UAPA Bail Debate in SC: क्या कसाब और हाफिज सईद को भी मिल जाएगी बेल? यूएपीए में जमानत को लेकर केंद्र का SC से सवाल

UAPA Bail Debate in SC: सुप्रीम कोर्ट में इन दिनों आतंकवाद निरोधी कानून यूएपीए के तहत जमानत के नियमों को लेकर बड़ी कानूनी बहस चल रही है। केंद्र सरकार ने कोर्ट में ऐसा सवाल उठाया है, जिसने राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच बहस को और तेज कर दिया है।

Update:2026-05-23 09:27 IST

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UAPA Bail Debate in SC: सुप्रीम कोर्ट में इन दिनों आतंकवाद निरोधी कानून यूएपीए के तहत जमानत के नियमों को लेकर बड़ी कानूनी बहस चल रही है। केंद्र सरकार ने कोर्ट में ऐसा सवाल उठाया है, जिसने राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच बहस को और तेज कर दिया है। यहां केंद्र ने अदालत से पूछा है कि अगर सिर्फ ट्रायल में देरी को जमानत का आधार मान लिया जाए, तो क्या अजमल कसाब और हाफिज सईद जैसे आतंकियों को भी बेल दे दी जाएगी?

दरअसल यह मामला सिर्फ कुछ आरोपियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर उन सैकड़ों विचाराधीन कैदियों पर पड़ सकता है, जो यूएपीए के तहत सालों से जेल में बंद हैं और जिनका ट्रायल अभी तक पूरा नहीं हुआ है। वहीं सुप्रीम कोर्ट में चल रही यह बहस अब देश की न्याय व्यवस्था के लिए एक अहम मोड़ बनती दिख रही है।

केंद्र सरकार ने कोर्ट में क्या दलील दी?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट की दो अलग-अलग बेंचों ने यूएपीए के तहत जमानत को लेकर अलग-अलग राय दी है। हाल ही में एक बेंच ने कहा था कि अगर किसी मामले में ट्रायल में बहुत ज्यादा देरी हो रही है, तो आरोपी को जमानत मिलनी चाहिए। इसी बात पर केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कड़ा विरोध दर्ज कराया।

यहां एसवी राजू ने कोर्ट में कहा कि हर आरोपी को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता। उन्होंने कहा कि कई मामलों में गवाहों की संख्या बहुत ज्यादा होती है और सबूत जुटाने में लंबा समय लगता है। ऐसे में केवल देरी के आधार पर जमानत देना सही नहीं होगा।

उन्होंने कोर्ट में अजमल कसाब का उदाहरण देते हुए कहा कि उसके मामले में भी बड़ी संख्या में गवाह थे, जिसकी वजह से ट्रायल लंबा चला। अगर सिर्फ देरी को आधार मान लिया जाए तो क्या उसे भी जमानत दे दी जाती? इसी तरह उन्होंने हाफिज सईद का भी जिक्र करते हुए कहा कि अगर उसे पाकिस्तान से भारत लाया जाए और ट्रायल में पांच साल लग जाएं, तो क्या उसे भी बेल मिल जानी चाहिए?

नजरअंदाज नहीं की जा सकती अपराध की गंभीरता

रिपोर्ट्स के मुताबिक, एएसजी एसवी राजू ने जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की बेंच के सामने कहा कि जमानत देते समय सिर्फ समय नहीं, बल्कि आरोपी की भूमिका और अपराध की गंभीरता भी देखी जानी चाहिए।

उन्होंने 2020 के दिल्ली दंगा मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि कोर्ट ने कुछ आरोपियों को जमानत दी थी, लेकिन उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे आरोपियों को उनकी कथित गंभीर भूमिका के चलते राहत नहीं मिली थी। उन्होंने यह भी कहा कि जमानत को किसी गणितीय फॉर्मूले की तरह नहीं देखा जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट की दो बेंचों के फैसलों में टकराव

वहीं यहां यूएपीए मामलों में जमानत को लेकर सुप्रीम कोर्ट की ही दो बेंचों के फैसले आपस में टकरा रहे हैं। यही वजह है कि यह विवाद और बड़ा हो गया है।

यहां एक तरफ जहां पहले के फैसलों में कहा गया कि ट्रायल में लंबी देरी होने पर आरोपी को राहत दी जा सकती है, वहीं दूसरी तरफ कुछ मामलों में कोर्ट ने अपराध की गंभीरता को ज्यादा अहम माना और जमानत देने से इनकार कर दिया।

अब बड़ी बेंच करेगी अंतिम फैसला

जिसके बाद अब इस कानूनी विवाद को सुलझाने के लिए जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने 22 मई 2026 को इस मामले को सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच के पास भेज दिया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक अब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया इस मामले की सुनवाई के लिए नई बेंच का गठन करेंगे। माना जा रहा है कि बड़ी बेंच का फैसला भविष्य में यूएपीए के तहत जमानत के नियम तय करेगा।

हालांकि, इस बीच कोर्ट ने 2020 दिल्ली दंगा मामले के दो अन्य आरोपियों तस्लीम अहमद और खालिद सैफी को मामले के अंतिम फैसले तक छह महीने की अंतरिम जमानत दे दी है।

यूएपीए मामलों की पूरी टाइमलाइन

गौरतलब हो कि यूएपीए में जमानत को लेकर मौजूदा विवाद की शुरुआत पिछले कुछ सालों के अहम फैसलों से जुड़ी हुई है। यहां साल 2021 में केए नजीब केस में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। कोर्ट ने कहा था कि अगर ट्रायल में बहुत ज्यादा देरी हो रही हो, तो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी को राहत दी जा सकती है।

इसके बाद जनवरी 2026 में दिल्ली दंगा मामले के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। कोर्ट ने कहा था कि सिर्फ लंबा समय बीत जाने से जमानत नहीं दी जा सकती, खासकर जब आरोप गंभीर हों।

फिर मई 2026 में अंद्राबी केस में दूसरी बेंच ने कहा कि ट्रायल में देरी होने पर जमानत मिलनी चाहिए। इसी फैसले के बाद दोनों बेंचों की राय में विरोधाभास साफ तौर पर सामने आ गया। जिसके बाद अब 22 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे विवाद को अंतिम फैसले के लिए बड़ी बेंच के पास भेज दिया है।

क्या है यूएपीए और इतनी मुश्किल क्यों होती है जमानत?

दरअसल यूएपीए यानी गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम भारत का प्रमुख आतंकवाद निरोधी कानून है। इसका उद्देश्य देश की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ होने वाली आतंकी और गैरकानूनी गतिविधियों को रोकना है।

इस कानून की धारा 43डी(5) जमानत को बेहद सख्त बनाती है। इसके मुताबिक अगर जांच एजेंसी द्वारा पेश दस्तावेजों को देखकर कोर्ट को लगता है कि आरोप पहली नजर में सही हैं, तो आरोपी को आसानी से जमानत नहीं मिल सकती।

यही वजह है कि यूएपीए मामलों में बेल मिलना बेहद कठिन माना जाता है। हालांकि सुप्रीम Court के पुराने फैसलों में यह भी कहा गया है कि अगर ट्रायल बहुत ज्यादा लंबा खिंच जाए और आरोपी वर्षों तक बिना सजा जेल में रहे, तो उसे मौलिक अधिकारों के तहत राहत दी जा सकती है।

वहीं अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच पर टिकी है, जिसका फैसला तय करेगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा।

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