सिविल सर्विस की परंपरा लाला लाजपत राय, लाल बहादुर शात्री से योगी आदित्यनाथ तक
छोटी-छोटी मगर मोटी बातें: सिविल सेवा दिवस पर शास्त्री जी की सादगी और योगी आदित्यनाथ के 'स्टील फ्रेम' के जरिए लोक सेवा के वास्तविक चरित्र का विश्लेषण।
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Chhoti Chhoti Magar Moti Baaten: 21 अप्रैल को जब हम 'नेशनल सिविल सर्विस डे' मनाते हैं, तो यह केवल फाइलों का उत्सव नहीं, बल्कि उस 'चरित्र' को याद करने का दिन है जिसे लाल बहादुर शास्त्री ने जिया और आज योगी आदित्यनाथ जिसे नए मानक दे रहे हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि सेवा का असली 'इन्सिग्निया' रसूख नहीं, बल्कि आम जन के प्रति समानुभूति है।
आज 21 अप्रैल है। कैलेंडर की तारीखों में इसे 'नेशनल सिविल सर्विस डे' के रूप में दर्ज किया गया है। सरकारी गलियारों में सरदार वल्लभभाई पटेल के उस ऐतिहासिक भाषण को याद किया जाएगा, जिसमें उन्होंने देश के प्रशासनिक ढांचे को 'स्टील फ्रेम' कहा था। लेकिन जब मैं इस दिन के बारे में सोचता हूँ, तो मेरी आँखों के सामने फाइलों के ढेर नहीं, बल्कि प्रयागराज की वह धूल भरी गलियाँ और लोकसेवक मंडल की वह दरी आती है, जिस पर बैठकर राष्ट्र निर्माण का स्वप्न बुना गया था।
सेवा: पद नहीं, एक 'चरित्र'
आज 'सिविल सर्विस' का अर्थ केवल रसूख से जोड़ लिया गया है। लेकिन लाला लाजपत राय ने जब लोकसेवक मंडल की स्थापना की थी, तो उनका दर्शन स्पष्ट था— "पुरस्कार की चिंता किए बिना, दूसरों के दुखों को हरना ही हमारी असली पहचान (Insignia) होनी चाहिए।" यही वह दौर था जब लालबहादुर शास्त्री जी इसके अध्यक्ष थे। कल्याणी देवी मोहल्ले में मेरी माताजी शारदा वाजपेयी, शास्त्री जी की धर्मपत्नी ललिता शास्त्री जी के साथ उन मीटिंग्स का हिस्सा बनती थीं, जहाँ मकसद पद पाना नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना था।
"कोट के पीछे का फटा कुर्ता: पद का अहंकार या सेवा का संस्कार?"
"छोटी-छोटी और मोटी बातें के इस अंक में, मैं आज के उन अधिकारियों और नीति-निर्धारकों को एक आईना दिखाना चाहता हूँ जो लाल बत्ती और ब्रैंडेड रुतबे में लोक सेवा ढूंढते हैं। एक वाकया याद आता है, जब देश के तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी एक फटे हुए कुर्ते पर कोट पहनकर सार्वजनिक कार्यक्रम में जाने लगे। पत्नी ललिता शास्त्री ने टोका तो शास्त्री जी का जवाब आज के हर 'सिविल सर्वेंट' के लिए एक 'गाइडबुक' है। उन्होंने कहा था— 'मेरा देश गरीब है, अगर उनका मंत्री भी वैसा ही पहन ले तो शर्म कैसी? कम से कम मैं उनके जैसा महसूस तो कर सकूँगा।'"
"यही वह 'समानुभूति' (Empathy) है, जिसे आज की सिविल सर्विस की किताबों में पढ़ाया तो जाता है, लेकिन शास्त्री जी ने इसे जिया था। जब मेरी माताजी शारदा वाजपेयी, ललिता जी के साथ लोकसेवक मंडल के कार्यों में जुटी थीं, तब उन्होंने करीब से देखा था कि सादगी कोई दिखावा नहीं, बल्कि एक चरित्र था। आज जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी की सादगी और उनके कठोर प्रशासनिक निर्णयों को हम देखते हैं, तो उसमें शास्त्री जी वाली वही परंपरा झलकती है—जहाँ पद का उपयोग स्वयं के वैभव के लिए नहीं, बल्कि जनता के स्वाभिमान के लिए किया जाता है।"
नागरिक सेवा के महान मानक
नागरिक सेवा का यह पाठ केवल दफ्तरों से नहीं, बल्कि हमारे आध्यात्मिक और वैचारिक केंद्रों से भी आया है। मां आनंदमयी और मां अमृतानंदमयी जैसे करुणा के प्रतिमानों ने सिखाया कि मनुष्य की सेवा ही ईश्वर की सेवा है। राजनीति और प्रशासन में भी राजमंगल पाण्डे, ब्रह्मदत्त, प्रो. वासुदेव सिंह और विष्णुकांत शास्त्री जैसे महापुरुषों ने अपनी शुचिता से नागरिक सेवा के ऐसे मानक स्थापित किए, जहाँ 'सत्ता' साधन थी और 'लोक' ही साध्य था।
योगी आदित्यनाथ: स्टील फ्रेम के नए मानक
आज के दौर में जब हम 'स्टील फ्रेम' की बात करते हैं, तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और गोरक्ष पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ एक नई मिसाल पेश कर रहे हैं। सादगी की प्रतिमूर्ति योगी जी ने मुख्यमंत्री के रूप में पूरे प्रदेश को नागरिक सर्विस का वह पाठ पढ़ाया है, जिसने प्रशासन के पारंपरिक ढांचे को जनता के प्रति जवाबदेह बनाया है। एक संन्यासी का कठोर अनुशासन और लोक-कल्याण का संकल्प आज 'स्टील फ्रेम' के नए मानक गढ़ रहा है, जहाँ शासन का अर्थ केवल आदेश देना नहीं, बल्कि व्यवस्था को पारदर्शी और लोक-हितकारी बनाना है।
जब साहित्य और प्रशासन एक हुए
प्रयागराज की उस विरासत में प्रशासन का 'स्टील फ्रेम' इसलिए मजबूत था क्योंकि उसे साहित्य की नमी मिल रही थी। मेरे पिताजी स्व. मधुसूदन वाजपेयी जब हरिद्वार के सप्तर्षि आश्रम की प्राचार्य की पदवी छोड़कर मुंशी प्रेमचंद की सरस्वती प्रेस की विरासत सहेजने आए, तो उनका जुड़ाव पंडित देवीदत्त शुक्ल और रमादत्त शुक्ल जैसे मनीषियों से हुआ। विनोद चंद्र शर्मा 'विनोद' जैसे अधिकारी इसके उदाहरण थे, जो मुख्य सचिव जैसे पद पर रहकर भी कवि हृदय बने रहे।
लखनऊ के हिंदी संस्थान में वृतशील शर्मा जी के सहयोग से हमने 'हिंदी के पाणिनी' आचार्य किशोरीदास वाजपेयी की स्मृति में जो आयोजन किया था, उसमें तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी का केवल उसी कार्यक्रम के लिए आना, ज्ञान और सेवा के प्रति उसी सम्मान का प्रतीक था।
'इनसिग्निया' की वापसी
सरदार पटेल का 'स्टील फ्रेम' तब तक सुरक्षित नहीं है, जब तक उसमें लाला लाजपत राय के संस्कार और योगी आदित्यनाथ जैसी सादगी व कठोर संकल्प का समावेश न हो। 'नेशनल सिविल सर्विस डे' की सार्थकता इसी में है कि हम प्रशासन को सत्ता के गलियारों से निकालकर फिर से उस 'लोक सेवा' की भूली-बिसरी परंपरा से जोड़ें, जहाँ सेवा ही एकमात्र 'इन्सिग्निया' थी।
आइए, आज के दिन हम उस परंपरा को याद करें जहाँ पद केवल एक जिम्मेदारी थी और समाज निर्माण हमारा साझा धर्म।