हम फर्स्ट, हम फर्स्ट... Thalpathy Vijay को समर्थन देने के लिये दूसरे दलों में मची मारामारी, आखिर क्या है वजह?
तमिलनाडु में विजय की पार्टी टीवीके के सबसे बड़े दल के रूप में उभरते ही सियासी समीकरण तेजी से बदल गए हैं। कांग्रेस और एआईएडीएमके सहित कई दल उनके समर्थन में आगे आने को तैयार हैं। इसके पीछे विचारधारा से ज्यादा राजनीतिक अस्तित्व की चिंता है। आशंका है कि अगर सरकार नहीं बनी और दोबारा चुनाव हुए, तो टीवीके और बड़े बहुमत के साथ लौट सकती है।
तमिलनाडु की सियासत में इस समय एक ही नाम की गूंज है और वह है अभिनेता से राजनेता बने विजय और उनकी पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK)। हालिया विधानसभा चुनाव के नतीजों ने राज्य की पारंपरिक राजनीति की नींव हिला दी है। 108 सीटें जीतकर TVK सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है और हालांकि वह बहुमत के जादुई आंकड़े से महज 10 कदम दूर रह गई, लेकिन इस "अधूरी जीत" ने राज्य में एक ऐसी सियासी हलचल पैदा कर दी है जिसे संभालना पुराने धुरंधरों के लिए भी चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। कांग्रेस से लेकर एआईएडीएमके (AIADMK) तक, जो दल कल तक विजय को एक नौसिखिया मान रहे थे, आज उनके साथ हाथ मिलाने के लिए बेताब नजर आ रहे हैं।
सत्ता के केंद्र में 'थलापति' विजय और गठबंधन की नई उम्मीदें
4 मई को आए चुनाव परिणामों के बाद से ही चेन्नई के पनैयूर स्थित विजय के आवास पर बैठकों का सिलसिला थमा नहीं है। सबसे रोचक मोड़ तब आया जब विजय के पिता एस.ए. चंद्रशेखर ने खुद आगे बढ़कर कांग्रेस को गठबंधन का न्योता दे दिया। उनके इस कदम ने साफ कर दिया कि TVK अब सिर्फ एक क्षेत्रीय ताकत नहीं बल्कि सरकार बनाने की गंभीर दावेदार है। कांग्रेस के लिए यह प्रस्ताव किसी संजीवनी से कम नहीं है क्योंकि पार्टी 1967 के बाद से तमिलनाडु में सत्ता से दूर रही है और हमेशा डीएमके के साये में ही चुनाव लड़ती आई है। अब दिल्ली में मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी जैसे शीर्ष नेताओं की मौजूदगी में इस बात पर मंथन हो रहा है कि क्या पुराने साथी डीएमके का साथ छोड़कर एक नए और उभरते नेतृत्व पर दांव लगाना सुरक्षित होगा।
अस्तित्व की लड़ाई और पुराने दलों का डर
इस राजनीतिक उठापटक के पीछे केवल विचारधारा का मेल नहीं बल्कि राजनीतिक अस्तित्व को बचाने की एक बड़ी जद्दोजहद छिपी है। एआईएडीएमके की स्थिति इस समय सबसे नाजुक है क्योंकि 2021 में सत्ता गंवाने के बाद पार्टी इस बार तीसरे स्थान पर खिसक गई है। पार्टी की वरिष्ठ नेता लीमा रोज मार्टिन की सार्वजनिक टिप्पणियों ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि अंदरूनी तौर पर विजय के साथ जाने की खिचड़ी पक रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर एआईएडीएमके के नेतृत्व ने जल्द फैसला नहीं लिया, तो पार्टी में टूट की संभावना बढ़ जाएगी क्योंकि विधायक सत्ता से बाहर रहने का जोखिम नहीं उठाना चाहते।
दिल्ली वाला 'केजरीवाल मॉडल' और दोबारा चुनाव का खौफ
तमिलनाडु के तमाम स्थापित दलों को एक ही बात का सबसे ज्यादा डर सता रहा है और वह है दोबारा चुनाव की स्थिति। इस स्थिति की तुलना 2013 के दिल्ली चुनाव से की जा रही है, जहां अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने सत्ता में आकर ऐसी पकड़ बनाई कि बाकी दल हाशिए पर चले गए। तमिलनाडु के क्षेत्रीय दलों जैसे पीएमके, एमएमके और वीसीके को डर है कि अगर इस वक्त विजय को सरकार बनाने का मौका नहीं मिला और प्रदेश में राष्ट्रपति शासन या दोबारा चुनाव की नौबत आई, तो विजय सहानुभूति की लहर पर सवार होकर प्रचंड बहुमत के साथ लौट सकते हैं। ऐसी स्थिति में बाकी दलों के लिए राजनीति में जगह ही नहीं बचेगी।
नई सरकार की चुनौतियों भरा भविष्य
भारतीय जनता पार्टी की भूमिका भी इस खेल में पर्दे के पीछे से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। रिपोर्ट्स की मानें तो बीजेपी नहीं चाहती कि कांग्रेस और वामपंथी दलों के सहारे विजय सत्ता में आएं, इसलिए वह एआईएडीएमके को टीवीके के करीब लाने के लिए प्रेरित कर सकती है। फिलहाल स्थिति ऐसी है कि विजय तमिलनाडु की राजनीति का वह ध्रुव बन चुके हैं जिसके चारों ओर पूरी सत्ता घूम रही है। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि क्या तमिलनाडु एक नए युग की शुरुआत करेगा या फिर गठबंधन की राजनीति में कोई नया पेंच फंसेगा। लेकिन एक बात साफ है कि अब विजय का समर्थन करना कई दलों के लिए केवल विकल्प नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक मजबूरी बन गया है।