Tamil Nadu Political Crisis 2026: क्या तमिलनाडु में 1988 का इतिहास खुद को दोहरा रहा है?
क्या 2026 का यह गतिरोध भी किसी नए नेतृत्व की मुकम्मल ताजपोशी के लिए ज़मीन तैयार कर रहा है, या फिर यह द्रविड़ राजनीति के सबसे पुराने किलों के ढहने की शुरुआत है?
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Tamil Nadu Political Crisis 2026: तमिलनाडु की राजनीति आज उस मुहाने पर खड़ी है, जहाँ से भविष्य धुंधला और अतीत की यादें ताज़ा हो रही हैं। 2026 के विधानसभा चुनाव परिणामों ने राज्य को एक ऐसे त्रिशंकु मोड़ पर ला खड़ा किया है, जिसने 38 साल पुराने उस दौर की याद दिला दी है जब एम.जी. रामचंद्रन के निधन के बाद द्रविड़ राजनीति के दो फाड़ हो गए थे। आज भले ही किरदार बदले हों, लेकिन सत्ता का संघर्ष और संवैधानिक संकट बिल्कुल वैसा ही है जैसा जानकी रामचंद्रन और जयललिता के समय में था।
सत्ता का अधूरा गणित और राजभवन की चुप्पी
सुपरस्टार विजय की पार्टी 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (TVK) 108 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में तो उभरी है, लेकिन बहुमत के जादुई आंकड़े (118) से दूर है। 1988 में जानकी रामचंद्रन ने भी इसी तरह 'सबसे बड़े गुट' के तौर पर शपथ ली थी, लेकिन सदन के भीतर हुए संग्राम ने उनकी सरकार को 24 दिनों में ही धराशायी कर दिया था। आज भी राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर का विजय के दावे पर संतुष्ट न होना और स्पष्ट बहुमत की लिखित चिट्ठियों की मांग करना, उसी इतिहास की पुनरावृत्ति की ओर इशारा कर रहा है।
द्रविड़ किले को बचाने का महा-मंथन: 'दुश्मन का दुश्मन दोस्त'
इस पूरे राजनीतिक ड्रामे का सबसे चौंकाने वाला अध्याय पर्दे के पीछे चल रहा 'द्रविड़ मंथन' है। चेन्नई के सत्ता गलियारों में यह चर्चा आम है कि DMK और AIADMK के शीर्ष नेताओं के बीच गुप्त वार्ताओं का दौर शुरू हो चुका है। यह संवाद सत्ता के बंटवारे के लिए नहीं, बल्कि उस 'द्रविड़ किले' को बचाने के लिए है जिसे पिछले छह दशकों में पेरियार, अन्नादुराई, करुणानिधि और एम.जी.आर. ने अपने खून-पसीने से सींचा है।
दोनों ही खेमे इस कड़वी हकीकत को भांप चुके हैं कि सुपरस्टार विजय का उदय और उनके पीछे भाजपा की परोक्ष 'इंजीनियरिंग' केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि राज्य से पारंपरिक द्रविड़ राजनीति के समूल सफाए की कोशिश है।
मंथन के तीन प्रमुख बिंदु:
1. अस्तित्व की सामूहिक लड़ाई: DMK और AIADMK के रणनीतिकारों का मानना है कि यदि इस समय विजय (TVK) की अल्पमत सरकार भाजपा के समर्थन या AIADMK के टूटे हुए धड़े के सहारे बन जाती है, तो यह द्रविड़ राजनीति के 'ताबूत में आखिरी कील' साबित होगी। इसलिए, दोनों दल एक-दूसरे के विधायकों को तोड़ने के बजाय उन्हें 'सुरक्षित' रखने में एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं।
2. 'ऑपरेशन लोटस' की काट: AIADMK नेतृत्व को डर है कि दिल्ली के इशारे पर उनके विधायकों को पाला बदलने के लिए मजबूर किया जा सकता है। ऐसे में DMK द्वारा अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी को नैतिक समर्थन देना यह दर्शाता है कि जब बात 'बाहरी हस्तक्षेप' की आती है, तो तमिलनाडु की मिट्टी अपनी पहचान के लिए एकजुट हो जाती है।
3. राष्ट्रपति शासन को 'सॉफ्ट लैंडिंग' मानना: राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस मंथन का निचोड़ यह है कि दोनों ही दल विजय को सत्ता सौंपने के बजाय राष्ट्रपति शासन को बेहतर विकल्प मान रहे हैं। उनकी साझा रणनीति यह है कि किसी तरह इस कार्यकाल को शून्य घोषित कराकर राज्य को फिर से चुनाव की ओर धकेला जाए, ताकि उन्हें संभलने और अपनी खोई हुई ज़मीन वापस पाने का समय मिल सके।
यह मंथन साबित करता है कि तमिलनाडु की राजनीति में भले ही तलवारें खिंची हों, लेकिन जब बात 'द्रविड़ अस्मिता' की आती है, तो यह किला बचाने के लिए धुर विरोधी भी एक जाजम पर बैठने से गुरेज नहीं करते।
विचारधारा बनाम जोड़-तोड़: एक अघोषित 'द्रविड़ संधि'
मौजूदा संकट में सबसे दिलचस्प पहलू DMK और AIADMK के बीच बढ़ती नजदीकियां हैं। खबरें हैं कि दोनों पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी अपने-अपने विधायकों को बचाने के लिए एक-दूसरे के संपर्क में हैं।
• अस्तित्व का संकट: यह मेल-मिलाप किसी गठबंधन के लिए नहीं, बल्कि तीसरे पक्ष (विजय) और उसके पीछे खड़ी भाजपा की रणनीति को विफल करने के लिए है।
• विधायकों की बाड़ेबंदी: भाजपा के इशारे पर AIADMK के एक धड़े के टूटने की आशंका ने ईपीएस (EPS) को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया है। वहीं, स्टालिन की हार के बावजूद DMK अपने सहयोगियों (कांग्रेस और लेफ्ट) को एकजुट रखकर यह संदेश दे रही है कि द्रविड़ विचारधारा में सेंध लगाना इतना आसान नहीं।
क्या राष्ट्रपति शासन ही अंतिम विकल्प है?
1988 में जब जानकी सरकार गिरी, तो केंद्र ने अनुच्छेद 356 का प्रयोग कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया था। आज के हालात भी इसी ओर बढ़ते दिख रहे हैं:
1. विजय के पास संख्या बल का अभाव: विजय को 10-12 विधायकों का समर्थन नहीं मिल पा रहा है।
2. सहयोगियों का अविश्वास: DMK के साथी दल वैचारिक कारणों से विजय के साथ जाने को तैयार नहीं हैं।
3. अस्थिरता का डर: राज्यपाल किसी ऐसी अल्पमत सरकार को शपथ दिलाने के पक्ष में नहीं दिख रहे, जो सदन के पटल पर हिंसा या खरीद-फरोख्त का कारण बने।
इतिहास का सबक
राजनीतिक गलियारों में चर्चा गरम है कि अगर अगले 48 घंटों में कोई चमत्कारिक गठबंधन सामने नहीं आता, तो तमिलनाडु एक बार फिर राष्ट्रपति शासन की गोद में होगा। 1988 में राष्ट्रपति शासन के बाद हुए चुनावों ने जयललिता के रूप में एक नया सूरज उगाया था। क्या 2026 का यह गतिरोध भी किसी नए नेतृत्व की मुकम्मल ताजपोशी के लिए ज़मीन तैयार कर रहा है, या फिर यह द्रविड़ राजनीति के सबसे पुराने किलों के ढहने की शुरुआत है?
फिलहाल, चेन्नई के आसमान में मंडराते अनिश्चितता के बादल यही कह रहे हैं कि इतिहास खुद को दोहराने के लिए पूरी तरह तैयार है।