निर्णयों के बाहर खड़ी स्त्रियाँ

Women Empowerment: यह विचारोत्तेजक लेख स्त्रियों के जीवन में निर्णय लेने की स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय के अधिकार और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच उनके संघर्ष को संवेदनशीलता से प्रस्तुत करता है।

Update:2026-06-17 20:17 IST

Women Empowerment (Image Credit-Social Media)

निर्णयों के बाहर खड़ी स्त्रियाँ

कभी-कभी सोचती हूँ, अगर हर स्त्री को

अपने जीवन के निर्णय लेने की पूर्ण स्वतंत्रता मिले,

तो उनकी दुनिया कैसी होगी? कितना कुछ वह

अपने लिए चुनेगी।

अपनी पसंद की पढ़ाई, अपना काम,

अपना शहर, अपना जीवन जीने का ढंग।

वह शायद पहली बार अपनी इच्छाओं को अपराध नहीं समझेगी, अपने सपनों को बोझ नहीं मानेगी,

और अपने अस्तित्व को किसी रिश्ते की परिभाषा में नहीं बाँधेगी। वह अपने मन का रंग चुनेगी,

अपने समय का अर्थ चुनेगी, अपनी असहमति को बिना भय व्यक्त करेगी, और अपनी खुशी का रास्ता भी

अपनी पसंद से चुन सकेगी। लेकिन अफ़सोस,

हर स्त्री के हिस्से निर्णय नहीं आते। कुछ के हिस्से आता है। सिर्फ़ निर्णयों का पालन। वे जन्म से ही

किसी और की इच्छाओं के बीच पलती हैं,

किसी और की अपेक्षाओं के अनुसार ढलती हैं,

और धीरे-धीरे इतना अभ्यस्त हो जाती हैं

कि अपनी इच्छा की आवाज़ भी उन्हें अजनबी लगने लगती है। उनसे पूछा कम जाता है,

बताया ज़्यादा जाता है। वे जीवन भर

किसी और के निर्णयों से अपना जीवन चलाती रहती हैं।

कहाँ जाना है, क्या करना है, कैसे रहना है, कब बोलना है,और कब चुप रहना है?????

और फिर एक दिन समाज उनकी कहानी देखकर कह देता है— "उन्होंने तो कुछ किया ही नहीं।" जबकि सच्चाई यह है कि उन्होंने जीवन नहीं जिया,

उन्होंने जीवन भर निर्देशों का पालन किया।इसलिए अब, जब भी किसी स्त्री को

निर्णय लेते देखती हूँ, मुझे केवल उसका साहस नहीं दिखता, मुझे उन अनगिनत स्त्रियों की छाया भी दिखती है जो आज भी अपने ही जीवन के द्वार पर खड़ी हैं।

अविवाहित हों तो पिता की स्वीकृति का इंतज़ार,

विवाहित हों तो पति की अनुमति का इंतज़ार, और कई बार उम्र भर किसी न किसी "हाँ" की प्रतीक्षा।

जैसे उनका जीवन उनका होकर भी पूरी तरह उनका नहीं। वे आज भी । निर्णयों के भीतर नहीं, निर्णयों के बाहर खड़ी हैं। अपने ही जीवन में प्रवेश करने के लिए

किसी और की अनुमति की प्रतीक्षा करती हुईं।

"समाज की वास्तविक प्रगति तब नहीं होगी जब स्त्रियों को केवल अवसर मिलेंगे, बल्कि तब होगी जब उन्हें अपने जीवन के निर्णय लेने का पूरा विश्वास और अधिकार मिलेगा। क्योंकि कोई भी व्यक्ति तब तक पूरी तरह स्वतंत्र नहीं कहलाया जा सकता, जब तक उसके जीवन के निर्णय वास्तव में उसके अपने न हों।"..

निधि मिश्रा

शिक्षिका

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