UP में बनेगा 'सांप के जहर' का सेंटर, लेकिन लखनऊ जू या कुकरैल? जानिए क्यों मचा कन्फ्यूजन और क्या होगा फायदा

UP Snake Venom Extraction Centre: उत्तर प्रदेश में प्रस्तावित स्नेक वेनम एक्सट्रैक्शन सेंटर को लेकर बड़ा कन्फ्यूजन है- केंद्र लखनऊ जू में बनेगा या कुकरैल में? जानिए दोनों जगहों की संभावित भूमिका, सांपों के जहर पर रिसर्च से एंटी-वेनम को मिलने वाला फायदा, सर्पदंश से मौतें रोकने में परियोजना की अहमियत और क्यों अंतिम सरकारी आदेश का इंतजार है।

Update:2026-08-12 22:56 IST

UP Snake Venom Extraction Centre: उत्तर प्रदेश में सर्पदंश से होने वाली मौतों को कम करने और स्थानीय सांपों के जहर पर वैज्ञानिक शोध के लिए प्रस्तावित वेनम एक्सट्रैक्शन सेंटर को लेकर अब स्थान का नया सवाल खड़ा हो गया है। ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि यह केंद्र लखनऊ प्राणि उद्यान में बनाया जाएगा, जहां विषैले सांपों से वैज्ञानिक तरीके से जहर निकालकर उसे एंटी-वेनम निर्माण और शोध के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। लेकिन एक दिन पहले सामने आई दूसरी रिपोर्ट में वन एवं वन्यजीव विभाग के हवाले से यही प्रदेशस्तरीय केंद्र कुकरैल में स्थापित किए जाने की बात कही गई थी। दोनों रिपोर्टें 11-12 अगस्त 2026 की हैं और दोनों ही वन विभाग की प्रस्तावित योजना का उल्लेख करती हैं। इसलिए परियोजना का अंतिम स्थान लखनऊ जू होगा, कुकरैल होगा या दोनों स्थानों की अलग-अलग भूमिका होगी—इस पर विभाग की औपचारिक परियोजना रिपोर्ट आने तक सावधानी जरूरी है।

ताजा जानकारी के अनुसार उच्चस्तरीय बैठक में लखनऊ में वेनम एक्सट्रैक्शन सेंटर स्थापित करने पर सहमति बनी है और विस्तृत योजना तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। एक अन्य समाचार एजेंसी की रिपोर्ट भी लखनऊ में समर्पित स्नेक वेनम एक्सट्रैक्शन और रिसर्च सेंटर प्रस्तावित होने की पुष्टि करती है, हालांकि उसमें भी अंतिम स्थल का विस्तृत सरकारी आदेश उपलब्ध नहीं है।

सांप भी बचेंगे, जहर भी बेकार नहीं जाएगा

प्रस्तावित व्यवस्था का मूल विचार यह है कि आबादी वाले इलाके में मिलने वाले विषैले सांपों को मारने के बजाय प्रशिक्षित टीम उन्हें सुरक्षित पकड़े। जरूरत और अनुमति के अनुसार उन्हें केंद्र लाया जाए, वहां नियंत्रित परिस्थितियों में विष एकत्र किया जाए और उसके बाद वन्यजीव नियमों तथा वैज्ञानिक प्रोटोकॉल के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाए।इससे दो उद्देश्य एक साथ पूरे करने की कोशिश होगी—सांपों का संरक्षण और चिकित्सा उपयोग के लिए प्रमाणित विष का संग्रह।लेकिन यह मान लेना सही नहीं होगा कि हर पकड़े गए सांप से जहर निकालकर तुरंत उसी स्थान पर जंगल में छोड़ दिया जाएगा। सांप को पकड़ने, रखने, स्वास्थ्य परीक्षण, क्वारंटीन, विष निकालने और पुनर्वास के लिए वैज्ञानिक तथा वन्यजीव संबंधी विस्तृत प्रोटोकॉल जरूरी होंगे।

स्थानीय सपेरों की मदद ली जा सकती है

रिपोर्ट में स्थानीय सपेरों और सांप बचाने वाली संस्थाओं के सहयोग की बात कही गई है। पारंपरिक रूप से कई समुदायों के पास सांप पहचानने और पकड़ने का अनुभव रहा है, इसलिए उनकी जानकारी उपयोगी हो सकती है। लेकिन विषैले सांपों को पकड़ना और उनका जहर निकालना अत्यधिक जोखिम वाला वैज्ञानिक कार्य है। इसलिए इसे केवल पारंपरिक कौशल के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। प्रशिक्षित स्नेक हैंडलर, पशु चिकित्सक, जैव-सुरक्षा व्यवस्था, आपातकालीन एंटी-वेनम और निर्धारित वन्यजीव अनुमति जरूरी होगी।किसी भी निजी संस्था या व्यक्ति द्वारा सांप पकड़ने या विष निकालने का काम संबंधित वन्यजीव कानूनों और विभागीय अनुमति के दायरे में ही किया जा सकता है।

उत्तर भारत के सांपों का विष अलग क्यों महत्वपूर्ण है

इस केंद्र की सबसे मजबूत वैज्ञानिक वजह भौगोलिक विष विविधता है। एक ही प्रजाति के सांप के विष की संरचना अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में बदल सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी मानता है कि व्यापक क्षेत्र में पाई जाने वाली कुछ सर्प प्रजातियों के विष में भौगोलिक अंतर हो सकता है और एंटी-वेनम निर्माण में इस्तेमाल विष उस विविधता को पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व न करे तो प्रभावशीलता प्रभावित हो सकती है। भारत में कोबरा और रसेल वाइपर सहित विभिन्न सांपों पर हुए वैज्ञानिक अध्ययनों में भी क्षेत्रीय विष विविधता पाई गई है। कुछ अध्ययनों ने दिखाया है कि विष की संरचना और एंटी-वेनम द्वारा उसे निष्क्रिय करने की क्षमता भौगोलिक क्षेत्रों के अनुसार बदल सकती है। इसलिए उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत के सांपों से वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित विष संग्रह तैयार होना शोध के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन ‘दक्षिण भारत का एंटी-वेनम उत्तर में कम असर करता है’ इतना सीधा निष्कर्ष सही नहीं

मूल खबर में यह धारणा उभरती है कि वर्तमान एंटी-वेनम मुख्यतः दक्षिण भारत के सांपों के जहर से बनता है और इसलिए उत्तर भारत में कम प्रभावी हो सकता है। इसमें वैज्ञानिक आधार का एक हिस्सा जरूर है, क्योंकि विष में क्षेत्रीय बदलाव संभव है, लेकिन इसे सार्वभौमिक तथ्य की तरह लिखना उचित नहीं होगा।भारत में इस्तेमाल होने वाला पॉलीवैलेंट एंटी-वेनम पारंपरिक रूप से चार प्रमुख विषैले सांपों—कोबरा, कॉमन क्रेट, रसेल वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर—के विष के विरुद्ध तैयार किया जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों के विष पर इसकी प्रभावशीलता समान नहीं हो सकती, लेकिन यह तय करने के लिए प्रयोगशाला और क्लिनिकल परीक्षण जरूरी हैं। WHO भी भौगोलिक विष विविधता को एंटी-वेनम निर्माण की बड़ी चुनौती मानता है।

इसलिए सही बात यह होगी कि उत्तर भारत के सांपों का विष संग्रह मौजूदा एंटी-वेनम की क्षेत्रीय प्रभावशीलता जांचने और भविष्य में उसे बेहतर बनाने में मदद कर सकता है।

सिर्फ जहर निकालने से एंटी-वेनम नहीं बन जाता

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर फिर समझना जरूरी है। वेनम एक्सट्रैक्शन सेंटर और एंटी-वेनम उत्पादन इकाई एक ही चीज नहीं हैं।वेनम सेंटर में सांपों से मानकीकृत विष एकत्र किया जाता है। इसके बाद एंटी-वेनम उत्पादन के लिए उस विष का नियंत्रित मात्रा में उपयोग बड़े पशुओं में प्रतिरक्षा विकसित कराने के लिए किया जाता है। पशुओं के प्लाज्मा से एंटीबॉडी अलग की जाती हैं, उन्हें शुद्ध किया जाता है और फिर गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता के कई परीक्षणों से गुजरने के बाद एंटी-वेनम तैयार होता है।

इसलिए लखनऊ में केंद्र बन जाने का अर्थ यह नहीं होगा कि उसी दिन से उत्तर प्रदेश अपना एंटी-वेनम बनाने लगेगा। इसके लिए अलग औषधि उत्पादन सुविधा, गुणवत्ता नियंत्रण और नियामकीय मंजूरी जरूरी होगी।

कुकरैल वाली और जू वाली योजना, क्या दोनों एक ही परियोजना हैं?

यही अब सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक सवाल है। 11 अगस्त की रिपोर्ट में प्रमुख मुख्य वन संरक्षक वन्यजीव अनुराधा वेमुरी के हवाले से कुकरैल में प्रदेश का पहला सरकारी स्नेक वेनम सेंटर स्थापित करने की बात कही गई थी और गुजरात के वलसाड स्थित केंद्र का अध्ययन करने के लिए उच्चस्तरीय टीम भेजने की तैयारी भी बताई गई थी। 12 अगस्त की रिपोर्ट में अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक राम कुमार के हवाले से लखनऊ प्राणि उद्यान में केंद्र बनाने की योजना सामने आई। इसमें स्वास्थ्य विभाग से सलाह लेने की बात भी कही गई है।

संभव है कि प्रारंभिक विचार में कई स्थानों का परीक्षण चल रहा हो, या लखनऊ जू में विष संग्रह तथा कुकरैल में विस्तृत शोध केंद्र जैसी अलग भूमिकाएं प्रस्तावित हों। लेकिन अभी उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। अंतिम डीपीआर या सरकारी आदेश ही स्थिति स्पष्ट करेगा।

लखनऊ जू में बने तो क्या फायदे होंगे

यदि केंद्र वास्तव में लखनऊ प्राणि उद्यान में बनता है तो यहां पहले से मौजूद पशु चिकित्सा, वन्यजीव प्रबंधन और सरीसृपों की देखभाल से जुड़ी आधारभूत विशेषज्ञता उपयोगी हो सकती है। लखनऊ जू वन विभाग की स्थापित संस्था है और वहां नियंत्रित परिसर होने से सुरक्षा तथा निगरानी अपेक्षाकृत आसान हो सकती है। हालांकि इसके साथ आम दर्शकों वाला प्राणि उद्यान होने के कारण अतिरिक्त जैव-सुरक्षा, अलग नियंत्रित क्षेत्र और विष संग्रह प्रयोगशाला की जरूरत होगी।

कुकरैल में बने तो शोध और संरक्षण का बड़ा परिसर मिल सकता है

दूसरी तरफ कुकरैल पहले से वन्यजीव संरक्षण और घड़ियाल पुनर्वास केंद्र के लिए जाना जाता है। यहां वन विभाग के पास अपेक्षाकृत विस्तृत प्राकृतिक परिसर और वन्यजीव प्रबंधन का ढांचा उपलब्ध है। जून 2026 तक कुकरैल घड़ियाल पुनर्वास केंद्र बड़े संरक्षण कार्यक्रम के रूप में सक्रिय था। इसलिए कुकरैल को प्रदेशस्तरीय शोध और संरक्षण केंद्र के रूप में चुनने के पीछे भी मजबूत तर्क हो सकता है।

क्या उत्तर भारत में सचमुच ऐसा कोई केंद्र नहीं है?

ताजा खबर में दावा किया गया है कि उत्तर भारत में कोई वेनम एक्सट्रैक्शन सेंटर नहीं है। इस दावे को थोड़ी सावधानी से लिखना बेहतर होगा।दक्षिण भारत में मद्रास क्रोकोडाइल बैंक और इरुला समुदाय से जुड़ी संगठित विष संग्रह व्यवस्था लंबे समय से प्रसिद्ध है। उत्तर भारत में बड़े, नियमित और सरकारी वेनम उत्पादन केंद्र निश्चित रूप से बहुत सीमित हैं। लेकिन “पूरे उत्तर भारत में एक भी केंद्र नहीं” जैसे पूर्ण दावे के लिए केंद्रीय स्तर की आधिकारिक सूची आवश्यक होगी।इसलिए इसे “उत्तर भारत में बड़े सरकारी और संगठित वेनम एक्सट्रैक्शन केंद्रों की कमी है” कहना ज्यादा सुरक्षित है।

सर्पदंश में यूपी के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह परियोजना

उत्तर प्रदेश सर्पदंश की दृष्टि से महत्वपूर्ण राज्यों में है। WHO से प्रकाशित एक समीक्षा में भारत में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु को सर्पदंश की अधिक घटनाओं वाले राज्यों में गिना गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में खेतों, पशुशालाओं और कच्चे घरों के आसपास सांपों से संपर्क अधिक होता है। मौत का बड़ा कारण कई बार केवल विष की तीव्रता नहीं, बल्कि अस्पताल पहुंचने में देरी, एंटी-वेनम की उपलब्धता, सही उपचार और श्वसन सहायता जैसी सुविधाओं की कमी भी होती है। WHO के अनुसार सुरक्षित और प्रभावी एंटी-वेनम सर्प विषाक्तता का सबसे महत्वपूर्ण विशिष्ट उपचार है। इसलिए वेनम सेंटर उपयोगी होगा, लेकिन सर्पदंश की मौतें कम करने के लिए उसके साथ ग्रामीण अस्पतालों में एंटी-वेनम उपलब्धता, डॉक्टरों का प्रशिक्षण, एम्बुलेंस और समय पर रेफरल व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी होगी।

केंद्र का असली महत्व—उत्तर भारत का ‘वेनम बैंक’ बन सकता है

यदि परियोजना वैज्ञानिक तरीके से आगे बढ़ती है तो लखनऊ में अलग-अलग जिलों और प्रजातियों से प्राप्त विष का प्रमाणित संग्रह तैयार किया जा सकता है। हर नमूने के साथ प्रजाति, स्थान, उम्र, तारीख और दूसरे जैविक विवरण दर्ज हों तो यह भविष्य में एक महत्वपूर्ण वेनम बैंक का रूप ले सकता है।इससे वैज्ञानिक यह तुलना कर सकेंगे कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कोबरा और पूर्वांचल के कोबरा के विष में कितना अंतर है, तराई के सांपों पर मौजूदा एंटी-वेनम कितनी अच्छी तरह काम करता है और किन दूसरी चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण प्रजातियों को भविष्य के एंटी-वेनम अनुसंधान में शामिल किया जाना चाहिए।भारत में छोटे भौगोलिक दायरे के भीतर भी विष संरचना में उल्लेखनीय अंतर पाए जाने के वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद हैं।

स्थान का भ्रम दूर हो, फिर बने विश्वस्तरीय केंद्र

उत्तर प्रदेश में वेनम एक्सट्रैक्शन सेंटर की जरूरत और वैज्ञानिक महत्व पर बहुत कम विवाद है। असली सवाल अब इसके क्रियान्वयन का है।सबसे पहले वन विभाग को स्पष्ट करना होगा कि प्रस्तावित केंद्र लखनऊ जू में बनेगा, कुकरैल में या दोनों स्थानों की अलग-अलग भूमिका होगी। इसके बाद सांपों के संग्रह, विष निष्कर्षण, वन्यजीव कल्याण, जैव-सुरक्षा, शोध संस्थानों की भागीदारी और एंटी-वेनम निर्माताओं से संबंध की स्पष्ट व्यवस्था बनानी होगी।यदि यह सही तरीके से हुआ तो परियोजना केवल सांपों का जहर निकालने वाला केंद्र नहीं रहेगी। यह उत्तर भारत के लिए सर्प विष अनुसंधान, क्षेत्रीय एंटी-वेनम मूल्यांकन, वन्यजीव संरक्षण और सर्पदंश उपचार नीति का महत्वपूर्ण संस्थान बन सकती है।

सबसे बड़ा लाभ तभी होगा जब उद्देश्य केवल ‘जहर निकालना’ नहीं, बल्कि यह पता लगाना हो कि उत्तर प्रदेश में कौन-सा सांप कहां पाया जाता है, उसके विष की प्रकृति क्या है और उपलब्ध एंटी-वेनम उस पर वास्तव में कितनी अच्छी तरह काम करता है।

Tags:    

Similar News