Ethanol blending in diesel: डीजल में एथेनॉल ब्लेंडिंग पर लगा ब्रेक, सुरक्षा टेस्ट में फेल

Ethanol blending in diesel: Ethanol Fails in Diesel Safety Tests, Flash Point Raises Concerns

Update:2026-08-11 14:23 IST

Ethanol blending in diesel: Ethanol Blending Fails in Diesel, Safety Tests Raise Concerns

Ethanol blending in diesel: भारत में पेट्रोल के साथ एथेनॉल मिलाने का प्रयोग अब पूरी तरह से चलन में आ चुका है। वहीं अब सरकार इसी जैव ईंधन के दूसरे इस्तेमाल की संभावनाएं भी तलाश रही है। इस कड़ी में एक रिपोर्ट के मुताबिक डीजल के मामले में एथेनॉल को लेकर बड़ा झटका लगा है। सरकारी तेल कंपनियों की ओर से किए गए वैज्ञानिक परीक्षण में एथेनॉल-मिक्स्ड डीजल जरूरी सुरक्षा मानकों पर खरा नहीं उतर पाया। सबसे बड़ी परेशानी इसके फ्लैश पॉइंट को लेकर सामने आई है।

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय में राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने संसद में बताया कि डीजल में एथेनॉल मिलाने पर उसके फ्लैश पॉइंट में काफी गिरावट देखी गई। इसके चलते तैयार ईंधन डीजल के निर्धारित सुरक्षा मानक को पूरा नहीं कर सका। सरकार के इस जवाब से डीजल में एथेनॉल की बड़े पैमाने पर ब्लेंडिंग की योजना पर लगाम लग गई है।

फ्लैश पॉइंट कम होना क्यों है बड़ी समस्या

किसी भी ईंधन की सुरक्षा जांच में फ्लैश पॉइंट बेहद अहम होता है। यह वह न्यूनतम तापमान है, जिस पर ईंधन से निकलने वाली वाष्प हवा के साथ ऐसा मिश्रण बना सकती है, जो आग पकड़ सके।

डीजल का फ्लैश पॉइंट पेट्रोल की तुलना में काफी अधिक होता है, इसलिए उसके भंडारण और परिवहन के लिए अलग सुरक्षा मानक तय हैं। सरकारी दस्तावेज के मुताबिक एथेनॉल मिलाने के बाद डीजल का फ्लैश पॉइंट इतनी तेजी से नीचे आया कि मिश्रण निर्धारित डीजल मानक को पूरा नहीं कर पाया। यही इस प्रयोग की सबसे बड़ी तकनीकी अड़चन बन गई है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक एथेनॉल खुद किसी भी स्थिति में इस्तेमाल के लिए असुरक्षित है। समस्या तब पैदा होती है, जब उसके गुणों को ऐसे ईंधन के साथ मिलाया जाता है जिसके लिए अलग सुरक्षा और तकनीकी मानक तय हैं।

तेल कंपनियों ने कैसे किया परीक्षण

सरकार के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों यानी OMCs ने अपने रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटरों के माध्यम से डीजल में एथेनॉल मिलाने का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया। इस प्रक्रिया में मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं और वाहन निर्माताओं को भी शामिल किया गया था। परीक्षणों में ईंधन के तकनीकी गुणों, सुरक्षा और इंजन से जुड़े पहलुओं का अध्ययन किया गया। इससे पहले इंडियन ऑयल से जुड़े शोधकर्ताओं की एक तकनीकी स्टडी में भी एथेनॉल-डीजल मिश्रण के मटेरियल कंपैटिबिलिटी पहलुओं का अध्ययन किया गया था। इसमें अलग-अलग ईंधन प्रणाली सामग्री पर लंबे समय तक मिश्रण के प्रभावों की जांच की गई। अध्ययन में कुछ सामग्री का प्रदर्शन पारंपरिक डीजल के करीब पाया गया, लेकिन ईंधन के फ्लैश पॉइंट और पानी की मात्रा जैसे गुणों में बदलाव भी दर्ज किया गया।

सिर्फ फ्लैश पॉइंट ही नहीं, मिश्रण की केमिस्ट्री भी चुनौती

डीजल और एथेनॉल के गुण अलग-अलग हैं। एथेनॉल पानी को आसानी से सोखता है और डीजल के साथ इसकी स्थिरता बनाए रखना भी तकनीकी चुनौती है। भारतीय ईंधन विशेषज्ञों की एक तकनीकी रिपोर्ट में बताया गया है कि एथेनॉल-डीजल मिश्रण में फ्लैश पॉइंट और पानी की मात्रा जैसे मानकों को नियंत्रित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। साथ ही मिश्रण के लिए कपलर, करोजन इनहिबिटर और सीटेन इम्प्रूवर जैसे घटकों की जरूरत पड़ सकती है।

यानी डीजल में एथेनॉल मिलाना केवल दो ईंधनों को एक टैंक में मिलाने का मामला नहीं है। इसके लिए ईंधन की स्थिरता, इंजन की कार्यक्षमता, सामग्री की अनुकूलता और सबसे बढ़कर सुरक्षा मानकों को एक साथ पूरा करना होगा।

दूसरे अल्कोहल आधारित विकल्पों की ब्लेंडिंग पर नजर

डीजल में एथेनॉल की परेशानी सामने आने के बाद अब नजर दूसरे अल्कोहल आधारित विकल्पों पर भी है। सरकार ने संसद में स्पष्ट किया है कि फिलहाल डीजल में आइसोब्यूटेनॉल की ब्लेंडिंग नहीं की जा रही है। इसे गन्ने, मक्का और अन्य बायोमास से जैविक प्रक्रिया के जरिए बनाया जा सकता है।

एथेनॉल की तुलना में इसकी ऊर्जा सामग्री अधिक होती है और इसमें पानी सोखने की प्रवृत्ति भी कम होती है, इसलिए कुछ परिस्थितियों में इसे ईंधन के लिए उपयोगी माना जाता है। वहीं भारत में इस विकल्प पर शोध भी चल रहा है। भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड ने आइसोब्यूटेनॉल को डीजल के साथ मिलाने को लेकर शुरुआती अध्ययन किया है। लेकिन सरकार ने अभी इस संबंध में कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है।

पेट्रोल में 20% एथेनॉल के बाद क्या होगा

डीजल के प्रयोग में अड़चन के बावजूद पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग का कार्यक्रम जारी है। सरकार ने फिलहाल पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने के मौजूदा लक्ष्य से आगे जाने का कोई फैसला नहीं किया है।

सरकार के मुताबिक भविष्य में अगर एथेनॉल ब्लेंडिंग को 20 प्रतिशत से ऊपर ले जाने पर विचार होता है, तो विस्तृत वैज्ञानिक और तकनीकी अध्ययन किया जाएगा। इसमें ऑटोमोबाइल कंपनियों, तेल विपणन कंपनियों और शोध संस्थानों से भी सलाह ली जाएगी।

एथेनॉल की सप्लाई बढ़ाने पर जोर

दूसरी तरफ भारत में एथेनॉल का उत्पादन और सप्लाई लगातार बढ़ाने की कोशिश हो रही है। इसका इस्तेमाल पेट्रोल में ब्लेंडिंग के अलावा अब दूसरे क्षेत्रों में भी बढ़ाने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। सरकार के लिए इसका एक बड़ा फायदा यह है कि इससे घरेलू स्तर पर तैयार जैव ईंधन का इस्तेमाल बढ़ सकता है और पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है। सरकार एथेनॉल आधारित कुकिंग फ्यूल के विकल्प पर भी काम कर रही है। इसके लिए एलपीजी इक्विपमेंट रिसर्च सेंटर (LPG Equipment Research Centre) समेत संबंधित संस्थाएं तकनीकी संभावनाओं का अध्ययन कर रही हैं। इनका लक्ष्य ऐसा विकल्प विकसित करना है जो सुरक्षा और प्रदर्शन के जरूरी मानकों पर खरा उतर सके। वहीं डीजल में एथेनॉल ब्लेंडिंग का प्रयोग सुरक्षा कसौटी पर अटक गया है, लेकिन इससे भारत की एथेनॉल नीति पर पूर्ण विराम नहीं लगा है। पेट्रोल में ब्लेंडिंग के साथ-साथ कुकिंग फ्यूल और दूसरे औद्योगिक इस्तेमाल की संभावनाओं पर काम जारी है।

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