Nishad Party Political Journey: निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल, निषाद पार्टी की राजनीतिक यात्रा
Nishad Party Political Journey: निषाद पार्टी की पूरी राजनीतिक यात्रा जानिए। संजय निषाद, कसरवल आंदोलन, गोरखपुर उपचुनाव, भाजपा गठबंधन, विधायक, सांसद, आरक्षण और 2027 की रणनीति।
यदि केवल निर्वाचन आयोग की पार्टीवार गणना की जाए तो आम विधानसभा चुनावों में निषाद पार्टी द्वारा जीती सीटों का योग है—2017 की 1 + 2022 की 6 = कुल 7 सीट-विजय।
यह सात अलग-अलग व्यक्तियों की संख्या आवश्यक रूप से नहीं है, क्योंकि ज्ञानपुर सीट 2017 और 2022 दोनों में निषाद पार्टी ने जीती, लेकिन अलग प्रत्याशियों—विजय मिश्र और विपुल दुबे—के माध्यम से।
यदि 2022 में निषाद पार्टी के कोटे से भाजपा के चिह्न पर जीते पाँच उम्मीदवार भी राजनीतिक प्रतिनिधित्व में जोड़े जाएँ, तो पार्टी उस चुनाव में 11 विधायकों पर प्रभाव का दावा करती है। लेकिन विधानसभा की आधिकारिक पार्टीवार गणना में वे पांच भाजपा विधायक हैं, निषाद पार्टी के नहीं।
राज्यसभा में प्रतिनिधित्व
निषाद पार्टी का कोई सदस्य अब तक राज्यसभा नहीं पहुँचा है। पार्टी के पास उत्तर प्रदेश विधानसभा में स्वतंत्र रूप से राज्यसभा सदस्य निर्वाचित कराने के लिए पर्याप्त संख्या नहीं है। भाजपा ने गठबंधन व्यवस्था में उसे विधान परिषद सदस्यता, विधानसभा सीटें और कैबिनेट मंत्री पद दिया, लेकिन अब तक राज्यसभा की सीट नहीं दी।
इसलिए राज्यसभा का हिसाब स्पष्ट है—
अलग-अलग सदस्य: शून्य
कुल कार्यकाल: शून्य
वर्तमान प्रतिनिधित्व: शून्य
विधान परिषद में प्रतिनिधित्व
निषाद पार्टी की ओर से अब तक प्रमुख और वर्तमान विधान परिषद सदस्य स्वयं संजय कुमार निषाद हैं। उन्हें सितंबर 2021 में मनोनीत किया गया था और आधिकारिक परिषद सूची में उनका कार्यकाल 26 सितंबर 2027 तक दर्ज है।
इसलिए—
विधान परिषद पहुँचे अलग-अलग सदस्य: एक
सदस्य का नाम: संजय कुमार निषाद
कार्यकाल: 2021–2027
वर्तमान संख्या: एक
पार्टी ने कब किसके साथ चुनाव लड़ा?
और चुनाव सहयोगी दल अथवा गठबंधन निषाद पार्टी की स्थिति परिणाम
2017 विधानसभा पीस पार्टी, जन अधिकार पार्टी और छोटे दल 72 सीटें अपने चिह्न पर एक सीट
2018 गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव समाजवादी पार्टी; बसपा का समर्थन प्रवीण निषाद सपा चिह्न पर जीत
2019 लोकसभा प्रारंभ में सपा–बसपा गठबंधन से वार्ता, बाद में भाजपा–एनडीए प्रवीण निषाद भाजपा चिह्न पर संत कबीर नगर से जीत
2022 विधानसभा भाजपा और अपना दल (सोनेलाल)—एनडीए 10 अपने चिह्न पर, छह संबद्ध प्रत्याशी भाजपा चिह्न पर छह अपने चिह्न पर; पांच संबद्ध भाजपा प्रत्याशी जीते
2024 लोकसभा भाजपा–एनडीए प्रवीण निषाद भाजपा चिह्न पर संत कबीर नगर से हार
2027 की तैयारी भाजपा–एनडीए में वर्तमान सहयोग अधिक सीटों की माँग चुनाव होना शेष
2018 से 2019 तक समाजवादी पार्टी के साथ संबंध और 2019 के बाद भाजपा के साथ गठबंधन निषाद पार्टी की यात्रा के दो मुख्य राजनीतिक चरण हैं। अगस्त 2026 तक पार्टी एनडीए में है और भाजपा से विधानसभा सीटों का बँटवारा समय रहते तय करने की माँग कर रही है।
पार्टी कब-कब टूटी?
निषाद पार्टी में अपना दल की तरह परिवार के दो गुटों में औपचारिक विभाजन या सुभासपा की तरह किसी वरिष्ठ संस्थापक द्वारा समान नाम से प्रभावी नई पार्टी बनाने की बड़ी घटना नहीं हुई है। पार्टी का नाम, चुनाव चिह्न और केंद्रीय संगठन लगातार संजय निषाद के नियंत्रण में रहा है। फिर भी उसके इतिहास में तीन प्रकार की टूट या अलगाव दिखाई देते हैं—गठबंधन का टूटना, नेताओं का निष्कासन या पलायन और मूल सामाजिक आधार पर प्रतिद्वंद्वी निषाद दलों का उभरना।
समाजवादी पार्टी से गठबंधन का टूटना—2019
यह संगठनात्मक विभाजन नहीं था। लेकिन पार्टी की राजनीतिक दिशा बदलने वाली सबसे बड़ी टूट थी। 2018 की ऐतिहासिक गोरखपुर विजय के बाद निषाद पार्टी को सपा–बसपा गठबंधन में अधिक सीटों और अपने चुनाव चिह्न की मान्यता की अपेक्षा थी। समझौता न होने पर उसने मार्च 2019 में गठबंधन छोड़ दिया और भाजपा से जुड़ गई।
विजय मिश्र से दूरी
2017 में पार्टी के पहले विधायक बने विजय मिश्र बाद में गंभीर आपराधिक मामलों, गिरफ्तारी और राजनीतिक विवादों में घिर गए। 2022 में निषाद पार्टी ने उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाया और ज्ञानपुर से विपुल दुबे को टिकट दिया। इस प्रकार पार्टी अपने पहले विधायक से अलग हो गई। यह औपचारिक पार्टी विभाजन नहीं था। लेकिन उसके शुरुआती विधायी चेहरे का संगठन से अंत था।
स्थानीय नेताओं और टिकट दावेदार
भाजपा के साथ गठबंधन के बाद निषाद पार्टी को सीमित सीटें मिलीं। जिन नेताओं को टिकट नहीं मिला या जिन्हें भाजपा के चिह्न पर लड़ने को कहा गया, उनमें समय-समय पर असंतोष हुआ। कुछ नेता भाजपा, समाजवादी पार्टी या दूसरे छोटे दलों में चले गए। लेकिन इनमें से किसी ने निषाद पार्टी के समान संगठनात्मक शक्ति वाला अलग गुट नहीं बनाया।
विकासशील इंसान पार्टी और निषाद मत पर प्रतिस्पर्धा
बिहार में मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी ने मल्लाह–निषाद राजनीति को संगठित किया और उत्तर प्रदेश में भी विस्तार करने का प्रयास किया। 2022 में वीआईपी ने उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतारे। यह निषाद पार्टी से निकला गुट नहीं था, इसलिए इसे पार्टी की टूट नहीं कहा जा सकता; फिर भी निषाद सामाजिक आधार पर वह सबसे स्पष्ट वैकल्पिक राजनीतिक चुनौती बनी। 2022 में वीआईपी के अधिकांश उम्मीदवार प्रभावी प्रदर्शन नहीं कर सके और निषाद पार्टी भाजपा गठबंधन के कारण अधिक सफल रही।
परिवार-केंद्रित नेतृत्व पर असंतोष
संजय निषाद के पुत्र प्रवीण निषाद को दो बार लोकसभा का अवसर मिला और श्रवण निषाद को विधानसभा राजनीति में आगे बढ़ाया गया। इससे पुराने कार्यकर्ताओं के बीच परिवारवाद की शिकायतें समय-समय पर सामने आईं। लेकिन अभी तक यह असंतोष औपचारिक बड़े विभाजन में नहीं बदला है।
इसलिए निष्कर्ष यह है कि निषाद पार्टी कानूनी अथवा चुनाव आयोग के स्तर पर कभी नहीं टूटी, लेकिन उसने गठबंधन बदला, अपने पहले विधायक से दूरी बनाई और सामाजिक आधार पर प्रतिद्वंद्वी निषाद नेतृत्व का सामना किया।
परिवार की भूमिका
निषाद पार्टी की संगठनात्मक पहचान संजय निषाद परिवार से गहराई से जुड़ी है। संजय निषाद संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। उनके पुत्र प्रवीण निषाद लोकसभा राजनीति का मुख्य चेहरा रहे। दूसरे पुत्र श्रवण कुमार निषाद विधानसभा पहुँचे। परिवार के अन्य सदस्य भी संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं।
समर्थकों का तर्क है कि जब पार्टी नई थी, तब परिवार ने आंदोलन, मुकदमों, संसाधनों और संगठन निर्माण का भार उठाया, इसलिए उनकी अग्रणी भूमिका स्वाभाविक है। आलोचकों का कहना है कि निषाद समुदाय की सामूहिक राजनीतिक पार्टी धीरे-धीरे एक परिवार के नियंत्रण वाली संस्था बन गई और सबसे बड़े चुनावी अवसर परिवार को2018 में प्रवीण निषाद को गोरखपुर, 2019 और 2024 में संत कबीर नगर से अवसर मिलना तथा 2022 में श्रवण निषाद का विधायक बनना इस आलोचना का आधार है। पार्टी के दीर्घकालीन विस्तार के लिए यह प्रश्न महत्वपूर्ण होगा कि क्या वह परिवार के बाहर दूसरी और तीसरी पंक्ति का राज्यव्यापी नेतृत्व विकसित कर पाती है।
भाग–इक्कीस
निषाद पार्टी के प्रमुख राजनीतिक मुद्दे
अनुसूचित जाति आरक्षण
पार्टी की सबसे पुरानी और भावनात्मक माँग निषाद उपजातियों को अनुसूचित जाति की सुविधाएँ दिलाना है। इस प्रश्न में संवैधानिक सूची, राज्य सरकार की संस्तुति, केंद्र सरकार, भारत के महापंजीयक और संसद की प्रक्रिया जुड़ी होती है। इसलिए किसी राज्य सरकार के आदेश मात्र से स्थायी अनुसूचित जाति दर्जा नहीं दिया जा सकता। पार्टी का आरोप है कि सरकारों ने राजनीतिक आश्वासन दिए, लेकिन कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं की।
मझवार और तुरैहा प्रविष्टियों की व्याख्या
निषाद संगठनों का दावा है कि मझवार, तुरैहा और कुछ दूसरी अनुसूचित जाति प्रविष्टियों के समानार्थी अथवा उपसमूह के रूप में कई निषाद जातियों को प्रमाणपत्र मिलना चाहिए। प्रशासनिक स्तर पर इस दावे को लेकर लंबे समय से विवाद और न्यायिक चुनौतियाँ रही हैं।
नदियों और घाटों पर अधिकार
पार्टी चाहती है कि नाव संचालन, घाट, मछली पालन, तालाब पट्टा, बालू और जल संसाधनों में परंपरागत निषाद समुदायों को प्राथमिकता दी जाए। उसका तर्क है कि ठेका प्रणाली और बड़े आर्थिक हितों ने इन समुदायों को उनके पारंपरिक रोजगार से बाहर कर दिया।
मत्स्य पालन को कृषि के समान सुविधाएँ
संजय निषाद मत्स्य पालन को किसानों जैसी ऋण, बीमा, दुर्घटना सहायता और बाजार सुविधाओं से जोड़ने की माँग करते रहे हैं। मत्स्य मंत्री बनने के बाद उन्होंने इसी क्षेत्र की योजनाओं को पार्टी की शासन संबंधी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व
निषाद पार्टी विधानसभा, लोकसभा, स्थानीय निकाय, सरकारी आयोगों और प्रशासनिक संस्थाओं में निषाद समुदाय की संख्या के अनुपात में हिस्सेदारी की माँग करती है।
भाग–बाईस
निषाद पार्टी के उत्थान के प्रमुख कारण
निषाद पार्टी के तेजी से उभरने का पहला कारण यह था कि उसने बिखरी हुई नदीवर्ती जातियों को एक साझा राजनीतिक नाम दिया। “निषाद” को केवल जाति नहीं, बल्कि मल्लाह, केवट, बिंद, कश्यप, धीवर और दूसरी उपजातियों की राजनीतिक छतरी बनाने का प्रयास किया गया। इससे अलग-अलग स्थानीय नामों में विभाजित समुदाय को एक सामूहिक पहचान मिली।
दूसरा कारण कसरवल आंदोलन था। आंदोलन में मृत्यु, पुलिस टकराव और आरक्षण की माँग ने संजय निषाद को संघर्षशील नेता के रूप में स्थापित किया। पार्टी ने इस घटना को स्मृति, शहादत और राजनीतिक संगठन से जोड़ा।
तीसरा कारण समुदाय का क्षेत्रीय केंद्रण है। निषाद मत पूरे उत्तर प्रदेश में समान नहीं है, लेकिन गोरखपुर, संत कबीर नगर, महाराजगंज, देवरिया, कुशीनगर, वाराणसी, प्रयागराज, भदोही, मिर्जापुर और पूर्वांचल की अनेक सीटों पर वह जीत-हार का अंतर तय कर सकता है।
चौथा कारण गठबंधन की व्यावहारिक राजनीति है। 2017 में स्वतंत्र पहचान बनाई गई, 2018 में सपा के साथ ऐतिहासिक लोकसभा जीत हासिल की गई और 2019 के बाद भाजपा के साथ सत्ता तथा अधिक विधानसभा प्रतिनिधित्व प्राप्त किया गया।
पाँचवाँ कारण भाजपा का वोट और संगठन है। 2022 में दस में छह सीटों पर विजय केवल निषाद पार्टी के जातीय मत से संभव नहीं थी। भाजपा के सवर्ण, गैर-यादव पिछड़े, दलित, महिला लाभार्थी और हिंदुत्व समर्थक वोट ने निषाद उम्मीदवारों की जीत में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
छठा कारण संजय निषाद की लगातार दृश्यता है। वे आरक्षण, मंत्री पद, सीट-वितरण और निषाद सम्मान के मुद्दों पर सार्वजनिक रूप से सक्रिय रहते हैं। इससे छोटी पार्टी होने के बावजूद संगठन मीडिया और राजनीतिक बातचीत में बना रहता है।
पार्टी की प्रमुख कमजोरियाँ
निषाद पार्टी की सबसे बड़ी कमजोरी उसका सीमित सामाजिक आधार है। पार्टी सभी निर्बल और शोषित समुदायों का दावा करती है, लेकिन उसकी मुख्य पहचान निषाद–मल्लाह पार्टी की है। नदीवर्ती जातियाँ भी पूर्णतः उसके साथ नहीं हैं; इनमें भाजपा, सपा, बसपा, कांग्रेस और अन्य छोटे दलों का प्रभाव बना हुआ है।
दूसरी कमजोरी बड़े सहयोगी पर निर्भरता है। 2017 में पार्टी ने 72 सीटें लड़कर केवल एक जीती, जबकि 2022 में भाजपा के साथ दस सीटें लड़कर छह जीत गई। इससे स्पष्ट है कि उसकी सीटगत सफलता बड़े गठबंधन के वोट हस्तांतरण पर निर्भर है।
तीसरी कमजोरी अपने चुनाव चिह्न पर लोकसभा सफलता का अभाव है। प्रवीण निषाद दो बार सांसद बने, लेकिन एक बार सपा और दूसरी बार भाजपा के चिह्न पर। इससे पार्टी की स्वतंत्र संसदीय पहचान अभी स्थापित नहीं हुई।
चौथी कमजोरी परिवारवाद की छवि है। पिता अध्यक्ष और मंत्री, एक पुत्र दो बार सांसद और दूसरा पुत्र विधायक—इस संरचना से अन्य निषाद नेताओं के लिए अवसर सीमित होने की धारणा बनती है।
पाँचवीं कमजोरी आरक्षण के वादे का अधूरा रहना है। पार्टी की स्थापना और भाजपा गठबंधन का मुख्य आधार अनुसूचित जाति दर्जे की माँग थी, लेकिन एक दशक बाद भी इसका स्थायी समाधान नहीं हुआ। इससे समर्थकों में असंतोष पैदा हो सकता है।
छठी कमजोरी उत्तर प्रदेश के बाहर नगण्य उपस्थिति है। निषाद, मल्लाह और साहनी समुदाय बिहार, मध्य प्रदेश और दूसरे राज्यों में भी हैं, लेकिन निषाद पार्टी उत्तर प्रदेश के बाहर मजबूत संगठन नहीं बना पाई। बिहार में इसी सामाजिक आधार पर मुकेश सहनी की वीआईपी अधिक प्रमुख रही है।
कुल प्रतिनिधित्व का संक्षिप्त लेखा
लोकसभा
अपने चुनाव चिह्न पर निर्वाचित सांसद: शून्य।
निषाद पार्टी से राजनीतिक रूप से जुड़े सांसद: एक—प्रवीण कुमार निषाद।
कुल कार्यकाल: दो।
2018 गोरखपुर उपचुनाव—सपा चिह्न पर जीत।
2019 संत कबीर नगर—भाजपा चिह्न पर जीत।
2024 संत कबीर नगर—भाजपा चिह्न पर हार।
उत्तर प्रदेश विधानसभा
2017: एक विधायक।
2022: छह विधायक अपने चिह्न पर।
आम चुनावों में पार्टीवार सीट-विजय का योग: 1 + 6 = 7 सीटें।
2022 में भाजपा चिह्न पर जीते संबद्ध उम्मीदवार: पाँच।
2022 में पार्टी द्वारा दावा किया गया व्यापक राजनीतिक विधायक समूह: 11।
राज्यसभा
सदस्य: शून्य।
विधान परिषद
सदस्य: एक—संजय कुमार निषाद।
कार्यकाल: सितंबर 2021 से सितंबर 2027।
उत्तर प्रदेश सरकार
संजय निषाद: मार्च 2022 से कैबिनेट मंत्री, मत्स्य विभाग।
निषाद पार्टी की सबसे बड़ी उपलब्धियाँ
गठन के छह महीने के भीतर 2017 में विधानसभा सीट जीतना।
पहले चुनाव में लगभग 5.41 लाख वोट प्राप्त करना।
2018 में गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में भाजपा के तीन दशक पुराने गढ़ को हराना।
प्रवीण निषाद का लगातार दो बार अलग-अलग दलों के चिह्न पर लोकसभा पहुँचना।
2022 में अपने चिह्न पर छह विधानसभा सीटें जीतना।
संजय निषाद का विधान परिषद सदस्य और कैबिनेट मंत्री बनना।
निषाद आरक्षण तथा मछुआरा अधिकारों को उत्तर प्रदेश की मुख्य राजनीतिक बहस में स्थापित करना।
निषाद पार्टी के इतिहास का सबसे बड़ा विरोधाभास
निषाद पार्टी का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि वह स्वतंत्र राजनीतिक पहचान के लिए बनी, लेकिन उसकी सबसे बड़ी सफलताएँ दूसरे दलों के सहयोग और कई बार दूसरे दलों के चुनाव चिह्न पर आईं। 2018 की लोकसभा जीत सपा के चिह्न पर थी, 2019 की जीत भाजपा के चिह्न पर थी और 2022 में उसके राजनीतिक कोटे के अनेक प्रत्याशी भाजपा के चिह्न पर लड़े। इसका अर्थ है कि पार्टी ने सामाजिक पहचान तो स्वतंत्र बनाई, लेकिन पूर्ण चुनावी स्वायत्तता अभी हासिल नहीं की।
दूसरा विरोधाभास वोट और सीटों का है। 2017 में 72 सीटों पर लड़कर लगभग 5.41 लाख वोट मिले और केवल एक सीट आई। 2022 में केवल दस सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारकर लगभग 8.41 लाख वोट और छह सीटें मिलीं। इससे स्पष्ट है कि छोटे दल के लिए राज्यव्यापी वोट से अधिक महत्वपूर्ण गठबंधन, सीट चयन और सहयोगी के मतों का हस्तांतरण है।
तीसरा विरोधाभास आरक्षण और सत्ता का है। निषाद पार्टी ने अनुसूचित जाति दर्जे के आंदोलन से जन्म लिया और 2019 से भाजपा के साथ है। उसका अध्यक्ष मंत्री बन गया, विधायक और सांसद बने, लेकिन मूल आरक्षण प्रश्न अभी अंतिम रूप से हल नहीं हुआ।
चौथा विरोधाभास सामुदायिक पार्टी और परिवारवादी संरचना के बीच है। पार्टी स्वयं को करोड़ों निषाद–मछुआरा लोगों की आवाज बताती है, लेकिन उसका शीर्ष नेतृत्व और सबसे बड़े चुनावी अवसर एक ही परिवार के आसपास केंद्रित रहे हैं।
आंदोलन से गठबंधन-सत्ता तक पहुँची पार्टी, लेकिन स्वतंत्र राजनीतिक परीक्षा अभी शेष
निषाद पार्टी की यात्रा को चार मुख्य चरणों में समझा जा सकता है। पहला चरण कसरवल आंदोलन और निषाद समुदाय की आरक्षण माँग से स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व के जन्म का था। दूसरा चरण 2016 से 2017 तक पार्टी गठन, स्वतंत्र चुनाव और ज्ञानपुर की पहली विधानसभा जीत का रहा। तीसरा चरण 2018 से 2019 तक समाजवादी पार्टी के साथ गोरखपुर उपचुनाव की ऐतिहासिक विजय और फिर सीट-वितरण विवाद के कारण गठबंधन टूटने का था। चौथा चरण 2019 से वर्तमान तक भाजपा–एनडीए के साथ सत्ता, लोकसभा प्रतिनिधित्व, छह विधायक, विधान परिषद सदस्यता और कैबिनेट मंत्री पद का है।
संजय निषाद ने बहुत कम समय में यह सिद्ध किया कि सामाजिक रूप से बिखरे हुए और राजनीतिक रूप से दूसरे दलों पर निर्भर समुदाय को अलग पहचान देकर गठबंधन राजनीति में महत्वपूर्ण शक्ति बनाया जा सकता है। 2017 में केवल एक विधायक वाली पार्टी 2022 में अपने चुनाव चिह्न पर छह विधायक जिताने और अपने विस्तृत कोटे से 11 विजयी उम्मीदवारों पर प्रभाव का दावा करने लगी। पार्टी का अध्यक्ष राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री बना और उसका पुत्र दो बार लोकसभा पहुँचा।
लेकिन संख्या और सत्ता से आगे उसकी वास्तविक परीक्षा अभी बाकी है। अपने चुनाव चिह्न पर कोई लोकसभा जीत न होना, 2024 में प्रवीण निषाद की हार, आरक्षण की माँग का अधूरा रहना, परिवार-केंद्रित नेतृत्व और भाजपा पर चुनावी निर्भरता उसकी सीमाएँ हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव में पार्टी अधिक सीटों की माँग कर रही है और अपने दस वर्ष पूरे होने पर राज्यव्यापी शक्ति प्रदर्शन कर रही है।
निषाद पार्टी का भविष्य तीन प्रश्नों पर निर्भर करेगा। पहला, क्या वह निषाद–मल्लाह–केवट–बिंद उपजातियों को वास्तव में एक स्थायी राजनीतिक समूह बना सकेगी? दूसरा, क्या वह भाजपा के समर्थन के बिना भी अपने चुनाव चिह्न पर सीट जीतने की क्षमता विकसित कर पाएगी? तीसरा, क्या अनुसूचित जाति दर्जे और परंपरागत जल-अधिकारों की माँग को सत्ता में रहते हुए किसी ठोस कानूनी तथा नीतिगत परिणाम तक पहुँचा सकेगी?
उसकी अब तक की यात्रा का सार यह है—कसरवल आंदोलन ने नेतृत्व दिया, स्वतंत्र चुनाव ने पहचान दी, गोरखपुर उपचुनाव ने राष्ट्रीय चर्चा दी और भाजपा गठबंधन ने सत्ता तथा प्रतिनिधित्व दिया; लेकिन स्वतंत्र एवं व्यापक राजनीतिक शक्ति बनने की यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है।
आँकड़ों संबंधी आवश्यक सावधानी
2017 के चुनाव को लेकर कई द्वितीयक स्रोतों में उम्मीदवारों, मतों और मत-प्रतिशत की अलग-अलग संख्या मिलती है। निर्वाचन आयोग आधारित अंतिम परिणाम में निषाद पार्टी के 72 उम्मीदवार, 5,40,539 मत, 0.62 प्रतिशत वोट और एक सीट दर्ज है। 2022 में पार्टी को गठबंधन में लगभग 16 सीटों का राजनीतिक कोटा मिला, लेकिन सभी उम्मीदवार उसके अपने चिह्न पर नहीं लड़े। दस प्रत्याशी निषाद पार्टी के चिह्न और छह भाजपा के चिह्न पर उतरे; अपने चिह्न पर छह तथा संबद्ध भाजपा प्रत्याशियों में पाँच जीते। इसलिए आधिकारिक पार्टीवार विधायक संख्या छह है, जबकि पार्टी का राजनीतिक दावा 11 निर्वाचित सदस्यों पर प्रभाव का है। लोकसभा में भी प्रवीण निषाद की दोनों जीत क्रमशः सपा और भाजपा के चिह्न पर थीं; निषाद पार्टी के अपने चिह्न पर अभी कोई लोकसभा सदस्य निर्वाचित नहीं हुआ है।