कहीं बिना जरूरत ICU तो कहीं डॉक्टर गायब! UP में 148 आयुष्मान अस्पतालों पर बड़ा एक्शन, लखनऊ के 19 अस्पतलों में भी बड़ा झोल
UP Ayushman Hospitals Suspended: उत्तर प्रदेश में आयुष्मान भारत योजना से जुड़े 148 निजी अस्पतालों पर बड़ी कार्रवाई हुई है। इनमें लखनऊ के 19 अस्पताल शामिल बताए जा रहे हैं। जांच में फायर सेफ्टी, डॉक्टरों की उपलब्धता, ICU भर्ती और आयुष्मान क्लेम से जुड़ी अनियमितताओं की पड़ताल की गई है।
UP Ayushman Hospitals Suspended: उत्तर प्रदेश में आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना से जुड़े निजी अस्पतालों की निगरानी अब केवल इस बात तक सीमित नहीं रहेगी कि मरीज का इलाज हुआ या नहीं। मरीज अस्पताल में भर्ती होने के दौरान आग लगने की स्थिति में सुरक्षित बाहर निकल सकता है या नहीं, अस्पताल के पास जिस बीमारी के उपचार का अधिकार है उसके विशेषज्ञ डॉक्टर वास्तव में मौजूद हैं या नहीं और जिस मरीज के नाम पर आईसीयू का पैसा मांगा गया उसे सचमुच गहन चिकित्सा की आवश्यकता थी या नहीं—इन सभी मानकों की जांच तेज कर दी गई है। इसी अभियान में प्रदेश के 148 अस्पतालों को आयुष्मान योजना की सूची से निलंबित किए जाने की जानकारी सामने आई है। इनमें सबसे अधिक 19 अस्पताल लखनऊ के बताए गए हैं।
कार्रवाई का प्रमुख आधार अग्नि सुरक्षा व्यवस्था में मिली कमियां हैं, लेकिन मामला केवल फायर एनओसी तक सीमित नहीं है। थर्ड पार्टी ऑडिट और मरीजों के उपचार से संबंधित दस्तावेजों की जांच में कुछ अस्पतालों के विरुद्ध चिकित्सकीय अनियमितताओं और संदिग्ध आयुष्मान दावों के आरोप भी मिले हैं। कहीं ऐसे मरीज को आईसीयू में भर्ती दिखाकर भुगतान का दावा किया गया जिसे कथित तौर पर इसकी जरूरत नहीं थी, तो कहीं संबंधित रोग का विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध न होने के बावजूद उसके इलाज का दावा प्रस्तुत किया गया।
उत्तर प्रदेश में आयुष्मान भारत योजना के संचालन और अस्पतालों की सूचीबद्धता की जिम्मेदारी State Agency for Comprehensive Health and Integrated Services यानी SACHIS के पास है। इसकी मुख्य कार्यपालक अधिकारी अर्चना वर्मा हैं। संस्था अस्पतालों की सूचीबद्धता, निगरानी और भुगतान व्यवस्था से जुड़ी प्रमुख राज्य एजेंसी है।
पहले आग से बचाव की जांच, फिर उपचार के कागज भी खुले
हाल के महीनों में अस्पतालों और दूसरी सार्वजनिक इमारतों में आग की घटनाओं के बाद आयुष्मान से जुड़े अस्पतालों की अग्नि सुरक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया गया। इसी क्रम में अस्पतालों की आकस्मिक जांच और थर्ड पार्टी ऑडिट कराए गए।
जांच में यह देखा गया कि अस्पताल के पास वैध अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र है या नहीं, आग बुझाने के उपकरण चालू हालत में हैं या नहीं, आपातकालीन निकास मौजूद है या नहीं और आग लगने की स्थिति में मरीजों—विशेषकर आईसीयू, ऑपरेशन थिएटर और गंभीर मरीजों—को सुरक्षित निकालने की वास्तविक व्यवस्था है या नहीं।यह सख्ती अचानक शुरू नहीं हुई है। मई 2026 में भी उत्तर प्रदेश सरकार ने करीब 200 निजी अस्पतालों के खिलाफ आयुष्मान योजना के मानकों का पालन न करने पर कार्रवाई की थी। करीब 100 अस्पताल निलंबित किए गए थे और लगभग 100 के भुगतान रोकने की जानकारी सामने आई थी। उस समय अस्पतालों के लिए 35 प्रमुख मानकों में वैध पंजीकरण, अग्नि सुरक्षा, आवश्यक बुनियादी ढांचा और डॉक्टरों की पात्रता जैसे बिंदुओं पर जोर दिया गया था।
अस्पताल में जिंदगी और मौत का सवाल
सामान्य कार्यालय और अस्पताल में अग्नि सुरक्षा की चुनौती एक जैसी नहीं होती। किसी कार्यालय में आग लगने पर अधिकांश लोग स्वयं सीढ़ियों से बाहर निकल सकते हैं, लेकिन अस्पताल में मरीज ऑक्सीजन सपोर्ट, वेंटिलेटर, आईसीयू, ऑपरेशन थिएटर या बेड से जुड़े हो सकते हैं। कई मरीज चलने की स्थिति में भी नहीं होते।ऐसे में अग्नि सुरक्षा का मतलब केवल दीवार पर अग्निशमन यंत्र टांग देना नहीं है। सुरक्षित सीढ़ियां, आपातकालीन निकास, धुआं पहचानने की व्यवस्था, आग की चेतावनी प्रणाली, प्रशिक्षित कर्मचारी, विद्युत सुरक्षा और मरीजों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने की योजना भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।इसीलिए आयुष्मान जैसी सरकारी वित्तपोषित योजना में शामिल अस्पतालों के लिए अग्नि सुरक्षा की अनदेखी सीधे मरीज सुरक्षा का सवाल बन जाती है।
लखनऊ के 19 अस्पताल कार्रवाई की जद में
निलंबित 148 अस्पतालों में सबसे अधिक 19 अस्पताल लखनऊ के बताए गए हैं। इसके अलावा प्रयागराज और बरेली के छह-छह तथा गाजियाबाद, कानपुर देहात, बिजनौर, अलीगढ़ और आगरा सहित कई जिलों के अस्पताल कार्रवाई में शामिल हैं।
लखनऊ के निलंबित अस्पतालों की मूल सूची में नेत्र अस्पताल, नर्सिंग होम, न्यूरो और मल्टीस्पेशियलिटी अस्पताल सहित अलग-अलग श्रेणियों के संस्थान शामिल बताए गए हैं। सूची में गर्ग ऑप्थैल्मिक सेंटर, पूजा नर्सिंग होम, राजपूत हॉस्पिटल, एडवांस न्यूरो एंड जनरल हॉस्पिटल, मातृत्व हॉस्पिटल, मेडीहेल्थ मल्टीस्पेशियलिटी हॉस्पिटल, अर्जुनगंज क्षेत्र के अस्पताल और कई नेत्र चिकित्सा संस्थानों के नाम दिए गए हैं।
हालांकि प्रत्येक अस्पताल के विरुद्ध आरोप एक जैसे नहीं हैं। किस अस्पताल को केवल अग्नि सुरक्षा की कमी पर निलंबित किया गया और किसके खिलाफ उपचार अथवा दावे संबंधी जांच भी चल रही है, यह अलग-अलग आदेशों से ही स्पष्ट होगा। इसलिए सभी 148 अस्पतालों को चिकित्सीय फर्जीवाड़े का आरोपी मानना उचित नहीं होगा।
कुछ मरीजों को बिना जरूरत ICU में रखने का आरोप
ऑडिट में सामने आया सबसे गंभीर आरोप यह है कि कुछ अस्पतालों ने ऐसे मरीजों को भी आईसीयू में भर्ती दिखाया जिन्हें कथित रूप से गहन चिकित्सा इकाई की आवश्यकता नहीं थी।आयुष्मान योजना में उपचार का भुगतान बीमारी और निर्धारित पैकेज के आधार पर अस्पताल को किया जाता है। यदि मरीज को सामान्य वार्ड में उपचार दिया जा सकता है, लेकिन उसे आईसीयू में भर्ती दिखाकर अधिक भुगतान का दावा किया जाए तो सरकारी योजना पर अनावश्यक वित्तीय भार पड़ सकता है। लेकिन इसका निर्णय केवल भर्ती की अवधि देखकर नहीं किया जा सकता। मरीज की बीमारी, महत्वपूर्ण संकेत, ऑक्सीजन आवश्यकता, जांच रिपोर्ट और इलाज के समय की चिकित्सकीय स्थिति को विशेषज्ञ ऑडिट में देखना आवश्यक होता है।इसीलिए ऐसे मामलों में आगे विस्तृत चिकित्सा जांच की जा रही है।
विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं, फिर भी उसी बीमारी के इलाज का दावा
दूसरी महत्वपूर्ण गड़बड़ी विशेषज्ञ चिकित्सकों से जुड़ी बताई गई है। कुछ अस्पतालों में जिस बीमारी के उपचार का दावा किया गया, उसके लिए आवश्यक विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध नहीं होने के आरोप सामने आए हैं।आयुष्मान से सूचीबद्ध अस्पतालों में अलग-अलग उपचार पैकेज के लिए निर्धारित विशेषज्ञ, उपकरण और बुनियादी ढांचा आवश्यक होता है। उदाहरण के लिए केवल अस्पताल में बेड उपलब्ध होना हृदय, न्यूरो, कैंसर या दूसरी विशेषज्ञ चिकित्सा के लिए पर्याप्त नहीं है।मार्च 2026 में लखनऊ के छह अस्पतालों को आयुष्मान संबंधी अनियमितताओं पर नोटिस दिए जाने की खबर भी सामने आई थी। जांच में एक अस्पताल के पास वैध फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट नहीं था और कुछ मामलों में डॉक्टर तथा बुनियादी व्यवस्थाओं को लेकर भी सवाल पाए गए थे।
अब डॉक्टर का नाम ‘उधार’ देकर अस्पताल नहीं चला पाएंगे
आयुष्मान सूचीबद्धता में एक पुरानी चिंता यह भी रही है कि कुछ अस्पताल कागज पर विशेषज्ञ डॉक्टरों के नाम दिखाते हैं, जबकि डॉक्टर अस्पताल में नियमित रूप से उपलब्ध नहीं होते। इसी तरह एक चिकित्सक का नाम कई अस्पतालों के रिकॉर्ड में इस्तेमाल किए जाने जैसी शिकायतों पर भी निगरानी बढ़ी है।सरकार ने Hospital Empanelment Module 2.0 के जरिए अस्पतालों की पात्रता और दस्तावेजों की जांच कड़ी की है। इसमें वैध पंजीकरण, डॉक्टरों की योग्यता, फायर सेफ्टी और आवश्यक अस्पताल ढांचे सहित 35 मानकों पर अनुपालन की व्यवस्था मजबूत की गई है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आयुष्मान कार्डधारक जिस अस्पताल में जाए, वहां केवल बोर्ड पर सुपरस्पेशियलिटी न लिखी हो बल्कि संबंधित चिकित्सकीय सुविधा वास्तव में मौजूद भी हो।
निलंबन का अर्थ अस्पताल बंद होना नहीं
इस कार्रवाई का एक महत्वपूर्ण पहलू मरीजों को समझना चाहिए। किसी अस्पताल को आयुष्मान योजना से निलंबित करने का अर्थ जरूरी नहीं कि अस्पताल को पूरी तरह बंद कर दिया गया है। इसका तात्कालिक अर्थ यह है कि निलंबन की अवधि में वह आयुष्मान भारत योजना के तहत नए मरीजों का उपचार और संबंधित दावा सामान्य रूप से नहीं कर सकेगा।अस्पताल की दूसरी चिकित्सा सेवाएं उसके पंजीकरण और अन्य नियामकीय अनुमति के आधार पर चल सकती हैं, जब तक किसी सक्षम प्राधिकारी की ओर से अलग कार्रवाई न की जाए।SACHIS की सीईओ अर्चना वर्मा के अनुसार संबंधित अस्पतालों में आयुष्मान के तहत इलाज कराने वाले लाभार्थी दूसरे सूचीबद्ध अस्पतालों में योजना का लाभ ले सकते हैं। सरकार का कहना है कि मरीजों के इलाज को बाधित नहीं होने दिया जाएगा।
जिनकी केवल फायर सेफ्टी की कमी, उन्हें मिल सकता है वापसी का रास्ता
सभी अस्पतालों के लिए निलंबन स्थायी नहीं माना जा रहा है। जिन संस्थानों के खिलाफ कोई दूसरी गंभीर जांच नहीं चल रही और समस्या केवल अग्नि सुरक्षा व्यवस्था से संबंधित है, वे आवश्यक सुधार करने के बाद दोबारा सूचीबद्धता के लिए विचार योग्य हो सकते हैं।यानी अस्पताल को निर्धारित अग्नि सुरक्षा मानक पूरे करने होंगे और सक्षम विभाग से आवश्यक प्रमाणपत्र हासिल करना होगा। उसके बाद सत्यापन होने पर निलंबन वापस लेने पर विचार किया जा सकता है।लेकिन जिन अस्पतालों पर संदिग्ध इलाज, गलत दावे या अन्य गंभीर आरोप हैं, उनके मामले अलग जांच के बाद तय होंगे।
आयुष्मान के बड़े नेटवर्क में निगरानी बड़ी चुनौती
उत्तर प्रदेश आयुष्मान भारत के सबसे बड़े नेटवर्क वाले राज्यों में है। सितंबर 2025 तक प्रदेश में 6,099 अस्पताल योजना से सूचीबद्ध थे, जिनमें सरकारी और निजी दोनों अस्पताल शामिल थे। तब तक 74 लाख से अधिक लाभार्थियों के इलाज पर ₹12 हजार करोड़ से ज्यादा खर्च हो चुका था। इतने बड़े नेटवर्क में हर अस्पताल की लगातार निगरानी आसान नहीं है।
दूसरी तरफ सरकार हर महीने बड़ी संख्या में इलाज के दावे भी निपटाती है। वर्ष 2025 में अकेले उत्तर प्रदेश में अस्पतालों को आयुष्मान दावों के विरुद्ध ₹4,649 करोड़ का भुगतान किया गया था। दावों की जांच के लिए मेडिकल ऑडिटर की संख्या 40 से बढ़ाकर 130 और क्लेम प्रोसेसिंग डेस्क 100 से बढ़ाकर 125 किए गए थे। इसलिए मामूली प्रतिशत की भी गलत बिलिंग बड़े पैमाने पर करोड़ों रुपये के सरकारी खर्च में बदल सकती है।
फायर सेफ्टी और फर्जी इलाज
इस कार्रवाई में सबसे जरूरी पारदर्शिता यह होगी कि सरकार 148 अस्पतालों को श्रेणीवार सार्वजनिक करे।एक सूची उन अस्पतालों की हो जिनकी केवल अग्नि सुरक्षा व्यवस्था में कमी है। दूसरी उन संस्थानों की हो जिनके इलाज अथवा आयुष्मान दावों में अनियमितता मिली है। तीसरी श्रेणी में वे अस्पताल हों जिनके खिलाफ दोनों तरह की जांच चल रही है।ऐसा करना इसलिए जरूरी है क्योंकि अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र की समयबद्ध कमी और जानबूझकर गलत इलाज दिखाकर सरकारी रकम का दावा करना गंभीरता की दृष्टि से एक समान आरोप नहीं हैं।
ऑडिट में केवल फाइल नहीं, मरीज भी सत्यापन का हिस्सा बने
आयुष्मान धोखाधड़ी रोकने का सबसे कारगर तरीका केवल अस्पताल की फाइल देखना नहीं है। उपचार के बाद मरीज से डिजिटल या फोन आधारित सत्यापन भी महत्वपूर्ण हो सकता है।मरीज से पूछा जा सकता है कि वह कितने दिन अस्पताल में भर्ती रहा, ICU में था या सामान्य वार्ड में, कोई सर्जरी हुई या नहीं और अस्पताल ने उससे अलग पैसा तो नहीं लिया।इन जवाबों को अस्पताल के दावे, डॉक्टर की नोटशीट, दवा रिकॉर्ड और जांच रिपोर्ट से मिलाया जाए तो गलत क्लेम जल्दी पकड़े जा सकते हैं।
इसी के साथ असामान्य पैटर्न पहचानने के लिए डेटा विश्लेषण किया जा सकता है—मसलन किसी अस्पताल में समान बीमारी के मरीज असामान्य रूप से ज्यादा ICU में जा रहे हों या किसी विशेष महंगे पैकेज के दावे बाकी अस्पतालों से कई गुना अधिक हों।
निलंबन के साथ मरीजों को विकल्प बताना भी जरूरी
किसी जिले में अस्पताल अचानक आयुष्मान सूची से हटे तो सबसे ज्यादा परेशानी मरीज को होती है। खासकर यदि वह पहले से उसी अस्पताल में उपचार करा रहा हो।इसलिए निलंबन के साथ जिला स्तर पर यह भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए कि पास के कौन-कौन से दूसरे अस्पतालों में वही उपचार आयुष्मान के तहत उपलब्ध है।
कैंसर, डायलिसिस, हृदय रोग और दूसरी नियमित चिकित्सा वाले मरीजों के लिए यह और महत्वपूर्ण है, क्योंकि उपचार बीच में रुकना स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
148 अस्पतालों की कार्रवाई का असली संदेश
आयुष्मान भारत योजना का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण अस्पताल उपचार उपलब्ध कराना है। गरीब मरीज जब योजना के अस्पताल में भर्ती होता है तो उसके पास अक्सर यह जांचने का साधन नहीं होता कि अस्पताल की फायर एनओसी वैध है या डॉक्टर वास्तव में विशेषज्ञ है।यह जिम्मेदारी सरकार और योजना चलाने वाली एजेंसी की है।इसीलिए 148 अस्पतालों का निलंबन केवल दंडात्मक कार्रवाई के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह उस व्यवस्था की परीक्षा भी है जिसके भरोसे करोड़ों लोग अपना आयुष्मान कार्ड लेकर अस्पताल पहुंचते हैं।
अस्पताल में मरीज को केवल मुफ्त इलाज मिलना पर्याप्त नहीं है। इलाज सही डॉक्टर से हो, जरूरत के अनुसार हो, उसके नाम पर सरकार से गलत भुगतान न लिया जाए और आग जैसी आपदा में उसकी जान बचाने की व्यवस्था भी मौजूद हो—तभी ‘आयुष्मान सूचीबद्ध अस्पताल’ का अर्थ वास्तव में गुणवत्तापूर्ण और सुरक्षित अस्पताल होगा।