Supreme Court on SIR: एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, 'चुनाव आयोग' को मिली कानूनी जीत

Supreme Court on SIR: सुप्रीम कोर्ट ने बिहार SIR मामले में चुनाव आयोग को बड़ी राहत दी है और वोटर लिस्ट संशोधन को संवैधानिक अधिकार मानते हुए सभी याचिकाएं खारिज कर दीं।

Update:2026-05-27 12:10 IST

Supreme Court on SIR

Supreme Court on SIR: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में चुनाव आयोग को वोटर लिस्ट के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) कराने का पूरा अधिकार दिया है। अदालत ने बिहार में चल रही SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग की यह कार्रवाई उसके संवैधानिक अधिकार क्षेत्र के भीतर आती है।

यह मामला बिहार में वोटर लिस्ट के व्यापक पुनरीक्षण से जुड़ा था, जिसमें कई याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि चुनाव आयोग के पास इतने बड़े स्तर पर SIR कराने का अधिकार नहीं है। याचिकाओं में कहा गया था कि यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और उससे जुड़े नियमों का उल्लंघन करती है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी तर्कों को खारिज कर दिया।

वोटर लिस्ट की शुद्धता लोकतंत्र की नींव: सुप्रीम कोर्ट

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि बिहार में SIR प्रक्रिया का उद्देश्य वोटर लिस्ट को अधिक सटीक और विश्वसनीय बनाना है, जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए बेहद जरूरी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में केवल मतदान की प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि उससे पहले तैयार की जाने वाली वोटर लिस्ट की गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वोटर लिस्ट की सत्यनिष्ठा, सटीकता और विश्वसनीयता लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मूल आधारशिला है। इसलिए चुनाव आयोग द्वारा की गई यह प्रक्रिया संवैधानिक उद्देश्यों के अनुरूप है।

लंबे समय से लंबित सुधार और बढ़ती त्रुटियां बनीं आधार (SC on SIR)

फैसले में कोर्ट (Supreme Court on SIR) ने यह भी माना कि पिछले चार दशकों से वोटर लिस्ट का व्यापक स्तर पर पुनरीक्षण नहीं हुआ था। इस दौरान शहरीकरण, बड़े पैमाने पर प्रवासन, नामों के जुड़ने और हटने जैसी प्रक्रियाओं के कारण वोटर लिस्ट में त्रुटियों की संभावना बढ़ गई थी। कोर्ट के अनुसार, इन परिस्थितियों में चुनाव आयोग द्वारा SIR कराना एक आवश्यक और उचित कदम है, जिससे वोटर लिस्ट में मौजूद दोहराव और गलतियों को सुधारा जा सके।

याचिकाकर्ताओं की दलीलें और विवाद

इस मामले में कई याचिकाकर्ताओं, जिनमें प्रमुख NGO ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (ADR) भी शामिल था, ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया को चुनौती दी थी। उनका आरोप था कि यह प्रक्रिया किसी प्रकार की NRC जैसी कवायद है, जिसमें नागरिकता की जांच की जा रही है, जबकि यह अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग द्वारा तय की गई समयसीमा अव्यावहारिक है। साथ ही, उन लगभग 65 लाख मतदाताओं के आंकड़ों पर भी सवाल उठाए गए, जिन्हें वोटर लिस्ट के ड्राफ्ट से हटाया गया था। इन लोगों को या तो मृत, प्रवासी या अन्य क्षेत्रों में रजिस्टर्ड बताया गया था।

चुनाव आयोग का पक्ष और कोर्ट की टिप्पणी (SIR News)

चुनाव आयोग (SIR Latest News Hindi) ने अपनी दलील में कहा था कि आधार कार्ड या वोटर आईडी नागरिकता का प्रमाण नहीं हो सकते, इसलिए वोटर लिस्ट की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए SIR जरूरी है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया केवल मतदाता सूची को अपडेट करने के लिए है, न कि नागरिकता तय करने के लिए। सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसकी अध्यक्षता चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने की, ने पहले ही संकेत दिए थे कि वोटर लिस्ट में नाम जोड़ना या हटाना चुनाव आयोग के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र में आता है।

प्रक्रिया और सुनवाई का इतिहास

इस मामले में लंबी सुनवाई 12 अगस्त को शुरू हुई थी और 29 जनवरी को अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अब अंतिम निर्णय में कोर्ट ने चुनाव आयोग के अधिकारों को बरकरार रखते हुए SIR प्रक्रिया को वैध ठहराया है, जिससे मतदाता सूची सुधार अभियान को बड़ी कानूनी मजबूती मिली है।

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