Homemaker Salary: 30 हजार रुपये और सदियों का बकाया
Homemaker Salary: एक गृहणी जो घर बनाती है उसके इस अदृश्य काम की क्या कोई कीमत हो सकती है?
Why Supreme Court Fixed Rs 30000 Value for Homemakers Work (Photo - Newstrack AI)
Homemaker Salary: मकान और घर। एक मात्र ठंडा स्ट्रक्चर जबकि दूसरा गर्माहट भरा आशियाना जिसमें सब कुछ जीवंत होता है। जिसकी दीवारों भी बोलती हैं। दोनों में फर्क जमीन – आसमान का है। लेकिन हम फर्क करना भूल गए हैं या हमें फर्क करना बताया नहीं जाता। हो सकता है समय के साथ लोगों की परिभाषाएं बदल गईं हों, जिसमें मकान-फ्लैट-घर सब एक ही मान लिए जाते हों। घर-मकान में फर्क समझने का एक खूबसूरत पहलू है गृहणी या होम मेकर का। होम मेकर यानी घर बनाने वाली। मकान तो मिस्त्री-मजदूर बनाते हैं। लेकिन घर सिर्फ गृहणी या होम मेकर बनाती है। ऐसा हमेशा से माना जाता रहा है। आज बदलते समय में भले ही पुरुष भी घरेलू जिम्मेदारियां निभा रहे है। लेकिन भारतीय समाज में घर को घर बनाने वाली गृहणी की भूमिका अब भी नायाब है।
एक गृहणी जो घर बनाती है उसके इस अदृश्य काम की क्या कोई कीमत हो सकती है? यूं तो ये अनमोल है, ठीक वैसे ही जैसे एक अदद जिन्दगी का मोल नहीं किया जा सकता। फिर भी कुछ कानूनी मसलों को सुलझाने के क्रम में हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक व्यवस्था दी है जिसमें होम मेकर को ‘राष्ट्र निर्माता’ बताते हुए उनके घरेलू काम का मूल्य 30 हजार रुपये प्रति महीने तय किया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में घर के बिना वेतन वाले काम को आर्थिक काम माना गया है और घर की देखभाल के काम के नुकसान को मुआवज़े की व्यवस्था की गई है।
ये देखने में भले ही एक साधारण सी बात लगे लेकिन है ऐसी बात जो कानून के दायरे से कहीं आगे जाती है। क्योंकि हमने हमेशा से घर के काम को एक ऐसी चीज माना है, जो अपने आप हो जाता है। और जिनकी कोई कीमत नहीं मानी जाती है। और न कभी उसके भुगतान के बारे में कल्पना की जाती है। गृहणी की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उसके काम का कोई तय समय नहीं होता। नौकरी करने वाला व्यक्ति शाम को घर लौट आता है। दुकानदार दुकान बंद कर देता है। मजदूर की दिहाड़ी खत्म हो जाती है। लेकिन एक गृहणी का काम कभी खत्म नहीं होता। वह सुबह सबसे पहले उठती है और अक्सर रात में सबसे आखिर में सोती है। उसे रविवार नहीं मिलता, त्यौहार नहीं मिलता, मेडिकल लीव नहीं मिलती और न ही रिटायरमेंट का कोई दिन आता है। वह बीमार हो तब भी घर चलता रहे, इसकी चिंता उसे रहती है।
फिर भी हम समझते रहे हैं कि गृहणी एक आश्रित सदस्य होती है, जिसका कोई आर्थिक योगदान नहीं होता। लेकिन अदालत का यह कहना हमारी ऑंखें खोलने वाला होना चाहिए कि घर संभालने वाली महिला अपने आप में एक आर्थिक इकाई होती है, जिसके काम से परिवार और व्यापक परिप्रेक्ष्य में समूचा देश चलता है।
हम अपने ही घर में झांकें। भले ही हमारे पास खाने बनाने और साफ-सफाई के लिए हेल्पर हों। लेकिन घर का काम वहीं तक सीमित नहीं होता। उन कामों को व्यवस्थित ढंग से कराने, घर के सदस्यों की देखभाल करने तक में एक गृहणी का ही हाथ होता है। यही नहीं, गृहणी ही वह भावनात्मक और मानसिक सहारा देती हैं, जिससे दूसरे लोग अपने करियर और रोज़गार पर ध्यान दे पाते हैं। गृहणी ही वह नींव हैं जिस पर सफलताओं की इमारतें खड़ी होती हैं।
सवाल ये भी है कि आखिर अदालत ने 30 हजार रुपये का मूल्य किस तरह तय किया है? कोर्ट ने भारत के 'टाइम यूज़ सर्वे' का ज़िक्र करते हुए कहा है कि महिलाएं बिना पैसे वाले घरेलू कामों में दिन में सात घंटे से ज़्यादा समय बिताती हैं जबकि पुरुष तीन घंटे से भी कम समय लगाते हैं। महिलाएं पुरुषों की तुलना में लगभग 2.6 गुना ज़्यादा बिना पैसे वाला देखभाल और घरेलू काम करती हैं, भले ही वे घर के बाहर आर्थिक रूप से भी योगदान देती हों। कोर्ट ने उन अनुमानों का भी ज़िक्र किया जिनके अनुसार बिना पैसे वाली देखभाल और घरेलू काम भारत की जीडीपी में 15 से 17 प्रतिशत का योगदान देते हैं।
सच तो यह है कि अदालत ने गृहणी के काम का मूल्य 30 हजार रुपये तय किया है। लेकिन यह केवल कानूनी गणना है। किसी मां के रात भर जागने, किसी पत्नी के त्याग, किसी बेटी या बहू की देखभाल और किसी गृहणी द्वारा परिवार के लिए किए गए अनगिनत समझौतों का मूल्य किसी सैलरी स्लिप में नहीं समा सकता। अदालत ने कीमत तय की है, मूल्य नहीं। मूल्य तो अनमोल है। विडंबना तो ये भी है कि जिस महिला का पूरा जीवन दूसरों की जरूरतों का हिसाब रखते हुए बीत जाता है, उसके अपने श्रम का हिसाब कभी नहीं रखा जाता। परिवार की हर सफलता में उसका हिस्सा होता है। लेकिन उपलब्धियों की फेहरिस्त में उसका नाम अक्सर गायब ही मिलता है।
इस फैसले का एक सबसे अहम पहलू यह है कि कोर्ट ने माना है कि होममेकर के योगदान को सिर्फ़ घर के कामों तक सीमित नहीं किया जा सकता। होम मेकर घर में वो योगदान देती हैं जिन्हें आउटसोर्स नहीं किया जा सकता या जिनकी कीमत आसानी से नहीं आंकी जा सकती। पत्नी और माँ के तौर पर किये जाने वाले कामों की तुलना हाउसकीपर या घरेलू हेल्पर की सेवाओं से नहीं की जा सकती। खाना पकाने, सफ़ाई करने और घर की देखभाल जैसे कामों की जगह कोई और ले सकता है। लेकिन घर संभालने वाली महिला का निजी ध्यान, प्यार और देखभाल अनोखे होते हैं और उनकी जगह कोई नहीं ले सकता।
अदालत का ये फैसला सिर्फ एक गृहणी के काम के कीमत तय नहीं करता है। बल्कि उस सोच को चुनौती देता है जो यह तय करती हैं कौन सा काम आर्थिक रूप से कीमती है। यह पारंपरिक और रूढ़िवादी सोच पर एक बड़ा प्रहार करने की कोशिश है। हम खुद ही देखें, कितने ही काम अदृश्य होते है। लेकिन फिर भी होते रहते हैं, लगातार और इस वजह से उनकी कीमत आंकने की कोशिश कभी नहीं की जाती। उसकी कीमत तब समझ में आती है जब वह योगदान खो जाता है, खत्म हो जाता है।
किसी गृहणी के काम की असली कीमत तब समझ में आती है जब वह कुछ दिनों के लिए घर से दूर चली जाती है या हमेशा के लिए इस दुनिया से चली जाती है। तब पता चलता है कि घर में अपने आप कुछ भी नहीं होता था। बच्चों के टिफिन अपने आप तैयार नहीं होते थे, कपड़े अपने आप अलमारी में नहीं पहुंचते थे, बुजुर्गों की दवाइयां अपने आप समय पर नहीं मिलती थीं और न ही घर में अपनापन अपने आप बना रहता था। जिस काम को हम कुछ खास नहीं समझते रहे, उसकी अनुपस्थिति अचानक पूरे घर को अव्यवस्थित कर देती है। शायद इस फैसले का सबसे बड़ा महत्व 30 हजार रुपये नहीं है। उसका महत्व यह है कि पहली बार कानून ने उन अदृश्य हाथों को देखा है और हमें उनसे रूबरू कराया है। यह फैसला उस अदृश्य श्रम को दृश्य बनाने की एक छोटी लेकिन ऐतिहासिक कोशिश है। क्योंकि सच यही है कि कोई भी समाज या राष्ट्र सबसे पहले घरों से बनता है और घरों की नींव में आज भी गृहणियों का मौन, निस्वार्थ और अनगिना श्रम समाया हुआ होता है।
(लेखक पत्रकार हैं)