पूजा से आगे प्रार्थना
Prayer vs Worship: किसी मंदिर में हजार दीप जलाए जाएँ, लेकिन हृदय में करुणा न हो, तो वह पूजा ईश्वर तक नहीं पहुँचती...
Prayer vs Worship
Prayer vs Worship: मनुष्य ने जब पहली बार आकाश की ओर देखा होगा, जब उसने अपने से बड़ी किसी शक्ति की उपस्थिति को महसूस किया होगा, तभी से उसकी आत्मा में दो भाव एक साथ जन्मे होंगे—श्रद्धा और संवाद। श्रद्धा ने पूजा को जन्म दिया और संवाद ने प्रार्थना को। हजारों वर्षों से मनुष्य कभी मंदिरों में दीप जलाता रहा है। कभी मस्जिदों में सिर झुकाता रहा है। कभी गिरजाघरों में घुटनों के बल बैठता रहा है। कभी किसी निर्जन वन में आँखें मूँदकर उस अदृश्य सत्ता से बात करता रहा है जिसे वह ईश्वर, परमात्मा, अल्लाह, गॉड या वाहेगुरु कहता है।
लेकिन यदि ध्यान से देखा जाए तो पूजा और प्रार्थना एक नहीं हैं। दोनों एक ही वृक्ष की दो शाखाएँ अवश्य हैं। पर उनकी प्रकृति अलग है। पूजा श्रद्धा की अभिव्यक्ति है। जबकि प्रार्थना आत्मा की आवाज़। पूजा में हम ईश्वर के सामने खड़े होते हैं। प्रार्थना में ईश्वर हमारे भीतर खड़ा हो जाता है।
सुबह के किसी मंदिर में जाइए। घंटियों की ध्वनि है।धूप की सुगंध है। दीपक की लौ है। फूल हैं।मंत्र हैं और अनेक लोग हैं, जो अपनी-अपनी श्रद्धा लेकर आए हैं। यह सब पूजा है। यह मनुष्य की उस पुरातन आकांक्षा का उत्सव है, जिसमें वह अपने से महान किसी अस्तित्व का सम्मान करता है। पूजा का अर्थ केवल कर्मकांड नहीं है। उसके पीछे एक गहरा मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्य छिपा है। मनुष्य जब किसी के सामने झुकता है, तो उसका अहंकार थोड़ा छोटा होता है। जब वह अपने हाथों से फूल अर्पित करता है, तो वह प्रतीकात्मक रूप से अपने भीतर के अहं को भी अर्पित करने का प्रयास करता है।
लेकिन उसी मंदिर के किसी कोने में बैठा एक वृद्ध व्यक्ति आँखें बंद किए हुए मौन है। उसके हाथ में न फूल है, न थाली। उसके होंठ भी नहीं हिल रहे। फिर भी वह ईश्वर के सबसे निकट हो सकता है। क्योंकि वह प्रार्थना कर रहा है। प्रार्थना शब्दों का विषय नहीं है। हृदय की अवस्था है। वह तब भी हो सकती है जब कोई शब्द न बोला जाए। कभी-कभी आँख से गिरा एक आँसू पूरी रामायण से बड़ी प्रार्थना बन जाता है। कभी किसी पीड़ित के लिए निकली एक सच्ची करुणा हजार दीपकों से अधिक उजाला कर देती है। प्रार्थना वह क्षण है जब मनुष्य अपने सारे आवरण उतार देता है।और जैसा है, वैसा ही ईश्वर के सामने उपस्थित हो जाता है।
यही कारण है कि संसार के सभी महान आध्यात्मिक पुरुषों ने प्रार्थना को विशेष महत्व दिया। बुद्ध ने कर्मकांडों से अधिक जागरूकता पर बल दिया। महावीर ने बाहरी आडंबरों से अधिक आत्मशुद्धि को महत्व दिया। कबीर ने कहा कि ईश्वर पत्थर की मूर्तियों में कम और निर्मल हृदयों में अधिक मिलते हैं। गुरु नानक ने नाम-स्मरण को पूजा की आत्मा बताया। महात्मा गांधी कहते थे कि प्रार्थना आत्मा की पुकार है, वह याचना नहीं, आत्मिक आवश्यकता है।
यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या पूजा आवश्यक नहीं है? निश्चित रूप से है। पूजा मनुष्य को अनुशासन देती है। वह जीवन में पवित्रता और नियमितता लाती है। पूजा स्मरण कराती है कि संसार केवल भोग की वस्तु नहीं है। उसके पीछे एक आध्यात्मिक आयाम भी है। लेकिन पूजा तब तक अधूरी है, जब तक उसमें प्रार्थना का प्राण न हो।
किसी मंदिर में हजार दीप जलाए जाएँ। लेकिन हृदय में करुणा न हो, तो वह पूजा ईश्वर तक नहीं पहुँचती। दूसरी ओर कोई व्यक्ति किसी अंधेरी रात में चुपचाप बैठकर केवल इतना कह दे—“प्रभु, मुझे सही मार्ग दिखाना”—तो यह प्रार्थना सीधे उसकी आत्मा को स्पर्श कर सकती है।
धर्मग्रंथों का भी यही संदेश है। गीता में कृष्ण अर्जुन से भव्य अनुष्ठानों की अपेक्षा नहीं करते। वे केवल प्रेम और समर्पण की बात करते हैं। वे कहते हैं कि प्रेम से अर्पित एक पत्ता, एक फूल, एक फल या एक बूंद जल भी उन्हें स्वीकार है। यहाँ वस्तु नहीं, भावना महत्वपूर्ण है। ईश्वर को हमारे हाथों में पकड़े फूलों से अधिक हमारे हृदय में खिले फूल प्रिय हैं।
वास्तव में पूजा और प्रार्थना का संबंध शरीर और आत्मा जैसा है। पूजा शरीर है। प्रार्थना उसकी आत्मा। शरीर के बिना आत्मा दिखाई नहीं देती।आत्मा के बिना शरीर जीवित नहीं रहता। इसलिए श्रेष्ठ स्थिति वह है जहाँ पूजा प्रार्थना में बदल जाए और प्रार्थना जीवन बन जाए।
जब दीपक जलाते समय मन में कृतज्ञता जागे, वह पूजा भी प्रार्थना बन जाती है। जब किसी भूखे को भोजन कराते समय भीतर ईश्वर का स्मरण हो, वह सेवा भी पूजा बन जाती है। जब किसी शत्रु के लिए भी शुभकामना निकल जाए, वह प्रार्थना अपने सर्वोच्च रूप में पहुँच जाती है।
शायद इसलिए संतों ने कहा है कि ईश्वर को न पूजा चाहिए, न प्रार्थना। उन्हें केवल प्रेम चाहिए। पूजा प्रेम की भाषा है और प्रार्थना प्रेम की आवाज़। जहाँ प्रेम है, वहाँ दोनों स्वतः उपस्थित हो जाते हैं। मनुष्य के आध्यात्मिक विकास की यात्रा भी इसी सत्य की यात्रा है। वह पहले पूजा करता है, फिर प्रार्थना करना सीखता है। और अंततः उस अवस्था में पहुँचता है जहाँ उसका पूरा जीवन ही प्रार्थना बन जाता है। उसके कर्म पूजा बन जाते हैं, उसके विचार प्रार्थना बन जाते हैं और उसका अस्तित्व ईश्वर के प्रति एक निरंतर समर्पण बन जाता है।
तब मंदिर केवल पत्थर की इमारत नहीं रहता, मनुष्य का हृदय ही मंदिर बन जाता है। तब घंटियाँ बाहर नहीं बजतीं, भीतर बजती हैं। तब ईश्वर को खोजने की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि वह हर श्वास में अनुभव होने लगता है। यही पूजा का चरम है, यही प्रार्थना का रहस्य है, और शायद यही धर्म का अंतिम सत्य भी।
(लेखक पत्रकार हैं।)