SC on SIR: विपक्ष का खेल खत्म! सुप्रीम कोर्ट ने SIR को बताया संवैधानिक, चीफ जस्टिस का फैसला बड़ा झटका
SC on SIR: एसआईआर प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मुददे पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।
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SC on SIR: सुप्रीम कोर्ट ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मुददे पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। जिससे चुनाव आयोग को तो बड़ी राहत मिली, लेकिन राजनीतिक दलों को बड़ा सियासी झटका लगा है। न्यायालय ने अपने निर्णय में यह साफ कहा है कि एसआईआर निष्पक्ष चुनाव कराने और लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए बेहद जरूरी है। इसके साथ ही यह भी कहा कि एसआईआर प्रक्रिया जन प्रतिनिधित्व अधिनियम और संविधान के प्रावधानों के अनुरूप है।
बिहार चुनाव से पहले शुरू हुआ था एसआईआर
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के होने के पहले चुनाव आयोग ने मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण शुरू किया था। एसआईआर कराने के पीछे चुनाव आयोग ने यह तर्क दिया था कि प्रवासन, शहरीकरण और जनसंख्या में बदलाव के कारण मतदाता सूची में कई तरह की गड़बड़ियां आ गई हैं। ऐसे में फर्जी और अयोग्य मतदाताओं के नाम हटाकर वास्तविक मतदाताओं के अधिकार सुरक्षित कराने के लिए एसआईआर बेहद जरूरी था। इसी उद्देश्य से चुनाव आयोग ने एसआईआर प्रक्रिया लागू की थी।
विपक्ष ने किया था विरोध
चुनाव आयोग के एसआईआर कराने का विपक्षी दलों ने जोरदार विरोध किया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी से लेकर राजद प्रमुख तेजस्वी यादव और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी सहित विपक्ष के कई नेताओं ने एसआईआर पर कई गंभीर आरोप लगाए थे। विपक्ष का कहना था कि इस प्रक्रिया से गरीबों, दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के नाम मतदाता सूची से हटाने का प्रयास किया जा रहा है। विपक्ष ने इस प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग को भी कठघरे में खड़ा किया था।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
एसआईआर का मामला उच्चतम न्यायालय तक पहुंच गया। न्यायालय ने इस मुद्दे पर विस्तृत सुनवाई की। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने तीन महत्वपूर्ण सवालों पर विचार किया। पहला, क्या चुनाव आयोग को एसआईआर प्रक्रिया चलाने का अधिकार है? दूसरा सवाल यह कि क्या इसके पीछे कोई वैध उद्देश्य है? और तीसरा और अंतिम सवाल कि क्या यह प्रक्रिया जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 के खिलाफ है? सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सभी पक्षों की दलीलें सुनी गईं और फिर कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि चुनाव आयोग ने संवैधानिक अधिकारों के तहत ही एसआईआर प्रक्रिया को कराने का कदम उठाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व कानून 1950 की धारा 21(3) चुनाव आयोग को मतदाता सूची की शुद्धता करने का अधिकार देते हैं। कोर्ट ने यह भी माना कि मतदाता सूची की सफाई लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है और निष्पक्ष चुनाव के लिए यह प्रक्रिया बेहद जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट के एसआईआर पर दिये गये इस ऐतिहासिक निर्णय के बाद विपक्ष के उस सियासी रणनीति को गहरा झटका लगा है जिसमें चुनाव आयोग पर पक्षपात के आरोप लगाए जा रहे थे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से चुनाव आयोग के अधिकार और मजबूत होंगे। साथ ही विपक्षी दलों के लिए एसआईआर का विरोध करना आसान नहीं रहेगा।