Lucknow News: 38 साल तक फर्जी आदेश से चलता रहा जमीन का ‘खेल’, लखनऊ में 120 बीघा सरकारी जमीन का खुलासा
Lucknow News: लखनऊ में 38 साल पुराने कथित फर्जी चकबंदी आदेश से 120 बीघा सरकारी जमीन पर निजी दावे का खुलासा हुआ है। चार पर FIR, सात अधिकारियों की जांच की सिफारिश।
Lucknow Land Fraud Case 2026 (Image Credit -Social Media)
लखनऊ। राजधानी में सरकारी जमीन कब्जाने का ऐसा मामला सामने आया है जिसमें कथित तौर पर एक फर्जी न्यायिक आदेश ने करीब 38 वर्षों तक असली आदेश की तरह सरकारी व्यवस्था के भीतर काम किया। मामला केवल 120 बीघा जमीन पर कब्जे का नहीं है। सबसे गंभीर सवाल यह है कि 1988 में उप संचालक चकबंदी की अदालत के नाम से कथित तौर पर तैयार किया गया फर्जी आदेश चकबंदी विभाग के रिकॉर्ड तक कैसे पहुंच गया, उसके आधार पर वर्षों तक सरकारी अधिकारी आदेश कैसे करते रहे और करीब चार दशक तक किसी ने यह जांच क्यों नहीं की कि जिस मुकदमे का फैसला दिखाया जा रहा है, उसकी सुनवाई की तारीखें ही अदालत के मूल रजिस्टर में मौजूद नहीं थीं।
जांच रिपोर्ट के मुताबिक इस कथित फर्जी आदेश के सहारे लखनऊ के छह गांवों में चरागाह, बंजर और दूसरी श्रेणी की लगभग 120 बीघा सरकारी जमीन पर निजी दावे किए गए। जमीन का बड़ा हिस्सा बाद में बेचे जाने की बात भी सामने आई है। मौजूदा बाजार मूल्य के आधार पर इन जमीनों की कुल कीमत करीब ₹2,000 करोड़ आंकी जा रही है। मामला अब आपराधिक और विभागीय दोनों कार्रवाई तक पहुंच गया है। जानकीपुरम थाने में रामेंद्र कुमार, अमित कुमार, सुनील कुमार और लईक खां के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है, जबकि जांच रिपोर्ट में सात तत्कालीन चकबंदी अधिकारियों की भूमिका की विभागीय जांच की सिफारिश की गई है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जांच केवल इन्हीं सात अधिकारियों तक सीमित नहीं रहेगी। चकबंदी आयुक्त ने संकेत दिया है कि 1988 से अब तक इस प्रकरण में फाइलों, आदेशों, नामांतरण और जमीन संबंधी कार्रवाई से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की भी पड़ताल होगी। यानी जांच का अगला चरण यह पता लगाने का होगा कि एक कथित फर्जी आदेश को सरकारी तंत्र के भीतर इतने लंबे समय तक वैधता किस-किस स्तर पर मिलती रही।
पहले दो अदालतों में हारा दावा, फिर ऊपर की अदालत का कथित फर्जी फैसला तैयार
इस कथित फर्जीवाड़े की बुनियाद वर्ष 1988 में पड़ी बताई जा रही है। जांच रिपोर्ट के अनुसार भूमाफिया के रूप में चिह्नित सिकंदर खान ने कब्जे वाली कुछ सरकारी जमीनों को अपने पक्ष में खतौनी में दर्ज कराने की कोशिश की थी। उसके दावे के समर्थन में पर्याप्त वैध दस्तावेज नहीं मिलने के कारण पहले चकबंदी अधिकारी और फिर बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी की अदालत में उसे सफलता नहीं मिली। इसके बाद कहानी में सबसे गंभीर मोड़ आया।
आरोप है कि इसके बाद उप संचालक चकबंदी की अदालत, जो इन दोनों अदालतों से ऊपर की प्राधिकारी थी, के नाम से एक कथित फर्जी आदेश तैयार कराया गया। इसी आदेश को आधार बनाकर जमीन पर अधिकार का दावा किया गया।लेकिन कथित फर्जीवाड़ा केवल एक कागज बनाने तक सीमित नहीं रहा। जांच में आरोप सामने आया है कि इस आदेश से जुड़े दस्तावेज चकबंदी कार्यालय के रिकॉर्ड रूम में भी इस तरह रखे गए कि वर्षों बाद जांच होने पर वे सरकारी अभिलेख का हिस्सा दिखाई दें।
यदि यह आरोप जांच और न्यायिक प्रक्रिया में साबित होता है तो मामला साधारण जालसाजी से कहीं बड़ा होगा, क्योंकि इसमें सरकारी न्यायिक रिकॉर्ड को ही कथित तौर पर प्रभावित करने का प्रश्न जुड़ता है।
एक रजिस्टर ने 38 साल पुराना राज खोल दिया
इतनी सावधानी से तैयार कथित फर्जीवाड़ा आखिर पकड़ा कैसे गया?इसका जवाब चकबंदी अदालत के मिसिलबंद रजिस्टर में मिला।चकबंदी अदालत में किसी मुकदमे की सुनवाई होती है तो उसकी तारीखें और संबंधित न्यायिक प्रक्रिया निर्धारित रजिस्टर में दर्ज होती हैं। जांच में पाया गया कि जिस मामले में 1988 का आदेश दिखाया जा रहा था, उससे संबंधित सुनवाई की आवश्यक प्रविष्टियां उस मूल रजिस्टर में नहीं थीं।यहीं सबसे सीधा सवाल खड़ा हुआ—जब मुकदमे की सुनवाई की तारीख ही सरकारी रजिस्टर में नहीं है तो फैसला कैसे हो गया? इसी विसंगति ने पूरे कथित आदेश की प्रामाणिकता पर सवाल खड़ा कर दिया और जांच आगे बढ़ी।
भूमाफिया खुद हाईकोर्ट पहुंचा और वहीं से खुल गई परत
इस मामले की सबसे दिलचस्प विडंबना यह है कि कथित फर्जीवाड़ा किसी सरकारी अभियान में अचानक नहीं पकड़ा गया। जमीन पर दावा मजबूत कराने की कोशिश में मामला स्वयं हाईकोर्ट तक पहुंचा और वहीं दस्तावेज के सत्यापन ने पूरे प्रकरण की दिशा बदल दी।वर्ष 2020 में सिकंदर खान ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर शिकायत की कि उसके पक्ष में जमीन खतौनी में दर्ज करने की कार्रवाई नहीं की जा रही है। अपने दावे के समर्थन में वही 1988 का कथित आदेश प्रस्तुत किया गया।
सुनवाई के दौरान अदालत को दस्तावेज की प्रामाणिकता पर संदेह हुआ और लखनऊ के जिलाधिकारी से सत्यापन संबंधी हलफनामा मांगा गया।इसके बाद वर्ष 2021 में तत्कालीन जिलाधिकारी ने पांच सदस्यीय जांच समिति गठित की।यानी जिस दस्तावेज के सहारे जमीन पर दावा मजबूत करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया गया, उसी न्यायिक जांच ने कथित फर्जीवाड़े की नींव हिला दी।
2021 में समिति बनी, लेकिन रिपोर्ट आने में फिर पांच साल
इस प्रकरण का दूसरा चिंताजनक पहलू जांच की रफ्तार है। वर्ष 2021 में पांच सदस्यीय समिति बनने के बावजूद मामला लंबे समय तक निर्णायक रिपोर्ट तक नहीं पहुंचा।हाईकोर्ट में मामले की पैरवी के दौरान स्टैंडिंग काउंसिल डॉ. कृष्णा सिंह ने 23 जुलाई 2026 को चकबंदी विभाग से पूछा कि जांच समिति की रिपोर्ट आखिर कहां है। जांच में देरी की जानकारी राजस्व परिषद के अध्यक्ष, मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव न्याय तक को लिखित रूप से दिए जाने की बात सामने आई है।इसके बाद प्रक्रिया तेज हुई और 5 अगस्त 2026 को जांच रिपोर्ट चकबंदी आयुक्त को सौंप दी गई।यानी 1988 के कथित फर्जी आदेश की सत्यता पर सवाल 2020-21 में गंभीरता से खड़ा हो चुका था, लेकिन अंतिम प्रशासनिक जांच रिपोर्ट आने में भी कई वर्ष लग गए।
देवा रोड से जानकीपुरम तक प्राइम जमीनों का मामला
जांच में जिन क्षेत्रों की जमीन का उल्लेख है उनमें देवा रोड, बीकेटी, इंदिरानगर और जानकीपुरम जैसे तेजी से महंगे हुए इलाके शामिल हैं। इनमें चरागाह, बंजर और दूसरी सरकारी श्रेणी की जमीनों की खरीद-फरोख्त होने का आरोप है।कई जमीनें आज लखनऊ की बेहद महत्वपूर्ण और महंगी लोकेशन में आ चुकी हैं। कुछ पर पक्के निर्माण तक होने की जानकारी है।यही वजह है कि लगभग 120 बीघा जमीन की वर्तमान अनुमानित कीमत करीब ₹2,000 करोड़ बताई जा रही है। हालांकि इसे मौजूदा अनुमानित बाजार मूल्य के रूप में ही देखा जाना चाहिए; वास्तविक सरकारी सर्किल रेट, भूखंड की लोकेशन और भूमि उपयोग के आधार पर कीमत अलग-अलग होगी।यदि कुल ₹2,000 करोड़ के अनुमान को 120 बीघा पर औसत किया जाए तो यह लगभग ₹16.7 करोड़ प्रति बीघा बैठता है। लेकिन सभी जमीनों का मूल्य समान होना स्वाभाविक रूप से संभव नहीं है।
जमीन बिक चुकी तो अब उसे वापस लाना सबसे कठिन काम
इस मामले की प्रशासनिक चुनौती अब केवल एफआईआर दर्ज करने तक सीमित नहीं रहेगी। यदि सरकारी जमीनों का हिस्सा पिछले वर्षों में अलग-अलग लोगों को बेचा जा चुका है और उन पर मकान या व्यावसायिक निर्माण हो गए हैं तो जमीन को सरकारी रिकॉर्ड में वापस लाना लंबी कानूनी प्रक्रिया बन सकता है।हर बिक्री विलेख की अलग जांच करनी होगी।यह पता करना होगा कि जमीन खरीदने वाला व्यक्ति कथित फर्जीवाड़े की जानकारी रखता था या उसने रिकॉर्ड देखकर सद्भावना में खरीद की। नामांतरण किस आदेश पर हुआ, रजिस्ट्री के समय जमीन की श्रेणी क्या दर्ज थी और बाद में किस अधिकारी ने उसे मान्यता दी—ये सभी तथ्य महत्वपूर्ण होंगे।इसलिए 38 साल पुराने मामले का कानूनी असर आने वाले वर्षों तक चल सकता है।
सात अधिकारियों की भूमिका पर सीधे सवाल
जांच रिपोर्ट में चकबंदी विभाग के सात तत्कालीन अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच की सिफारिश किए जाने की जानकारी है। इनमें तत्कालीन उप संचालक चकबंदी एस.के. भट्ट, एस.के. सिंह, राम मंगल सिंह, चकबंदी अधिकारी शैलेश शाही, सहायक चकबंदी अधिकारी सत्य प्रकाश मिश्रा, बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी दूधनाथ पांडेय और अपर आयुक्त चकबंदी महेंद्र सिंह के नाम बताए गए हैं।यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी सावधानी आवश्यक है। जांच की सिफारिश होना दोष सिद्ध होना नहीं है। विभागीय जांच में प्रत्येक अधिकारी से यह पूछा जाएगा कि उसके कार्यकाल में कौन-सा आदेश हुआ, उसने किस दस्तावेज पर भरोसा किया और उस समय उसके सामने कौन-सा रिकॉर्ड उपलब्ध था।लेकिन सवाल गंभीर इसलिए है कि यदि मूल आदेश ही फर्जी था तो बाद के वर्षों में सरकारी मशीनरी ने उसे कितनी बार बिना मूल रिकॉर्ड मिलाए स्वीकार किया।
हर नया अधिकारी पुराने आदेश को सही मानता गया?
यह मामला सरकारी अभिलेख व्यवस्था की एक बड़ी कमजोरी सामने लाता है।मान लीजिए 1988 का कोई आदेश फाइल में मौजूद दिखता है। अगले अधिकारी ने उसे प्रमाणित मानकर आगे आदेश कर दिया। फिर तीसरे अधिकारी ने दूसरे अधिकारी के आदेश को आधार बना लिया। कुछ वर्षों बाद उसी आधार पर नामांतरण और बिक्री हो गई।
इस तरह एक शुरुआती फर्जी दस्तावेज बाद के असली सरकारी आदेशों की शृंखला पैदा कर सकता है।
यही ‘लेगेसी फ्रॉड’ सरकारी जमीनों के मामलों में बेहद खतरनाक होता है। समय बीतने के साथ फर्जी दस्तावेज के ऊपर इतने वैध दिखने वाले आदेश और रजिस्ट्रियां चढ़ जाती हैं कि मूल फर्जीवाड़ा पकड़ना कठिन हो जाता है।लखनऊ के इस मामले में यदि आरोप सही साबित होते हैं तो संभवतः यही हुआ।
रिकॉर्ड रूम तक फर्जी कागज पहुंचा तो अंदर की भूमिका भी जांचनी होगी
सबसे गंभीर आरोपों में से एक यह है कि कथित फर्जी न्यायिक आदेश से जुड़ा रिकॉर्ड चकबंदी कार्यालय के अभिलेखागार तक पहुंच गया।सरकारी रिकॉर्ड रूम में कोई दस्तावेज सामान्यतः प्रक्रिया के बिना नहीं पहुंचना चाहिए। फाइल संख्या, मुकदमा संख्या, तारीख, आदेश पत्र और रजिस्टर की प्रविष्टियां आपस में मेल खानी चाहिए।यदि कथित फर्जी आदेश रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया गया तो जांच को यह निर्धारित करना होगा कि यह कब हुआ और उस समय रिकॉर्ड की अभिरक्षा किसके पास थी।
यही कारण है कि केवल भूमाफिया के खिलाफ एफआईआर से पूरी कहानी सामने नहीं आएगी। रिकॉर्ड के भीतर कथित फर्जी दस्तावेज को जगह किसने दी, यह इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न हो सकता है।
चार पर FIR, लेकिन जांच का घेरा बड़ा
फिलहाल जानकीपुरम थाने में रामेंद्र कुमार, अमित कुमार, सुनील कुमार और लईक खां के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है। इन पर जमीन कब्जाने की कथित प्रक्रिया में शामिल होने के आरोप हैं।जांच रिपोर्ट में सिकंदर खान और उसके साथियों को पूरे खेल का कथित कर्ता-धर्ता बताया गया है।लेकिन किसी का नाम जांच रिपोर्ट या एफआईआर में आना अपराध सिद्ध होना नहीं है। पुलिस जांच, दस्तावेजों की फोरेंसिक पड़ताल और अदालत में साक्ष्य के बाद ही अंतिम आपराधिक जिम्मेदारी तय होगी।
अब 1988 से हर हस्ताक्षर की पड़ताल संभव
चकबंदी आयुक्त डॉ. ऋषिकेश भास्कर यशोद के अनुसार प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई होगी और आवश्यकता पड़ने पर राजस्व नुकसान का आकलन कर उसकी वसूली भी की जा सकती है।इससे जांच का अगला चरण बेहद व्यापक हो सकता है।1988 से अब तक संबंधित जमीनों की फाइल पर किस-किस लेखपाल, कानूनगो, चकबंदी अधिकारी, बंदोबस्त अधिकारी, उप संचालक, राजस्व अधिकारी और दूसरे कर्मचारी के हस्ताक्षर हुए—यह पूरी शृंखला तैयार की जा सकती है।
उसके बाद अधिकारियों को अलग किया जा सकेगा जिन्होंने केवल पुराने सरकारी रिकॉर्ड पर सामान्य प्रक्रिया में कार्रवाई की और उन मामलों को चिह्नित किया जा सकेगा जहां स्पष्ट विसंगति के बावजूद संदिग्ध आदेश पारित किए गए।
सरकार का राजस्व नुकसान कितना, अलग से होगा हिसाब
₹2,000 करोड़ जमीन की अनुमानित वर्तमान कीमत है। इसे सीधे सरकारी राजस्व नुकसान मानना सही नहीं होगा।वास्तविक वित्तीय नुकसान का निर्धारण अलग तरीके से होगा—कितनी सरकारी जमीन निजी नामों में गई, उसमें से कितनी बेची गई, उस समय उसका मूल्य कितना था, सरकार को स्टांप और दूसरे शुल्क के रूप में क्या मिला और कितनी जमीन अब भी वापस ली जा सकती है।चकबंदी आयुक्त ने संकेत दिया है कि राजस्व नुकसान का आकलन कराया जाएगा और आवश्यकता होने पर वसूली की कार्रवाई भी हो सकती है।
38 साल पुराना मामला डिजिटलीकरण की जरूरत भी बताता है
इस प्रकरण का सबसे बड़ा प्रशासनिक सबक पुराने भू-अभिलेखों के डिजिटलीकरण और आपसी सत्यापन से जुड़ा है।यदि किसी न्यायिक आदेश का डिजिटल रिकॉर्ड सीधे मुकदमा रजिस्टर, सुनवाई की तारीखों, संबंधित पक्षकारों और जमीन के गाटा नंबर से जुड़ा हो तो ऐसा फर्जी आदेश वर्षों तक चलाना बहुत कठिन हो सकता है।विशेष रूप से सरकारी, ग्राम समाज, चरागाह, तालाब और दूसरी सार्वजनिक जमीनों के लिए ऐसा डिजिटल अलर्ट सिस्टम बनाया जा सकता है जिसमें उनकी श्रेणी बदलते ही उच्च स्तर पर स्वतः सूचना जाए।यदि चरागाह की जमीन अचानक निजी खतौनी में दर्ज होने लगे तो सिस्टम अधिकारियों से अतिरिक्त अनुमोदन मांगे।
सरकारी जमीनों के लिए ‘टाइटल ऑडिट’ की जरूरत
इस मामले के बाद लखनऊ ही नहीं बल्कि प्रदेश में महंगी हो चुकी सरकारी जमीनों के पुराने आदेशों का नमूना आधारित ऑडिट भी उपयोगी हो सकता है।जहां 20-30 वर्ष पुराने चकबंदी या राजस्व आदेश के आधार पर ग्राम समाज अथवा सरकारी जमीन निजी नामों में गई है, वहां मूल आदेश और रजिस्टर की प्रविष्टि का डिजिटल मिलान कराया जा सकता है।क्योंकि यदि एक कथित फर्जी आदेश 38 साल तक रिकॉर्ड में चल सकता है तो यह जांचना उचित होगा कि ऐसी दूसरी जमीनें कहीं और तो नहीं हैं।
फर्जी आदेश से ज्यादा बड़ा सवाल—38 साल तक उसे असली किसने बनाए रखा?
इस पूरे मामले का केंद्र केवल वह व्यक्ति नहीं होना चाहिए जिसने कथित रूप से फर्जी आदेश तैयार कराया।उससे बड़ा सवाल उस सरकारी प्रणाली का है जिसने कथित फर्जी दस्तावेज को दशकों तक असली दस्तावेज की ताकत दी।
1988 में आदेश बना, जमीनों पर दावे हुए, खतौनी बदलवाने की कोशिश हुई, जमीनें बिकीं, निर्माण हुए और अधिकारी फाइल पर आदेश करते रहे। मामला तब खुला जब 2020 में उसी आदेश के सहारे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया और अदालत ने मूल रिकॉर्ड से उसका सत्यापन मांग लिया।
यदि जांच रिपोर्ट के आरोप अंततः प्रमाणित होते हैं तो यह लखनऊ में सरकारी जमीन कब्जाने की केवल बड़ी घटना नहीं होगी। यह इस बात का उदाहरण होगा कि एक फर्जी कागज, यदि सरकारी अभिलेख में जगह बना ले, तो दशकों तक हजारों करोड़ की संपत्ति का वास्तविक मालिक बदलने की ताकत हासिल कर सकता है।
अब असली परीक्षा एफआईआर दर्ज करने की नहीं, पूरी 38 साल की फाइल खोलने की है—फर्जी आदेश किसने बनाया, रिकॉर्ड में किसने रखा, किसने उसके आधार पर आदेश दिए, किसने जमीन बेची और किसने आंखें बंद रखीं।