UP News: यूपी में फर्जी ITC का बड़ा खेल! ₹12 हजार करोड़ की टैक्स चोरी पकड़ी, 55 गिरफ्तार
UP News: उत्तर प्रदेश में तीन साल में फर्जी ITC के 1,356 मामलों में ₹12,015 करोड़ की गड़बड़ी सामने आई। 55 गिरफ्तारियां हुईं। जानिए GST फर्जीवाड़े का पूरा मामला।
Fake ITC in Uttar Pradesh (Image Credit-Social Media)
लखनऊ। वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था में फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट यानी ITC के जरिए कर चोरी अब बड़े आर्थिक अपराध के रूप में उभर रही है। केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने राज्यसभा में रखे आंकड़ों में बताया है कि उत्तर प्रदेश में पिछले तीन वित्तीय वर्षों के दौरान 1,356 मामलों में करीब ₹12,015 करोड़ की फर्जी ITC पकड़ी गई। इन मामलों में कुल 55 लोगों की गिरफ्तारी हुई। देशभर में इसी अवधि में फर्जी ITC का आंकड़ा ₹1.69 लाख करोड़ से अधिक रहा। इस हिसाब से राष्ट्रीय स्तर पर पकड़े गए फर्जी ITC में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी करीब सात प्रतिशत बैठती है।
उत्तर प्रदेश में फर्जी ITC के मामलों का साल-दर-साल आंकड़ा भी गंभीर तस्वीर दिखाता है। वित्तीय वर्ष 2023-24 में करीब ₹2,113 करोड़, 2024-25 में ₹5,149.69 करोड़ और 2025-26 में करीब ₹4,751 करोड़ की फर्जी ITC पकड़ी गई। इसी के साथ गिरफ्तारियों का आंकड़ा भी बढ़ा। वर्ष 2023-24 में 11, 2024-25 में 19 और 2025-26 में 25 लोगों को गिरफ्तार किया गया। तीन वर्षों में यह संख्या 55 तक पहुंच गई।
ITC क्या है और इसमें फर्जीवाड़ा कैसे होता है
GST व्यवस्था में इनपुट टैक्स क्रेडिट का मूल सिद्धांत यह है कि किसी कारोबारी ने माल या सेवा खरीदते समय जितना GST पहले ही चुकाया है, उसे वह अपनी बिक्री पर देय GST से समायोजित कर सकता है। इससे एक ही वस्तु पर बार-बार कर लगने से बचाव होता है।मसलन किसी निर्माता ने कच्चा माल खरीदते समय ₹18 लाख GST चुकाया और तैयार माल बेचने पर उसकी कुल GST देनदारी ₹30 लाख बनी, तो वह पहले दिए गए ₹18 लाख का ITC लेकर बाकी ₹12 लाख जमा कर सकता है।
समस्या तब शुरू होती है जब वास्तविक माल खरीदे बिना केवल कागज पर खरीद दिखाकर ITC ले लिया जाता है। इसके लिए फर्जी फर्म, शेल कंपनियां, जाली चालान, नकली ई-वे बिल या केवल बिल जारी करने वाली कंपनियों का इस्तेमाल किया जाता है।ऐसी स्थिति में सरकार को वह टैक्स क्रेडिट देना पड़ता है जो वास्तव में कभी सरकारी खजाने में आया ही नहीं।
शेल कंपनियां बनीं फर्जी ITC का सबसे बड़ा हथियार
जांच एजेंसियों के सामने लगातार ऐसे मामले आए हैं जिनमें एक ही नेटवर्क दर्जनों या सैकड़ों फर्जी कंपनियां बनाता है। इनके नाम पर GST पंजीकरण कराया जाता है, लेकिन जमीन पर वास्तविक कारोबार बहुत कम या बिल्कुल नहीं होता।इन कंपनियों का असली काम कागजी बिल जारी करना होता है।एक फर्म दूसरी फर्म को बिल देती है, दूसरी तीसरी को और फिर कई चरणों में फर्जी खरीद-बिक्री दिखाते हुए ITC आगे बढ़ाया जाता है। अंत में कोई वास्तविक कारोबारी इसी फर्जी क्रेडिट का इस्तेमाल अपनी GST देनदारी कम करने में कर सकता है।कई मामलों में गरीब, मजदूर, घरेलू कर्मचारी या दूसरे व्यक्तियों के आधार, पैन और बैंक खातों का इस्तेमाल कर उनके नाम पर फर्म तक खोल दी जाती हैं। वास्तविक संचालक पर्दे के पीछे रहता है।
यूपी में एक साल में ₹5,149 करोड़ तक पहुंचा आंकड़ा
तीन वर्षों के आंकड़े देखें तो उत्तर प्रदेश में फर्जी ITC का सबसे बड़ा खुलासा वित्तीय वर्ष 2024-25 में हुआ, जब ₹5,149.69 करोड़ के मामलों का पता चला। अगले वर्ष 2025-26 में भी आंकड़ा करीब ₹4,751 करोड़ रहा।यह जरूरी नहीं कि जिस वर्ष अधिक फर्जी ITC पकड़ी गई, उसी वर्ष उतनी ही कर चोरी पैदा हुई हो। प्रवर्तन कार्रवाई में पुराने नेटवर्क या पिछले वर्षों में जारी फर्जी बिल भी बाद में सामने आ सकते हैं।इसलिए इन आंकड़ों को उस वित्तीय वर्ष में पकड़ी गई संदिग्ध या फर्जी ITC के रूप में देखना अधिक सही होगा।
₹12,015 करोड़ पकड़ा जाना, इतनी रकम वसूल हो जाना नहीं
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। फर्जी ITC के ₹12,015 करोड़ का पता लगने का अर्थ यह नहीं है कि इतनी पूरी रकम सरकार ने तत्काल वसूल भी कर ली।जांच के बाद विभाग टैक्स देनदारी तय करता है, ITC ब्लॉक या रद्द किया जा सकता है, बैंक खाते और संपत्ति पर कार्रवाई हो सकती है और आगे न्यायिक प्रक्रिया भी चलती है।कुछ मामलों में कारोबारी आरोपों को चुनौती देते हैं और कर निर्धारण तथा वसूली की अंतिम राशि बाद की प्रक्रिया में तय होती है। इसलिए ‘₹12 हजार करोड़ की चोरी पकड़ी गई’ और ‘₹12 हजार करोड़ सरकार को वापस मिल गए’ दोनों अलग बातें हैं।
गिरफ्तारियों में लगातार वृद्धि
तीन वर्षों में गिरफ्तारी का आंकड़ा 11 से बढ़कर 25 सालाना तक पहुंचना बताता है कि विभाग ने केवल कर निर्धारण तक कार्रवाई सीमित नहीं रखी है। गंभीर मामलों में आपराधिक कार्रवाई भी की जा रही है।2023-24 में 11 लोगों की गिरफ्तारी हुई थी। अगले वर्ष यह संख्या 19 और 2025-26 में 25 हो गई।हालांकि गिरफ्तारी अपने आप दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है। अंतिम आपराधिक जिम्मेदारी जांच और अदालत की प्रक्रिया से तय होती है।
फर्जी ITC से ईमानदार कारोबारी भी प्रभावित
फर्जी ITC केवल सरकार के राजस्व का मामला नहीं है। इसका असर ईमानदार कारोबारियों पर भी पड़ता है।जो कारोबारी वास्तविक टैक्स देता है, उसकी लागत उस कारोबारी से ज्यादा हो सकती है जो फर्जी बिलों के जरिए टैक्स देनदारी घटा रहा है। इससे बाजार में अनुचित प्रतिस्पर्धा पैदा होती है।इसी वजह से GST नेटवर्क में डेटा विश्लेषण, ई-इनवॉइस, ई-वे बिल, बैंकिंग जानकारी और रिटर्न की आपसी तुलना के जरिए संदिग्ध कारोबार पकड़ने की कोशिश बढ़ाई जा रही है।
लखनऊ की इवेंट कंपनी पर ₹3 करोड़ की टैक्स चोरी का आरोप
इसी बीच लखनऊ में राज्य कर विभाग की जांच में एक इवेंट मैनेजमेंट फर्म के खिलाफ करीब ₹3 करोड़ की कर चोरी का मामला सामने आया है। आरोप है कि कारोबार से जुड़े परिवार के तीन सदस्यों के नाम पर अलग-अलग फर्म बनाई गईं और वास्तविक खरीद के बिना दूसरी फर्मों से ITC लिया गया।यदि जांच में यह साबित होता है कि माल या सेवा की वास्तविक आपूर्ति के बिना केवल बिलों के आधार पर क्रेडिट लिया गया, तो यह फर्जी ITC की उसी व्यवस्था का उदाहरण होगा जिसके खिलाफ केंद्र और राज्य स्तर पर अभियान चल रहा है।
पुराने ई-वे बिल से पान मसाला और तंबाकू की खेप
एक अन्य मामले में राज्य कर विभाग ने पुराने ई-वे बिल का इस्तेमाल कर पान मसाला और तंबाकू की करीब ₹24 लाख की खेप कौशांबी ले जाते एक वाहन को पकड़ा। ई-वे बिल निर्धारित अवधि और विशेष माल परिवहन के लिए बनाया जाता है। यदि पुराने या पहले इस्तेमाल किए जा चुके ई-वे बिल पर नया माल ढोया जाता है तो यह टैक्स चोरी छिपाने की कोशिश का संकेत हो सकता है। पान मसाला और तंबाकू जैसे उच्च कर वाले उत्पादों में अवैध परिवहन से टैक्स चोरी की संभावना अधिक होने के कारण इनकी निगरानी विशेष रूप से की जाती है।
तकनीक से पकड़ा जा रहा ‘कागज पर कारोबार’
GST लागू होने के बाद कर प्रशासन की सबसे बड़ी ताकत उसका डिजिटल डेटा है। कारोबारी की खरीद और बिक्री अलग-अलग रिटर्न में दिखाई देती है। ई-वे बिल बताता है कि माल किस वाहन से कहां गया। ई-इनवॉइस बिल का डिजिटल रिकॉर्ड बनाता है।
यदि कोई कंपनी करोड़ों रुपये की खरीद दिखा रही है लेकिन उसके पास कर्मचारियों, गोदाम, बिजली खपत, परिवहन या बैंकिंग गतिविधि का कोई तार्किक आधार नहीं है तो वह जोखिम सूची में आ सकती है।इसी तरह यदि किसी फर्म ने बहुत बड़ी मात्रा में ITC आगे बढ़ा दिया, लेकिन स्वयं बहुत कम टैक्स जमा किया है तो विभाग उसकी जांच कर सकता है।यही कारण है कि फर्जी ITC का खेल अब पहले की तुलना में तकनीकी रूप से ज्यादा जोखिम भरा हो गया है, हालांकि ठगी करने वाले नेटवर्क भी लगातार नए तरीके खोज रहे हैं।