Lucknow News: गोमती सफाई की पोल खोल रहा सीवर सिस्टम, 1,300 जगह गड़बड़ी से नदी में पहुंच रही गंदगी
Lucknow News: लखनऊ में गोमती प्रदूषण की बड़ी वजह सीवर नेटवर्क की खामियां हैं। 1,300 जगह नाली-सीवर की गड़बड़ी और कई नालों से नदी में पहुंच रहा अनुपचारित सीवेज चिंता बढ़ा रहा है।
Gomti River Pollution (Image Credit-Social Media)
लखनऊ। गोमती को निर्मल बनाने की योजनाएं एक बार फिर फाइलों, अधूरी रिपोर्टों और सीवर नेटवर्क की उलझनों में फंस गई हैं। राजधानी में नदी की सफाई का सबसे बुनियादी सवाल अभी तक पूरी तरह हल नहीं हुआ है—लखनऊ में रोज पैदा होने वाला सीवर आखिर जाता कहां है? कितना पाइपलाइन से सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट तक पहुंचता है, कितना नालों के रास्ते उपचार संयंत्रों तक जाता है और कितना बिना उपचार सीधे गोमती में गिर रहा है? यही हिसाब स्पष्ट न होने पर मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत ने नगर निगम, जलकल और जल निगम की रिपोर्ट पर नाराजगी जताई है। मौजूदा और प्रस्तावित सीवेज परियोजनाओं के सरकारी आकलनों में भी यह स्वीकार किया गया है कि शहर में उपलब्ध एसटीपी क्षमता के बावजूद बड़ी मात्रा में अनुपचारित सीवेज अभी गोमती तक पहुंचता है।
गोमती की समस्या अब केवल नदी की सफाई का प्रश्न नहीं रह गई है। असली संकट शहर के भीतर नाली, सीवर, नाले और एसटीपी के अधूरे तथा परस्पर जुड़े नेटवर्क का है। जब बरसाती नालियों में घरेलू सीवेज जाता है, सीवर लाइन ओवरफ्लो होकर नाली में मिलती है या कोई बड़ा नाला एसटीपी से जुड़े बिना सीधे नदी तक पहुंचता है, तो नदी की सतह पर सफाई करने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
पहले यह बताओ—कितना सीवर पैदा होता है और जाता कहां है
मुख्यमंत्री स्तर की समीक्षा के बाद अधिकारियों से तीन बुनियादी सवालों पर पूरी रिपोर्ट मांगी गई थी—कितना सीवेज सीधे पाइप नेटवर्क के जरिए एसटीपी तक पहुंच रहा है, कितना नालों को इंटरसेप्ट करके उपचार संयंत्रों तक ले जाया जा रहा है और कितना सीवेज बिना उपचार नदी में जा रहा है।यह रिपोर्ट मोहल्ला और नाला स्तर तक तैयार की जानी थी ताकि शहर का वास्तविक सीवेज फ्लो मैप सामने आ सके। लेकिन मूल समाचार के अनुसार महीनों बाद भी विभागों के आंकड़े पूरी तरह मेल नहीं खा रहे और इसी वजह से नई कार्ययोजना को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है।
यह देरी महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी नदी को साफ करने के लिए पहले प्रदूषण के प्रत्येक स्रोत की पहचान जरूरी होती है। यदि प्रशासन को यही स्पष्ट नहीं है कि कौन-सी कॉलोनी का सीवर किस पाइप से किस एसटीपी तक जाता है, तो नई परियोजनाओं की क्षमता तय करना भी अनुमान पर आधारित रह सकता है।
1,300 स्थानों पर नाली और सीवर का गड़बड़ मेल
सीवर प्रबंधन से जुड़ी एजेंसी की रिपोर्ट में शहर में करीब 1,300 ऐसे स्थानों की पहचान किए जाने की बात सामने आई है जहां नाली का पानी सीवर में मिल रहा है या सीवर ओवरफ्लो होकर नालियों के जरिए आगे जा रहा है।शहरी जल प्रबंधन में यह बेहद गंभीर समस्या है। सामान्यतः घरेलू सीवेज को बंद पाइप नेटवर्क के माध्यम से एसटीपी तक जाना चाहिए, जबकि बरसाती पानी के लिए अलग ड्रेनेज नेटवर्क होना चाहिए।दोनों प्रणालियां आपस में जुड़ जाएं तो दो तरह की परेशानी पैदा होती है। बारिश में सीवर नेटवर्क पर अचानक बहुत अधिक दबाव पड़ सकता है और दूसरी तरफ सामान्य मौसम में सीवेज बरसाती नालों के जरिए नदी तक पहुंच सकता है।
यानी गोमती में गिरता प्रदूषण केवल नदी किनारे के बड़े नालों की समस्या नहीं है; उसका स्रोत शहर के भीतर सैकड़ों छोटी गड़बड़ियों में छिपा हो सकता है।
लखनऊ का बड़ा हिस्सा अब भी सीवर नेटवर्क से बाहर
मूल विभागीय आंकड़ों के अनुसार नगर निगम सीमा के लगभग 560.48 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में केवल करीब 243.56 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र ही सीवर नेटवर्क से जुड़ा बताया गया है। बड़े हिस्से में लोग नालियों, सेप्टिक टैंक या दूसरी स्थानीय व्यवस्थाओं पर निर्भर हैं।यह तस्वीर बताती है कि समस्या केवल एसटीपी की क्षमता बढ़ाने से हल नहीं होगी। किसी क्षेत्र में सीवर लाइन ही नहीं होगी तो वहां पैदा होने वाला गंदा पानी एसटीपी तक पहुंचेगा कैसे? पुराने लखनऊ के घने इलाकों, नए विस्तारित नगर निगम क्षेत्रों और अनियोजित बस्तियों में सीवर नेटवर्क का विस्तार तकनीकी और वित्तीय दोनों दृष्टि से कठिन है। शहर के पुराने स्वच्छता दस्तावेज भी लंबे समय से यह दर्ज करते रहे हैं कि लखनऊ के अलग-अलग हिस्सों में सीवर नेटवर्क असमान रूप से विकसित हुआ है।
584 एमएलडी क्षमता फिर भी गंदा पानी नदी में क्यों?
यही गोमती सफाई का सबसे बड़ा विरोधाभास है। हाल की परियोजना रिपोर्टों के अनुसार लखनऊ में मौजूदा एसटीपी की कुल स्थापित क्षमता करीब 584 एमएलडी बताई गई है, इसके बावजूद बड़ी मात्रा में अनुपचारित सीवेज नदी तक पहुंचने की समस्या बनी हुई है। अलग-अलग समय की प्रशासनिक समीक्षाओं में अनुपचारित सीवेज का अनुमान लगभग 130 एमएलडी से लेकर इससे कहीं अधिक तक बताया गया है, जो यह भी दिखाता है कि वास्तविक प्रवाह का सटीक आकलन कितना जरूरी है। सिर्फ कुल स्थापित क्षमता देखना भी भ्रामक हो सकता है। तीन सवाल और जरूरी हैं—क्या एसटीपी अपनी पूरी क्षमता से चल रहे हैं, क्या सीवर वास्तव में वहां तक पहुंच रहा है और उपचार के बाद निकलने वाला पानी निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरा उतर रहा है? यदि किसी 100 एमएलडी एसटीपी तक केवल 60 एमएलडी सीवर पहुंच रहा है और दूसरी तरफ किसी नाले से 40 एमएलडी सीधे नदी में गिर रहा है, तो कागज पर कुल क्षमता पर्याप्त दिखने के बावजूद नदी प्रदूषित रहेगी।
नागरिया, पाटा नाला, सरकटा और हैदर कैनाल बड़ी चुनौती
गोमती में गिरने वाले बड़े नालों की समस्या वर्षों पुरानी है। मूल समाचार के अनुसार नागरिया, पाटा नाला और सरकटा नाला जैसे नाले सीधे नदी में गंदगी पहुंचा रहे हैं, जबकि डाउनस्ट्रीम में हैदर कैनाल का प्रवाह भी समस्या पैदा करता है।हाल की परियोजना योजनाओं में भी नागरिया, सरकटा, वजीरगंज, जियामऊ, बसंतकुंज और मस्तेमऊ से जुड़े नालों को इंटरसेप्ट करने के लिए नए एसटीपी प्रस्तावित किए गए हैं। इससे स्पष्ट है कि समस्या प्रशासन के लिए अज्ञात नहीं है। चुनौती इन नालों को स्थायी रूप से सीवेज ट्रीटमेंट नेटवर्क से जोड़ने की है।
नए एसटीपी बनेंगे, पर कुल क्षमता को लेकर आंकड़ों में फर्क
मूल समाचार में करीब 400 एमएलडी नई एसटीपी क्षमता का प्रस्ताव केंद्र को भेजे जाने की बात कही गई है। हाल की सार्वजनिक रिपोर्टों में चार प्रमुख प्रस्तावित संयंत्रों की कुल क्षमता करीब 342 एमएलडी बताई गई है—बसंतकुंज में 145 एमएलडी, जियामऊ में लगभग 132 एमएलडी, वजीरगंज में 60 एमएलडी और मस्तेमऊ में 5 एमएलडी। कुछ अन्य परियोजनाओं या संशोधित प्रस्तावों को जोड़ने पर कुल संख्या अलग हो सकती है, इसलिए लगभग 400 एमएलडी के दावे को अंतिम स्वीकृत क्षमता मानने से पहले विभागीय DPR से मिलान जरूरी होगा।
बसंतकुंज के 145 एमएलडी संयंत्र की परियोजना रिपोर्ट राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन को भेजे जाने और जियामऊ-वजीरगंज में नए प्लांटों के लिए जमीन संबंधी प्रक्रिया आगे बढ़ने की जानकारी भी सामने आई है।
नया एसटीपी तभी उपयोगी जब सीवर वहां तक पहुंचे
यह वही गलती है जो कई शहरों की नदी सफाई योजनाओं में बार-बार होती है। बड़े एसटीपी बना दिए जाते हैं, लेकिन सीवर लाइन और इंटरसेप्टर ड्रेन का नेटवर्क पूरा नहीं होता। परिणाम यह होता है कि संयंत्र अपनी क्षमता से कम चलता है और दूसरी तरफ नाले नदी में बहते रहते हैं।इसलिए मंडलायुक्त का इस बात पर जोर कि पहले वास्तविक सीवर प्रवाह का पूरा हिसाब तैयार हो, तकनीकी दृष्टि से महत्वपूर्ण है।नई एसटीपी क्षमता तभी सार्थक होगी जब प्रत्येक प्रदूषित नाले को इंटरसेप्ट करके उस तक पर्याप्त प्रवाह पहुंचाया जाए।
‘एक बूंद भी सीवर गोमती में न जाए’—लक्ष्य कठिन लेकिन सही
प्रशासन ने लक्ष्य रखा है कि बिना उपचार एक बूंद भी सीवेज गोमती में न जाए। व्यवहार में किसी बड़े महानगर में इसे शत-प्रतिशत हासिल करना कठिन हो सकता है, क्योंकि अवैध कनेक्शन, सीवर टूटना, पंपिंग स्टेशन बंद होना, बिजली कटौती, ओवरफ्लो और बारिश जैसी स्थितियां बनी रहती हैं।लेकिन नीति के स्तर पर सही लक्ष्य यही है कि सभी प्रमुख स्थायी सीवेज स्रोतों को नदी से अलग किया जाए।इसके लिए केवल निर्माण परियोजनाएं नहीं बल्कि 24 घंटे निगरानी, पंपिंग स्टेशन की विश्वसनीयता, सीवर लाइन की मरम्मत और एसटीपी आउटलेट की गुणवत्ता जांच भी जरूरी होगी।
गोमती में गंदगी दिखती है, लेकिन असली समस्या जमीन के नीचे है
गोमती में झाग, काई, जलकुंभी, दुर्गंध और गहरा पानी दिखाई देता है, लेकिन इनके पीछे का बड़ा हिस्सा शहर की भूमिगत सीवर व्यवस्था से जुड़ा होता है।सीवर पाइप टूटे हों, क्षमता कम हो, पंपिंग स्टेशन फेल हो जाए, नाली और सीवर जुड़े हों या पुराने इलाके में पाइपलाइन ही न हो—इन सभी समस्याओं का अंतिम परिणाम नदी में दिखाई देता है।इसीलिए गोमती सफाई परियोजना को केवल ‘रिवर फ्रंट’ परियोजना की तरह चलाना पर्याप्त नहीं है। इसे पूरे लखनऊ की सीवेज इंजीनियरिंग परियोजना की तरह देखना होगा।
2015 का रिवरफ्रंट आज भी पीछा कर रहा
गोमती की मौजूदा स्थिति की चर्चा पुराने रिवरफ्रंट प्रोजेक्ट के बिना अधूरी है। वर्ष 2015 में तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार ने गोमती रिवरफ्रंट विकास परियोजना शुरू की थी। इस परियोजना के मूल बजट, बाद में बढ़े खर्च और अधूरे काम को लेकर गंभीर विवाद हुआ था और वर्ष 2017 के बाद जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो तक पहुंची।
इस पुराने प्रकरण ने एक बड़ा सबक दिया—नदी के किनारे सौंदर्यीकरण और निर्माण पर खर्च करना अलग बात है, लेकिन नदी को निर्मल बनाने के लिए वास्तविक सीवेज प्रवाह रोकना जरूरी है। यदि नदी के किनारे पार्क, पथ और दीवार बन जाएं, लेकिन शहर का अनुपचारित सीवर भीतर गिरता रहे तो नदी देखने में सुंदर हो सकती है, स्वस्थ नहीं।
गोमती का संकट सौंदर्यीकरण बनाम सीवेज प्रबंधन का भी है
नदी सफाई की परियोजनाओं में अक्सर सबसे दृश्य काम पहले होता है—घाट, प्रकाश व्यवस्था, पाथवे, लैंडस्केप और तट सौंदर्यीकरण।इसके विपरीत सीवर लाइन जमीन के नीचे होती है, एसटीपी शहर से दूर होता है और इंटरसेप्टर ड्रेन मतदाता को आसानी से दिखाई नहीं देता।लेकिन नदी की सेहत के लिए दूसरा हिस्सा पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है।
गोमती के मामले में अब यही प्राथमिकता उलटने की जरूरत है—पहले प्रदूषण का स्रोत बंद हो, उसके बाद नदी तट को सुंदर बनाया जाए।प्रत्येक नाले पर वास्तविक समय की निगरानी क्यों नहीं?गोमती सफाई की अगली कार्ययोजना में सभी प्रमुख नालों पर नियमित प्रवाह और जल गुणवत्ता निगरानी जोड़ना उपयोगी हो सकता है।
हर बड़े नाले के लिए यह सार्वजनिक किया जा सकता है कि उसमें रोज कितने एमएलडी प्रवाह है, उसका कितना हिस्सा एसटीपी तक जा रहा है, BOD और COD कितना है और उपचार के बाद उसका स्तर क्या है।इसके बाद यह भी साफ होगा कि किस नाले ने एक महीने में कितना प्रदूषण नदी तक पहुंचाया।ऐसा डेटा सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध हो तो नदी सफाई केवल सरकारी दावे पर निर्भर नहीं रहेगी।
1,300 स्थानों का इलाज ही गोमती की असली सफाई
मूल खबर में सामने आया 1,300 गड़बड़ी वाले स्थानों का आंकड़ा शायद इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा है।क्योंकि यह बताता है कि गोमती को प्रदूषित करने वाला कोई एक विशाल पाइप नहीं है जिसे बंद करते ही नदी साफ हो जाएगी। समस्या शहर की नालियों और सीवर नेटवर्क में सैकड़ों जगह फैली हुई है।यदि प्रशासन इन 1,300 स्थानों की जीआईएस मैपिंग करे, हर जगह समस्या का प्रकार दर्ज करे और महीनेवार सुधार की प्रगति सार्वजनिक करे तो नदी सफाई का परिणाम मापा जा सकता है।
फाइल में प्रवाह नहीं रुकता, नदी में सीवर रोकना होगा
गोमती को लेकर घोषणाएं नई नहीं हैं। अधिकारियों की बैठकें, निरीक्षण, डीपीआर, नाले टैप करने की योजनाएं और एसटीपी प्रस्ताव वर्षों से बनते रहे हैं।लेकिन नदी की सेहत का अंतिम पैमाना बेहद सरल है—उसमें अनुपचारित सीवर कितना कम हुआ।
मौजूदा स्थिति का सबसे चिंताजनक पहलू यही है कि प्रशासन अभी तक उस मूल आंकड़े को पूरी स्पष्टता से तय नहीं कर पाया है।कितना सीवर पैदा हो रहा है, कितना उपचारित हो रहा है, कितनी एसटीपी क्षमता वास्तव में इस्तेमाल हो रही है, कौन-से नाले सीधे नदी में गिर रहे हैं और किन 1,300 बिंदुओं पर नाली-सीवर का नेटवर्क गड़बड़ है—जब तक इन सवालों का एक संयुक्त और सत्यापित उत्तर नहीं होगा, नई परियोजनाएं भी अधूरे डेटा पर आधारित रहेंगी।
गोमती की लड़ाई अब नदी के किनारे नहीं, शहर की गलियों और जमीन के नीचे लड़ी जानी है। नदी तभी साफ होगी जब लखनऊ का सीवर पहले साफ रास्ते से एसटीपी तक पहुंचेगा। वरना गोमती को संवारने की हर नई योजना फिर फाइलों में चमकेगी और नदी में वही गंदा पानी बहता रहेगा।