Opinion: जब सुख देते हैं, जिंदगी को अर्थ
Opinion: “‘जब सुख देते हैं, जिंदगी को अर्थ’ लेख में जीवन की खुशी और सार्थकता के बीच संतुलन पर विचार किया गया है। जानें कैसे सुख और अर्थ दोनों मिलकर एक बेहतर जीवन का निर्माण करते हैं।”
Meaning of Life (Image Credit-Social Media)
Opinion: कई बार जिंदगी कुछ यों हमारे इसकी छोटी-छोटी बातें हमें खुशियां दे रही होती हैं, वे बेशक ज्यादा अर्थपूर्ण या सार्थक न हों। लेकिन, कई पल ऐसे आते हैं, जब हम जिंदगी में कुछ अर्थपूर्ण कर रहे होते हैं, लेकिन शायद उससे वैसी खुशी नहीं मिल रही होती। उस स्थिति की कल्पना करें जब आप अपने परिवार की खुशियों के लिए किसी दूसरे शहर में नौकरी कर रहे हों। ऊपर जो बातें कही गई हैं, वे क्रमशः सुखद निरर्थकता और दुखद सार्थकता के उदाहरण हैं। इन दोनों अनुभवों में फर्क यह है कि सुखद अनुभव बस 'खुशी' का एहसास कराते हैं, जबकि सार्थक अनुभव सम्मान और जरूरत से जुड़े होते हैं।
दुनिया के तमाम धर्म वह राह सुझाते हैं, जिसमें खुशियां और सार्थकता, दोनों साथ मिलकर चल सकती हैं। लेकिन जो धार्मिक नहीं हैं, उनके लिए कौन-सी राह बचती है? जो सुखवादी हैं, वे सुख को ही जीवन का लक्ष्य मानते हैं। लेकिन जो ज्यादा गंभीर किस्म के लोग होंगे, वे सार्थकता में ही असल सुख मानेंगे। हालांकि मैं अच्छा जीवन उसे मानता हूं, जिसमें खुशी खुशी और सार्थकता, दोनों हो। सवाल है कि यह कैसे मुमकिन है। सबसे अच्छा यह है कि जिंदगी जिस रूप में सामने आती हो, उसे वैसे ही स्वीकारना चाहिए। अब अस्पताल की नर्स का उदाहरण लें। वह रोज लोगों को जीते और मरते देखती है। लेकिन, उसके बाद वह उठता अपने परिवार के पास लौटती है, शॉपिंग करने मॉल जाती है, घूमती है या अपने मोबाइल पर गेम खेलती है। एक दूसरा तरीका यह हो सकता है कि ऐसे जीवन की तलाश की जाए, जिसमें खुशी और अर्थ, दोनों एक साथ हों।
ऐसे कई काम हो सकते हैं, जिनमें मेहनत से सुख और त्याग के बगैर भी सार्थकता का अनुभव होता हो। अमूमन यह समझा जाता है कि खुशी का मतलब होता है वे काम, जो आप अपने लिए करते हैं, जबकि सार्थक काम वे होते हैं, जो आप दूसरों के लिए करते हैं। आपने कोई वाद्य यंत्र बजाना सीखा हो, ताकि आप खूबसूरत गीत बना सकें, या आप बच्चों से बातचीत के दौरान उन्हें सिखा रहे हों कि जीवन को बेहतर और उत्पादक ढंग से कैसे देखा जा सकता है, या लोगों के एक समूह को बेहतर ढंग से काम करने के लिए प्रेरित कर रहे हों, या पाठकों के लिए इस विषय पर निबंध लिख रहे हों कि दोनों मूल्यों यानी खुशी और सार्थकता को एक साथ कैसे ध्यान में रखा जा सकता है। मेरे कहने का यह आशय नहीं है कि नसों को नौकरी छोड़ देनी चाहिए, या किसी को आइस्क्रीम या चॉकलेट नहीं खानी चाहिए। लेकिन अगर आप अपनी जिंदगी में सुख और अर्थ, दोनों की चाह रखते हैं, तो फिर या तो आपको जिंदगी जिस रूप में सामने आ रही हो, उसे वैसे ही जीने की कला सीखनी होगी या फिर आपको उन कामों की पहचान करनी होगी, जहां सुख और अर्थ, दोनों मिलते हैं।
( साभार ‘अमर उजाला ‘। लेखक जोहान्सबर्ग यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हैं।)
थेडस मेट्ज