सादाबाद में मायावती का बड़ा दांव: अविन शर्मा पर भरोसा, क्या BSP की सोशल इंजीनियरिंग दिलाएगी जीत?
मायावती की BSP ने सादाबाद विधानसभा सीट से डॉ. अविन शर्मा को फिर टिकट दिया है। जानिए अविन शर्मा की राजनीतिक ताकत, आकाश आनंद की रणनीति और बसपा के सोशल इंजीनियरिंग दांव के मायने।
BSP Sadabad Assembly Seat: हाथरस की सादाबाद विधानसभा सीट पर बहुजन समाज पार्टी ने अपना पत्ता खोल दिया है। पार्टी ने वर्ष 2022 में चुनाव लड़ चुके डॉ. अविन शर्मा को एक बार फिर मैदान में उतारा है। बसपा के नेशनल कोऑर्डिनेटर आकाश आनंद ने सादाबाद में आयोजित सभा के दौरान उनके नाम का ऐलान किया और कार्यकर्ताओं से अभी से चुनावी तैयारी में जुटने की अपील की।
सादाबाद में अविन शर्मा की दोबारा उम्मीदवारी को सिर्फ टिकट की घोषणा के तौर पर देखना मुश्किल है। इसके पीछे बसपा की उस रणनीति की झलक दिखाई देती है, जिसमें पार्टी अपने पारंपरिक दलित वोट बैंक के साथ सवर्ण, पिछड़े और मुस्लिम मतदाताओं के बीच भी जगह बनाने की कोशिश करती रही है। यानी बसपा का दांव एक ऐसे चेहरे पर है, जो सामाजिक समीकरणों को व्यापक बनाने में मदद कर सकता है।
2022 में तीसरे नंबर पर रहे थे अविन शर्मा
डॉ. अविन शर्मा के लिए यह चुनाव पूरी तरह नई चुनौती नहीं है। वह 2022 के विधानसभा चुनाव में सादाबाद से बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं। हालांकि उस चुनाव में उन्हें तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा था।
इसके बावजूद पार्टी नेतृत्व ने उन्हें दोबारा मौका दिया है। इसका एक मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि बसपा नेतृत्व मानता है कि पिछली चुनावी हार के बावजूद शर्मा ने क्षेत्र में अपनी राजनीतिक जमीन पूरी तरह नहीं खोई है और संगठन को उनके चेहरे के आसपास दोबारा सक्रिय किया जा सकता है।
आकाश आनंद का मंच से उन्हें मजबूती से चुनाव लड़ाने का संदेश भी इसी ओर इशारा करता है। बसपा अब सादाबाद में उम्मीदवार उतारकर पीछे हटने के बजाय बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने की कोशिश करती दिख रही है।
भाजपा से बसपा तक का सफर भी बना राजनीतिक कहानी
अविन शर्मा की राजनीतिक यात्रा भी इस चुनाव में चर्चा का विषय बन सकती है। वर्ष 2021 में उन्होंने जिला पंचायत सदस्य पद के चुनाव में अपनी पत्नी को भाजपा से टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय चुनाव लड़ाया था। हालांकि उन्हें सफलता नहीं मिली।
इसके बाद शर्मा ने भाजपा से दूरी बनाई और बसपा का दामन थाम लिया। अब वही अविन शर्मा बसपा के उम्मीदवार के तौर पर सादाबाद में चुनावी मैदान में हैं।
यही राजनीतिक पृष्ठभूमि बसपा के लिए एक अतिरिक्त संदेश भी देती है, पार्टी ऐसे नेताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है, जिनकी पहुंच दलित राजनीति के पारंपरिक दायरे से बाहर के सामाजिक समूहों तक भी हो सकती है।
सादाबाद में BSP की सोशल इंजीनियरिंग का टेस्ट
बसपा की राजनीति में सोशल इंजीनियरिंग कोई नई रणनीति नहीं है। पार्टी का मूल दलित आधार उसकी सबसे बड़ी ताकत रहा है, लेकिन चुनावी मुकाबले को व्यापक बनाने के लिए वह समय-समय पर ब्राह्मण, पिछड़ा, मुस्लिम और दूसरे सामाजिक समूहों को जोड़ने की कोशिश करती रही है। सादाबाद में डॉ. अविन शर्मा को टिकट देना इसी रणनीति का स्थानीय संस्करण माना जा सकता है।
पार्टी के सामने चुनौती साफ है। दलित वोट बैंक को अपने साथ बनाए रखते हुए क्या बसपा सवर्ण और पिछड़े मतदाताओं के बीच भी पर्याप्त पैठ बना पाएगी? अगर इसका जवाब हां में निकलता है, तो सादाबाद में मुकाबला त्रिकोणीय या बहुकोणीय होने की स्थिति बन सकती है।
हालांकि 2022 का प्रदर्शन बसपा के लिए चेतावनी भी है। केवल सामाजिक समीकरणों के भरोसे चुनाव जीतना आसान नहीं होगा। उम्मीदवार की स्थानीय पकड़, संगठन की सक्रियता और चुनाव के अंतिम दौर में वोटों का ध्रुवीकरण—ये तीनों फैक्टर निर्णायक हो सकते हैं।
आकाश आनंद ने राहुल-अखिलेश पर साधा निशाना
सादाबाद की सभा में आकाश आनंद ने सिर्फ पार्टी उम्मीदवार का ऐलान नहीं किया, बल्कि विपक्ष पर भी सीधा हमला बोला।
उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को 'राहुल अंकल' और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव को 'अखिलेश अंकल' कहकर तंज कसा। अखिलेश यादव की उम्र का जिक्र करते हुए आकाश आनंद ने कहा कि वह करीब 30 साल के हैं, जबकि अखिलेश यादव लगभग 50 साल के हैं, इसलिए उन्हें 'अखिलेश भइया' कहने के बजाय 'अखिलेश अंकल' कहना ठीक रहेगा।
यह हमला महज भाषणबाजी नहीं माना जा सकता। बसपा की कोशिश अपने युवा नेतृत्व के जरिए सपा-कांग्रेस के पीडीए नैरेटिव को चुनौती देने की भी है।
आकाश आनंद लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि दलित राजनीति पर दावा करने वाली पार्टियों से सवाल किया जाना चाहिए कि उनके राजनीतिक और सामाजिक मॉडल में दलितों की वास्तविक हिस्सेदारी कितनी है।
'10 साल का हिसाब मांगो'—BSP का चुनावी नैरेटिव तैयार?
आकाश आनंद ने कार्यकर्ताओं से जनता के बीच जाकर सरकार से पिछले 10 वर्षों का हिसाब मांगने को कहा। इससे बसपा के संभावित चुनावी नैरेटिव का एक हिस्सा साफ होता है।
पार्टी एक तरफ सपा और कांग्रेस को निशाने पर ले रही है, तो दूसरी तरफ भाजपा सरकार से भी सवाल पूछने की रणनीति अपना रही है। यानी बसपा खुद को सीधे तौर पर किसी एक खेमे की राजनीति तक सीमित करने के बजाय अलग राजनीतिक विकल्प के तौर पर पेश करना चाहती है।
यही रणनीति अगर जमीन पर वोट में बदलती है, तो सादाबाद जैसी सीटों पर बसपा मुकाबले को प्रभावित कर सकती है।
असली सवाल: अविन शर्मा कितनी दूर तक ले जा पाएंगे BSP को?
अविन शर्मा के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि 2022 के मुकाबले बसपा का प्रदर्शन काफी बेहतर करने की है।
उनकी राजनीतिक ताकत के तीन प्रमुख आधार हो सकते हैं—क्षेत्र में पिछला चुनावी अनुभव, भाजपा से बसपा तक की राजनीतिक यात्रा और गैर-दलित सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने की संभावित क्षमता।
लेकिन दूसरी तरफ कमजोरियां भी कम नहीं हैं। 2022 में तीसरे स्थान पर रहना बताता है कि पिछले चुनाव में बसपा का वोट पर्याप्त नहीं था। इस बार उम्मीदवार को अपने व्यक्तिगत नेटवर्क के साथ-साथ पार्टी संगठन को भी मजबूत करना होगा।
सादाबाद में इसलिए मुकाबला सिर्फ अविन शर्मा बनाम दूसरे उम्मीदवारों का नहीं होगा। असली परीक्षा यह होगी कि मायावती की बसपा अपनी पुरानी सोशल इंजीनियरिंग को नए नेतृत्व और नए राजनीतिक माहौल में कितनी सफलतापूर्वक दोहरा पाती है।
सादाबाद में टिकट तो घोषित हो गया है, लेकिन बसपा के लिए असली चुनाव अब शुरू हुआ है।