‘ये पर्याप्त वजह नहीं...', सुप्रीम कोर्ट ने पलटा कर्नाटक HC का फैसला, अब आरोपी करेंगे सरेंडर

SC Slams Karnataka HC: सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाई कोर्ट का जमानत आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि गंभीर मामले में जमानत देने के लिए पर्याप्त कारण बताना जरूरी है। आरोपियों को 4 हफ्ते में सरेंडर का निर्देश दिया गया।

Update:2026-08-08 21:16 IST

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SC Slams Karnataka HC: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने जमानत (Bail) से जुड़े एक अहम मामले में कहा है कि अगर किसी अदालत ने जमानत देने से इनकार करते हुए अपने आदेश में कारण दर्ज किए हैं, तो अपीलीय अदालत (Appellate Court) उस आदेश को बिना पर्याप्त वजह बताए पलट नहीं सकती। अगर अपीलीय अदालत अलग नतीजे पर पहुंचती है तो उसे कम से कम संक्षेप में यह बताना होगा कि किन परिस्थितियों के आधार पर उसने अलग राय बनाई है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कर्नाटक हाई कोर्ट के उस आदेश पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसमें हत्या के प्रयास और मारपीट (Attempt to Murder and Assault) के कथित मामले में तीन आरोपियों को अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) और चार अन्य आरोपियों को नियमित जमानत (Regular Bail) दे दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने 9 अप्रैल 2026 को कलबुर्गी स्थित कर्नाटक हाई कोर्ट (Karnataka High Court at Kalaburagi) के साझा फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट के आदेश में पर्याप्त कारण नहीं दिए गए थे और सत्र अदालत के जमानत आदेशों को जिस जल्दबाजी में पलटा गया, वह भी उचित नहीं था।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला विजयपुरा जिले के मुद्देबिहाल थाने (Muddebihal Police Station) में 10 मार्च 2026 को दर्ज एफआईआर (FIR) से जुड़ा है। एफआईआर सिद्धलिंगप्पागौड़ा बिरादार की शिकायत पर दर्ज की गई थी।

शिकायत में आरोप लगाया गया था कि आरोपी लोहे की रॉड और लकड़ी के लट्ठे लेकर शिकायतकर्ता के घर में घुसे और उसके पिता शांतागौड़ा बिरादार पर हमला किया। आरोप के मुताबिक यह हमला जमीन विवाद से जुड़ा था। इस पुराने जमीन विवाद में शांतागौड़ा ने मध्यस्थ (Mediator) के तौर पर हस्तक्षेप किया था।

हमले में शांतागौड़ा बिरादार को गंभीर चोटें आईं। उन्हें दाहिनी फिबुला, प्रॉक्सिमल टिबिया, दाहिनी पटेला, दाहिने कूल्हे और पसलियों में फ्रैक्चर हुआ। चोटों के कारण उन्हें कई सर्जरी (Surgeries) से गुजरना पड़ा।

परिवार के दूसरे लोगों को भी चोट

आरोप है कि हमले के दौरान शिकायतकर्ता की चाची और दिव्यांग बहन ने बीच-बचाव करने की कोशिश की। इस दौरान दोनों को भी चोटें आईं।

मामले की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि घायल शांतागौड़ा जब जमानत याचिकाओं पर सुनवाई हुई, उस समय भी अस्पताल में भर्ती थे।

सत्र अदालत ने क्यों खारिज की थी जमानत?

4 अप्रैल 2026 को सत्र अदालत (Sessions Court) ने आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। अदालत ने मामले में लगे आरोपों की गंभीरता, चोटों की गंभीरता और हथियारों की बरामदगी की जरूरत को ध्यान में रखते हुए जमानत देने से इनकार किया था।

इसके सिर्फ पांच दिन बाद यानी 9 अप्रैल को कर्नाटक हाई कोर्ट ने सत्र अदालत के इन आदेशों को पलटते हुए तीन आरोपियों को अग्रिम जमानत और चार आरोपियों को नियमित जमानत दे दी।

HC के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि अपराधों की प्रकृति और गंभीरता तथा याचिकाकर्ताओं के पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए शर्तों के साथ जमानत देना उचित है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस टिप्पणी को पर्याप्त कारण नहीं माना। अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता बालाजी श्रीनिवासन और परीक्षित पिटाले ने अदालत के सामने दलीलें रखीं।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि उसके विचार में यह जमानत देने के लिए पर्याप्त कारण नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब मामला इतना गंभीर हो।

आरोपियों की भूमिका और मेडिकल स्थिति का जिक्र नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट के आदेश में आरोपों की प्रकृति, अलग-अलग आरोपियों की भूमिका और घायल की मेडिकल स्थिति पर चर्चा नहीं की गई थी।

कोर्ट ने खास तौर पर यह बात नोट की कि जब जमानत याचिकाओं पर सुनवाई हुई, उस समय घायल अस्पताल में भर्ती था। इसके बावजूद हाई कोर्ट के आदेश में उसकी गंभीर चोटों और मेडिकल स्थिति को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक ऐसे गंभीर मामले में जमानत देने का फैसला करते समय इन सभी महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार किया जाना जरूरी था।

अभियोजन पक्ष को भी प्रभावी मौका नहीं मिला

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की कार्यवाही के तरीके पर भी सवाल उठाया। कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने सरकारी वकील को नोटिस स्वीकार करने का निर्देश देने के बाद उसी दिन मामले की सुनवाई आगे बढ़ा दी।

इस वजह से अभियोजन पक्ष (Prosecution) को मामले से जुड़े जरूरी दस्तावेज और प्रासंगिक सामग्री रिकॉर्ड पर रखने का प्रभावी मौका नहीं मिल पाया।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इतनी जल्दी में सत्र अदालत के आदेशों को पलटना उचित नहीं था, खासकर तब जब मामला गंभीर आरोपों और गंभीर चोटों से जुड़ा था।

रिहाई के बाद धमकी देने का भी दावा

अपीलकर्ता की ओर से यह भी दावा किया गया कि आरोपियों को जमानत मिलने के बाद कथित तौर पर दोबारा धमकियां दी गईं। इसके बाद एक और शिकायत दर्ज होने की बात भी अदालत के सामने रखी गई।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दावे के मामले में कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की। कोर्ट ने साफ किया कि वह मामले के गुण-दोष (Merits) पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं कर रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का आदेश किया रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट का आदेश पर्याप्त कारणों के अभाव में और उचित तरीके से मामले पर विचार नहीं करने यानी गैर-विचारशीलता (Non-Application of Mind) से प्रभावित था।

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने 9 अप्रैल 2026 के कर्नाटक हाई कोर्ट के साझा फैसले को रद्द कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों को चार सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण (Surrender) करने का निर्देश दिया है। साथ ही जमानत की सभी याचिकाओं को दोबारा विचार के लिए हाई कोर्ट भेज दिया गया है।

नए सिरे से होगा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट को निर्देश दिया है कि जमानत याचिकाओं पर नए सिरे से विचार किया जाए और इस दौरान दोनों पक्षों को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाए।

यानी सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल यह तय नहीं किया है कि आरोपियों को जमानत मिलनी चाहिए या नहीं। कोर्ट ने सिर्फ हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द किया है, जिसमें पर्याप्त कारण बताए बिना सत्र अदालत के जमानत खारिज करने वाले आदेशों को पलट दिया गया था।

इस फैसले के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि जमानत जैसे अहम मामलों में अपीलीय अदालत को अपने फैसले के पीछे के कारण स्पष्ट करने होंगे, खासकर तब जब निचली अदालत ने जमानत से इनकार करते हुए अपने आदेश में पर्याप्त कारण दर्ज किए हों।

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