National Handloom Day 2026: PM मोदी की अपील- हैंडलूम खरीदें, बुनकरों का साथ दें

National Handloom Day 2026: 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस क्यों मनाया जाता है? जानिए स्वदेशी आंदोलन से इसका ऐतिहासिक संबंध, PM मोदी की अपील और भारतीय हैंडलूम की खासियत।

Update:2026-08-07 10:08 IST

National Handloom Day 2026: PM Modi Urges Indians to Buy Handloom

National Handloom Day 2026:पूरी दुनिया में अपनी खास पहचान कायम कर चुका भारतीय हथकरघा सिर्फ कपड़ा बनाने का जरिया नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे हुनर, मेहनत और संस्कृति की पहचान है। देश के अलग-अलग हिस्सों में आज भी लाखों बुनकर अपने हाथों से ऐसे कपड़े और उत्पाद तैयार करते हैं, जिनकी पहचान भारत के साथ-साथ विदेशों में भी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हथकरघा परंपरा को बढ़ावा देने की अपील

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी परंपरा को बढ़ावा देने की अपील की है। उन्होंने देशवासियों से स्वदेशी और हस्तनिर्मित उत्पादों को अपनाने के साथ बुनकर परिवारों का समर्थन करने की अपील की। प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया पर जारी वीडियो में 7 अगस्त के ऐतिहासिक महत्व को याद किया। उन्होंने कहा कि 7 अगस्त 1905 को देश में स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत हुई थी और उस समय देश का जन-जन अंग्रेजों के खिलाफ इस आंदोलन से जुड़ गया था। पीएम मोदी ने कहा कि आज उसी भावना के साथ हैंडलूम डे मनाने की जरूरत है, ताकि देश के छोटे बुनकर परिवार आत्मनिर्भर और समृद्ध बन सकें।

7 अगस्त को ही क्यों मनाया जाता है राष्ट्रीय हथकरघा दिवस

भारत में हर साल 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया जाता है। इस तारीख का संबंध 1905 के स्वदेशी आंदोलन से है। 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी सामान अपनाने का आह्वान किया गया था। इसके बाद स्वदेशी आंदोलन ने देश के अलग-अलग हिस्सों में व्यापक रूप लिया और यह स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। आजादी के आंदोलन से जुड़े इस ऐतिहासिक दिन को हथकरघा क्षेत्र से जोड़ने का उद्देश्य देश की पारंपरिक बुनाई और उससे जुड़े कारीगरों को सम्मान देना भी है। भारत सरकार ने वर्ष 2015 में 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत की थी। इसके जरिए लोगों को भारतीय हथकरघा उत्पादों के महत्व के बारे में जागरूक करने और बुनकरों की आजीविका को बढ़ावा देने पर जोर दिया जाता है।

PM मोदी ने कहा- स्वदेशी आंदोलन की भावना को आगे बढ़ाएं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने वीडियो संदेश में 7 अगस्त 1905 को याद करते हुए कहा कि इस तारीख को भूलना नहीं चाहिए। उन्होंने कहा कि उस समय देशवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ बड़ी लड़ाई लड़ी और इस आंदोलन में समाज का हर वर्ग जुड़ा था। प्रधानमंत्री ने कहा कि उसी उत्साह और उमंग के साथ आज हैंडलूम डे मनाया जाना चाहिए।

पीएम मोदी ने कहा कि हैंडलूम डे मनाने का मतलब उन गरीब और छोटे बुनकर परिवारों को समर्थन देना है, जो अपने हाथों से और करघे पर कपड़े तैयार करते हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे हथकरघा उत्पादों को देखें, उन्हें खरीदें और उनकी तस्वीरें व वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करें। इससे भारतीय बुनकरों की कला और उनके हुनर को दुनिया के सामने पहुंचाने में मदद मिलेगी।

‘आत्मनिर्भर भारत के लिए बुनकर परिवारों का आत्मनिर्भर होना जरूरी’

प्रधानमंत्री ने हथकरघा क्षेत्र को आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य से जोड़ते हुए कहा कि देश तभी मजबूत और आत्मनिर्भर बन सकता है, जब छोटे-छोटे परिवार और कारीगर भी आत्मनिर्भर बनें। उन्होंने देशवासियों से अपील की कि वे अपने इस्तेमाल के लिए हथकरघा से बनी कोई न कोई चीज जरूर खरीदें।

हथकरघा से बनी साड़ी, कुर्ता, दुपट्टा, शॉल, चादर या घर की सजावट का कोई सामान खरीदना बुनकरों के काम को सीधे बढ़ावा देता है। इससे पारंपरिक कारीगरी की मांग बनी रहती है और बुनकर परिवारों को अपनी कला को आगे बढ़ाने का अवसर मिलता है।

भारत के हर क्षेत्र की अपनी अलग हथकरघा पहचान

भारतीय हथकरघा की सबसे बड़ी खासियत इसकी विविधता है। देश के अलग-अलग राज्यों में बुनाई की अलग तकनीक, डिजाइन और कपड़े की अपनी पहचान है। उत्तर प्रदेश की बनारसी साड़ी, मध्य प्रदेश की चंदेरी और महेश्वरी, तमिलनाडु की कांजीवरम, गुजरात की पटोला और तेलंगाना की पोचमपल्ली इकत जैसी परंपराएं भारत की समृद्ध हथकरघा विरासत को दर्शाती हैं।

इसी तरह बिहार का भागलपुरी सिल्क, असम की मूगा सिल्क और राजस्थान समेत कई राज्यों की पारंपरिक बुनाई भी अपनी अलग पहचान रखती है। इन कपड़ों की खासियत सिर्फ उनका डिजाइन नहीं है, बल्कि इनके पीछे बुनकरों का वर्षों का अनुभव और पीढ़ियों से चला आ रहा कौशल भी है।

सोशल मीडिया से बुनकरों को मिल सकता है बड़ा बाजार

आज सोशल मीडिया और ऑनलाइन बाजार ने छोटे कारीगरों और बुनकरों के लिए संभावनाएं बढ़ा दी हैं। पहले किसी गांव या छोटे शहर में काम करने वाले बुनकर के उत्पादों की बिक्री आसपास के बाजार तक सीमित रहती थी। अब सोशल मीडिया के जरिए उनके उत्पाद देश के दूसरे हिस्सों और विदेशों तक पहुंच सकते हैं। प्रधानमंत्री ने भी लोगों से हथकरघा उत्पादों के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा करने की अपील की है। इसका मकसद सिर्फ खरीदारी को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि भारतीय बुनकरों की कला को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना है। किसी स्थानीय बुनकर के बनाए उत्पाद को सोशल मीडिया पर साझा करने से उसे नए ग्राहक मिलने की संभावना भी बढ़ती है।

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