ्तारी या अभियोजन के लिए बातचीत, पैसा, आवास, दस्तावेज या अन्य प्रत्यक्ष साक्ष्य की जरूरत होगी। पुलिस अधिकारियों ने भी कहा है कि डॉक्टर विवेक गुप्ता सहित जिन लोगों की भूमिका पहले जांच में आई थी, उनके खिलाफ आगे की कार्रवाई नए साक्ष्य पर निर्भर करेगी। जून 2025 की जांच में भी डॉक्टर और एक अन्य व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज होने के बावजूद गंभीर गिरफ्तारी योग्य धाराएं न होने की बात पुलिस ने कही थी।
प्लास्टिक सर्जरी और पहचान बदलने का पुराना आरोप
पिछली जांच में पुलिस ने यह भी आरोप लगाया था कि लोला ने अपना रूप और उम्र कम दिखाने के लिए कई कॉस्मेटिक सर्जरी कराईं और अन्य विदेशी महिलाओं को भी इस तरह की प्रक्रियाओं तक पहुंचाया। टाइम्स ऑफ इंडिया की 2025 की रिपोर्ट में पुलिस के हवाले से सात कॉस्मेटिक प्रक्रियाओं का दावा किया गया था।
लेकिन यहां “प्लास्टिक सर्जरी से पहचान बदलना” सावधानी से लिखा जाना चाहिए। किसी व्यक्ति का चेहरा कॉस्मेटिक सर्जरी से बदल सकता है, पर पासपोर्ट या आव्रजन पहचान केवल चेहरे पर आधारित नहीं होती; नाम, जन्मतिथि, राष्ट्रीयता, बायोमीट्रिक्स और दस्तावेज भी महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए पुलिस को यह साबित करना होगा कि सर्जरी का उद्देश्य वास्तव में कानून प्रवर्तन से बचना था या वह केवल सौंदर्य प्रक्रिया थी।
अब रिमांड में भाषा विशेषज्ञ की मदद से पूछताछ
पुलिस ने अदालत को उपलब्ध साक्ष्य देकर लोला को न्यायिक हिरासत में भेजा है और उसके बारे में उज्बेकिस्तान के दूतावास को सूचना देने की बात कही गई है। पुलिस अधिकारी मोहम्मद मुश्ताक के अनुसार लोला कुछ हिंदी बोल और समझ सकती है, लेकिन विस्तृत पूछताछ के लिए उज्बेक भाषा जानने वाले व्यक्ति की मदद लेने की योजना है।
यह जरूरी भी है, क्योंकि वीजा, पासपोर्ट, विदेश यात्रा, सहयोगियों और वित्तीय लेनदेन से जुड़े सवालों में भाषा की गलतफहमी जांच को प्रभावित कर सकती है।
असल जांच अब तीन सवालों पर
लोला मामले में अब पुलिस के सामने तीन बड़े प्रश्न हैं। पहला—क्या उसने वैध प्रक्रिया को धोखा देकर नए पासपोर्ट और भारतीय वीजा प्राप्त किए, और यदि हां तो उसमें कौन-से गलत दस्तावेज इस्तेमाल हुए? दूसरा—भारतीय आधार, पैन और ड्राइविंग लाइसेंस जैसे दस्तावेज उसे किसने और कैसे दिलाए? तीसरा—क्या वह वास्तव में किसी संगठित देह व्यापार या मानव तस्करी नेटवर्क की संचालक थी या पुलिस जांच में मिले संपर्कों की भूमिका अलग-अलग थी?
यदि इन सवालों के उत्तर दस्तावेज और डिजिटल साक्ष्य से पुष्ट होते हैं तो मामला किसी एक विदेशी महिला के अवैध प्रवास से कहीं बड़ा हो जाएगा। तब यह भारत की आव्रजन, पहचान दस्तावेज और स्थानीय सत्यापन व्यवस्था में वर्षों तक मौजूद संभावित खामियों की जांच बन जाएगा।